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यूपी: जगद्गुरु राजेंद्रदास बोले- गूगल ज्ञान से सनातन पर बहस बेमानी, शास्त्र पढ़े बिना धर्म पर बोलना प्रपंच

Sun, 27 Sep 2026 04:00 PM IST
Rohit Singh महेंद्र तिवारी, गोरखपुर
महेंद्र तिवारी, गोरखपुर Published by: Rohit Singh Updated Sun, 27 Sep 2026 04:00 PM IST
सार

अमर उजाला से विशेष बातचीत में जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने कहा कि शास्त्र पढ़े बिना धर्म पर बोलना सिर्फ प्रपंच है। जिसके जीवन में शौच, सत्य और सदाचार नहीं, उसे धर्म पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है। सनातन 'सदा भव' है, जो तीनों काल में एक समान रहे।जगद्गुरु ने दिल्ली के जेन-जी आचरण पर कहा कि इस तरह का चरित्र वाले भारत के युवक-युवती नहीं हो सकते। बच्चे उपदेश से नहीं, माता-पिता के आचरण से सीखते हैं।

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Debating Sanatan Dharma based on knowledge from Google is futile, said Jagadguru Rajendradas.
जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य जी महराज - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश में इन दिनों सनातन धर्म को लेकर छिड़ी सियासी और सामाजिक बहसों के बीच इसके वास्तविक मर्म और व्यावहारिक स्वरूप पर जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य जी की गंभीर वैचारिक चिंता सामने आई है। अमर उजाला के साथ एक विशेष साक्षात्कार में जगद्गुरु ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो लोग आज इस विषय पर व्याख्यान दे रहे हैं, उन्हें इसके मूल अर्थ की जानकारी ही नहीं है।
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गूगल के पास उपलब्ध अधकचरी जानकारियों को पढ़कर धर्म की व्याख्या करना वैसा ही है, जैसे कानून की समझ न रखने वाला व्यक्ति अदालती फैसलों पर राय दे। सनातन पर जारी निरर्थक बहसों को कड़वा सच बताते हुए उन्होंने कहा कि जिसके जीवन में शौच, सत्य और सदाचार नहीं है, उसे धर्म पर कुछ भी कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
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अपरिवर्तनीय है सनातन का स्वरूप, समय के नाम पर व्याख्या बदलना अनुचित
जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने सनातन शब्द को बेहद सरल रूप में परिभाषित करते हुए कहा कि 'सदा भव' यानी जो भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में एक समान रहे, वही सनातन है। जिस प्रकार अग्नि का स्वाभाविक गुण दाहकता (गर्मी) है और यदि वह बदल जाए तो वह अग्नि नहीं बल्कि राख या कोयला बन जाती है, ठीक वैसे ही धर्म का स्वरूप अपरिवर्तनीय है।

वर्तमान में समय के अनुरूप धर्म की व्याख्या बदलने की जो विचारधारा पनप रही है, वह उचित नहीं है। सनातन की सबसे सरल परिभाषा ही यही है—'एष धर्म: सनातन:' अर्थात जिसने हम पर उपकार किया है, उसके प्रति कृतज्ञ रहना और तन-मन-धन से उसकी सेवा करना। धर्म पर बहस करने वालों को गूगल पर निर्भर रहने के बजाय पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा से वेदों, रामायण, श्रीमदभागवत और महाभारत का अध्ययन करना चाहिए।
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जीवित माता-पिता की सेवा और पितरों का तर्पण ही सच्ची संतान की पहचान
सनातन में पुरुषार्थ चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्ति के लिए माता-पिता के प्रति श्रद्धा को सबसे अनिवार्य अंग बताते हुए जगद्गुरु ने पुराणों के एक श्लोक का संदर्भ दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि माता-पिता के जीवित रहते उनकी आज्ञा का पालन करना और उनके दिवंगत होने के बाद श्राद्ध, तर्पण व गया में पिंडदान के कर्तव्य को पूर्ण करना ही एक वास्तविक संतान का धर्म है।

इसके बिना कोई भी पुत्र या पुत्री कहलाने योग्य नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि जीवन में मिलने वाली हर उपलब्धि में देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों और संतों का अंश (शेयर) होता है, इसलिए उनके प्रति और साथ ही गौमाता के प्रति सेवाभाव रखना ही सनातन धर्म का मूल आधार है।
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दिल्ली वाले जेन-जी भारत के युवक-युवती नहीं हो सकते
दिल्ली के 'जेन-जी' युवाओं के आचरण पर जगद्गुरु ने तीखी बात कही। उन्होंने कहा, दिल्ली में जिस तरह का चरित्र इन युवाओं का उजागर हुआ है, वे भारत के युवक-युवती नहीं हो सकते। पाश्चात्य देशों का अंधानुकरण करने वाले भी इस हद तक नहीं गिरे हैं। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि संतानों को बड़ी उम्र में संस्कार देने की कोशिशें हमेशा नाकाम होती हैं, इसकी शुरुआत गर्भ से ही होनी चाहिए।

माता-पिता के लिए मनुस्मृति का संदेश
आज के दौर में बच्चों के पथभ्रष्ट होने का मुख्य कारण गृहस्थों (माता-पिता) का खुद विचारशून्य और पाश्चात्य भोगवादिता की ओर भागना है। बच्चे उपदेशों से नहीं, बल्कि माता-पिता के आचरण को देखकर सीखते हैं। इसके लिए जगद्गुरु ने मनुस्मृति के कालजयी श्लोक का संदर्भ दिया-
‘लालयेत् पञ्च वर्षाणि, ताडयेत् दश वर्षाणि। प्राप्ते सम्प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रं मित्र समाचरेत।’

व्याख्या करते हुए कहा कि संतान को 5 वर्ष की आयु तक केवल लाड-प्यार दें, 10 वर्ष तक उसे अनुशासित और शिक्षित करें, लेकिन जैसे ही वह 16 वर्ष की आयु में प्रवेश करे, माता-पिता को उसके साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए ताकि वह भटके नहीं।

धर्मांतरण के बाद भी जातिगत लाभ लेना छलावा, झूठी प्रताड़ना के मामलों से समाज को बांटने का चलन खतरनाक
हमारे सनातन वैदिक हिंदू संस्कृति में जाति नहीं वर्ण व्यवस्था है। इसे व्यवस्था की दृष्टि से स्थापित किया गया है। भेदभाव, द्वेष-घृणा, बिखराव के लिए जगह नहीं हैं। इस व्यवस्था के मूल में था देश को, मातृभूमि को एक परिवार मानकर आगे बढ़ें। ज्ञानोपदेश की व्यवस्था ब्राह्मण के जिम्मे हो, राष्ट्र के सीमा विस्तार, सुरक्षा का काम क्षत्रियों को सौंपे। अर्थोपार्जन का जिम्मा कारोबारियों के पास हो और इन सभी के कामों का निर्वहन चौथे वर्ण के जिम्मे है। यह व्यवस्था द्वेष के लिए नहीं है। सच्ची बात है कि जाति जनगणना को हर कोई अपने नजरिए से देखेगा।

सियासी लोग इसे अपने लाभ के नजरिए से देखेंगे, सियासी समीकरण साध कर उनका मकसद राजनीतिक लाभ प्राप्त करना होगा। मेरा मानना है कि सभी को राजनैतिक विचारधारा और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। देखना चाहिए कि हिंदुओं की कितनी संख्या है, कितनी जातियां है, इस बात को लेकर संगठित रहने के जरूरत है। जाति जनगणना को हिंदू समाज के बिखराव के रूप में नहीं देखना चाहिए। जातिगत जनगणना उसमें एक और भूल हो रही है।

समय-समय पर सुनने में आता है कि धर्मांतरित भी हो गए और लाभ लेने के लिए उस जाति के नाम पर ख्यापित कर रहे हैं। ये छलावा बंद होना चाहिए। बौद्ध हमारी ही शाखा है। सनातनी विचारधारा को छोड़ कर बौद्ध धर्म की ओर गए। लोग बौद्ध की ओर जा रहे हैं, तो सोचना होगा कि क्यों? वे जाति व्यवस्था से उद्धिग्न होकर ही गए हैं। फिर जाति व्यवस्था का लाभ क्यों लेना, यह भी जरूरी सवाल है। जो धर्मांतरित हुए हैं, उनकी ही गणना हिंदुओं में होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जाति जनगणना से भी अधिक खतरनाक वर्तमान में यह चलन बनता जा रहा है कि जाति के नाम पर लोगों पर प्रताड़ना के झूठे आरोप लगाए जाते हैं या शिकायतें की जाती हैं। विडंबना यह है कि झूठी शिकायत करने वालों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती। इस प्रकार की प्रवृत्तियां और कानून हिंदू समाज को आपस में बांटने का काम करते हैं। हिंदू समाज को खंडित करने वाली किसी भी गतिविधि को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

केवल कपड़ा रंगकर घूमने वाले छद्म भेषी आज हिंदू समाज की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती
जगद्गुरु ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में समाज के भीतर कई तरह की गंभीर विसंगतियां पनप रही हैं, लेकिन इसके लिए मूल संत समाज को दोष देना पूरी तरह अनुचित है। वास्तविक संत तो सांसारिक मोह-माया और सब कुछ त्यागकर अध्यात्म की राह पर आगे बढ़ते हैं। जगद्गुरु ने एक बड़े सामाजिक और जनसांख्यिकीय संकट की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा, आज के आधुनिक दौर में लोग संतान ही पैदा नहीं कर रहे हैं, या परिवारों का आकार बेहद सीमित कर रहे हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में संत कहां से आएंगे? उन्होंने याद दिलाया कि संत कोई आकाश से नहीं टपकते, बल्कि वे इन्हीं गृहस्थ परिवारों के बीच से ही संस्कार पाकर निकलते हैं।उन्होंने पूर्व के कालखंड का स्मरण कराते हुए कहा कि पहले समाज में विरक्त (संसार से दूर रहने वाले) संतों की एक बहुत बड़ी संख्या हुआ करती थी। स्थिति यह थी कि लगभग हर एक-दो परिवारों के बीच से कोई न कोई संत राष्ट्र और धर्म की सेवा के लिए मिल जाया करता था।

परंतु, वर्तमान पारिवारिक संरचना और संस्कारों के अभाव ने इस आध्यात्मिक क कड़ी को कमजोर कर दिया है। समाज के सामने खड़े सबसे बड़े संकट पर प्रहार करते हुए जगद्गुरु ने कहा कि आज असली संतों की कमी से भी बड़ी चुनौती यह है कि कुछ लोग बिना किसी त्याग या वैराग्य के, केवल अपने कपड़ों को रंगकर संत के भेष में घूम रहे हैं। ऐसे छद्म भेषी लोग समाज को गुमराह कर रहे हैं और सनातन की साख को ठेस पहुंचा रहे हैं।

आहार शुद्धि से व्यसन मुक्ति का मार्ग अपनाना होगा
समाज और राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए अब हमें 'आहार शुद्धि से व्यसन मुक्ति' के इस पावन और वैज्ञानिक मार्ग को अपनाना ही होगा। जगद्गुरु ने कहा कि आज की नई पीढ़ी जो दुर्व्यसनों (बुरी आदतों और नशों) की ओर तेजी से आकर्षित हो रही है, उसका सबसे बड़ा कारण हमारे खान-पान का दूषित होना है। यदि हम अपनी संतानों को व्यसनों से दूर रखना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें 'आहार की शुद्धि' पर ध्यान देना होगा। ये जो समाज दिग्भ्रमित हो रहा है, दुर्व्यसनों की ओर आकर्षित हो रहा है। आहार की शुद्धि जरूरी है।

इस पर जोर देंगे तो हमारी संतान व्यसन की ओर नहीं जाएगी। मैं निश्चय पूर्वक यह कह रहा हूं कि जिनके यहां गाय है, बच्चे गाय के दूध-दही-घी का सेवन करते हैं, वे बड़े पदों पर पहुंच कर भी दुर्व्यसनों से दूर रहते हैं।शासन व समाज दोनों को ध्यान देना चाहिए कि जैसा खाए अन्न वैसा होगा मन...वाले सिद्धांत के अनुरूप व्यवस्था हो। प्राथमिक पाठशाला से विश्वविद्यालय तक बच्चों के गाय के दूध-दही-घी पर्याप्त मात्रा में सेवन के लिए मिलना चाहिए।आहार मुक्ति से व्यसन मुक्ति का मार्ग हमें चुनना चाहिए।

धर्मांतरण रुकेगा...पर प्रयास करने होंगे
धर्मांतरण निश्चित रूप से रुकेगा, लेकिन इसके लिए समाज और शासन को जमीनी स्तर पर गंभीर प्रयास करने होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल बाहरी विरोध करने के बजाय हिंदू समाज को अपनी जड़ों को मजबूत करना होगा। जो लोग अपनी जड़ों से कटकर भ्रमित हो रहे हैं, उसका सबसे बड़ा कारण आत्मज्ञान का अभाव है। उन्होंने कहा, जिन्हें अपने गौरवशाली इतिहास का वास्तविक बोध है और जिन्हें अपने हिंदू समाज की विशालता व वैज्ञानिकता की समझ है, वे कभी भी अपने मूल धर्म से अलग नहीं होंगे।

हमें विचार करने की जरूरत है कि तीन हजार साल पहले कौन सा धर्म था। हजरत मोहम्मद साहब से पहले मुस्लिम धर्म का कुछ अतापता नहीं था। ईसामसीह से पहले किसी को ईसाई धर्म के बारे में नहीं पता था। इससे पहले जो धर्म था उसका नाम था वैदिक हिंदू सनातन धर्म। पाठ्यक्रम के माध्यम से या घरों में संस्कार की पाठशाला खोलकर हमें इस विचारधारा से परिचित कराना चाहिए। इस विचार से धर्मांतरण रुकेगा।

गोरक्षपीठ का सेवा मॉडल : आध्यात्मिक और राष्ट्रीय क्रांति का मूल आधार
जगद्गुरु ने सनातन धर्म के सांगठनिक ढांचे को समझाते हुए कहा कि हमारे यहां साधु-संतों की सभी पवित्र परंपराओं को व्यापक रूप से 'षडवेश' कहा जाता है। इन छह मुख्य परंपराओं (संप्रदायों) के भीतर ही पूरा सनातन संप्रदाय समाहित है। इसमें नाथ पंथ का एक अत्यंत विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान है। इस महान परंपरा की शुरुआत स्वयं आदिनाथ भगवान शिव से हुई थी, जिन्होंने मच्छेंद्रनाथ जी को दिव्य उपदेश दिया था।

ऐसी मान्यता और सनातनी परंपरा है कि मच्छेंद्रनाथ जी के यहां स्वयं भगवान शिव ने ही 'गुरु गोरखनाथ' के रूप में अवतार लिया था। सनातन धर्म के पोषण, संरक्षण और संवर्धन में नाथ पंथ के इस पावन ज्ञान का अद्वितीय योगदान रहा है। हमें गोरक्षपीठाधीश्वर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के व्यवहार से सीख लेनी चाहिए। उनके गुरु महंत अवेद्यनाथ और उनके भी गुरु महंत दिग्विजय नाथ जी से भी सभी को लेनी चाहिए। इससे राष्ट्र में एक बड़ी क्रांति आ सकती है।

राजनीति में संत समाज की भूमिका पर कहा
राजनीति को स्वेच्छाचारिता से बचाने के लिए उस पर संतों और धर्म का नैतिक नियंत्रण होना अनिवार्य है। कुछ लोग कहेंगे कि संतों को राजनीति से क्या लेना-देना? परंतु हकीकत यह है कि संत भी इसी राष्ट्र के अन्न-जल का सेवन कर रहे हैं और समाज का दिया हुआ ही ग्रहण करते हैं। ऐसे में राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना उनका स्वाभाविक कर्तव्य है। यह सिद्धांत सिर्फ संतों पर ही नहीं, बल्कि इस पावन मातृभूमि पर पैदा होने वाले हर एक व्यक्ति पर लागू होता है कि वह राष्ट्र के उत्कर्ष और उसकी उन्नति के बारे में गहराई से विचार करे।

हमारे यहां राजनीति सदा संत के अनुशासन में होती रही। स्वेच्छाचारिता नहीं थी। हमारे यहां धर्मशास्त्रों में राज्याभिषेक का वर्णन है। सम्राट के अभिषेक के बाद दंडाधिकारी राजा एक दंड सौंपता है। सम्राट कहता है कि यह दंड मेरे हाथ में है, मैं धर्म की मर्यादा व सदाचार की मर्यादा के अनुसार सभी को अपने कर्तव्य का पालन करना होगा। इस मौके पर राजा के आचार्य उसकी पीठ पर हाथ रखकर कहते हैं कि यदि तुम भी मर्यादा का अतिक्रमण करोगे तो मैं तुम्हे दंड दूंगा। सत्पुरुषों का राजनीति पर नियंत्रण रहा है और रहना चाहिए। यदि ऐसा न हुआ तो राजनीति आसुरी नीति हो जाएगी। उत्तर प्रदेश की शासन व्यवस्था को एक संत ने किस तरह से कुशलतापूर्वक निर्वहन करके दिखाया है, इसका प्रमाण है। हम पहली बार सुन रहे हैं कि उत्तर प्रदेश से बाहर भी योगी जी मांग है कि उन्हें भी ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए।
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