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संवादहीनता ने लील ली तीन जिंदगियां

Sun, 15 Jul 2018 11:30 PM IST
kushinagar
kushinagar Updated Sun, 15 Jul 2018 11:30 PM IST
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Dialogue has taken three lives
अमर उजाला - फोटो : अमर उजाला
पडरौना। असाध्य रोग, पत्नी की मौत और बेटी की ससुराल से वापसी का तनाव झेल रहे रामनाथ को अगर सामाजिक संबल मिला होता तो शायद वे इतने कठोर निर्णय पर नहीं पहुंचे होते। एक साथ तीन मौत के बाद गांव के लोग भी इसे शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि एक साथ कमरे में तीन शव देखने के बाद भी सहज रहे लोग शाम होते-होते असहज हो गए। देर शाम तीनों शवों के अंतिम संस्कार में गांव के अधिकांश लोग पहुंचे। रविवार को भी पूरे दिन गांव के बीच पीपल के पेड़ के नीचे इसी घटना पर चर्चाएं होती रहीं।
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बढ़वलिया बुजुर्ग के महुआ टोला में करीब 70 घर हैं। ब्राह्मण, सैंथवार, गोड़ समेत कई बिरादरी की मिश्रित आबादी वाले इस गांव के 100 से अधिक नौजवान रोजगार के लिए देश के दूसरे शहर तो कुछ विदेश गए हैं। शनिवार की सुबह इस गांव के रामनाथ तथा उनकी दो बेटियों ज्योति व रोली सिंह के फांसी लगाकर आत्महत्या की खबर से हर परिवार कुछ देर के लिए अचंभित जरूर हुआ, लेकिन इस परिवार से सरोकार कम होने के चलते किसी के चेहरे पर शिकन नहीं थी। लेकिन शाम पांच बजे जब पोस्टमार्टम के बाद तीनों शव वापस गांव आया तो तब तक मानवीय संवेदनाएं जोर पकड़ चुकी थीं।
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गांव के 65 वर्षीय बुजुर्ग पूजन सिंह का कहना था कि अब से चार दशक पहले हर घर में भोजन व रुपयों की तंगी थी। कभी एक वक्त तो कभी फाकाकशी तक की नौबत आती थी लेकिन किसी ने कठिनाई से उबरने के लिए फांसी नहीं लगाई। ठगई गुप्ता भी इनसे सहमति जताते हुए कहते हैं कि संकट काल में एक दूसरे का साथ देना ही मानवता है। प्राइमरी स्कूल के अध्यापक जितेंद्र सिंह बताते हैं कि कुछ दिन पहले रामनाथ ने अनाज के संकट की बात कही तो उन्हें कोटेदार से अनाज दिलाया गया था। कोई बहुत गंभीर बात नहीं थी लेकिन असाध्य बीमारी की जानकारी होने पर व्यवहार बदल गया था। गांव के पूर्व प्रधान सुमंत पांडेय बताते हैं कि रामनाथ को करीब दो दशक से बीमारी थी। शुरू में लोगों का संबंध ठीक था तो सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन बीमारी की जानकारी के बाद जैसे-जैसे लोगों में बदलाव दिखा, रामनाथ अकेले पड़ते चले गए। चतुरानंद शुक्ल, श्यामबिहारी शर्मा, कमलेश कुमार गौड़ आदि भी गांव में सामाजिक तानाबाना और मजबूत बनाने पर जोर दे रहे थे। ग्राम प्रधान प्रतिनिधि जयधन कुमार गौड़ का कहना था कि ऐसी विपरीत परिस्थिति किसी भी व्यक्ति के सामने आ सकती है। ऐसे में आत्महत्या जैसा कदम उठाने की बजाय बातचीत के जरिए समस्या को समाधान खोजना ज्यादा बेहतर है। पत्नी की मौत के बाद से ही रामनाथ अपनी दोनों बेटियां ज्योति व रोली को साथ रखते थे। यहां तक कि गांव के चौराहे पर भी कोई सामान लेने जाने हो तो उनके दोनों तरफ बेटियां ही होती थीं। घटना की जानकारी होने पर सबसे पहले मौके पर पहुंचे लोगों का बताना था कि रामनाथ छत की बीच वाली कुंडी से लटके थे तो दोनों बेटियां दोनों तरफ थीं। रामनाथ व उनकी दोनों बेटियों का अंतिम संस्कार करने के बाद अब कर्मकांड की जिम्मेदारी उठा रहे उनके बड़े भाई रामनरेश सिंह की मानें तो बीते अप्रैल महीने से ही यह परिवार तनाव में था।
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