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Kushinagar News: ब्लड सेपरेशन यूनिट को लाइसेंस का इंतजार, मौसम बजा रहा खतरे की घंटी
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-सेपरेशन यूनिट के लिए लगाई जा चुकीं हैं मशीनें, डॉक्टर व एलटी को दिया जा चुका है प्रशिक्षण
संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल को ब्लड बैंक में बने ब्लड सेपरेशन यूनिट के लाइसेंस का इंतजार है। पिछले छह माह से यहां के ब्लड सेपरेशन यूनिट में मशीनों को लगाए जाने के साथ-साथ कर्मचारियों की भी ट्रेनिंग पूरी कराई जा चुकी है, लेकिन लाइसेंस के इंतजार में मशीनें धूल फांक रही हैं। अभी यहां पर मरीजों को होल ब्लड ही मिल पा रहा है और प्लाज्मा, पैकसेल और प्लेटलेट्स के लिए मरीजों को गोरखपुर या अन्य सेंटरों पर मजबूरी में जाना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल में ब्लड सेपरेशन यूनिट खुले करीब छह महीना हो चुका है, लेकिन अभी तक इसका लाइसेंस नहीं मिल पाने की वजह से मरीजों को प्लाज्मा, पैकसेल और प्लेटलेट्स के लिए गोरखपुर या हायर सेंटर जाना पड़ रहा है। गर्मी शुरू होते ही मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे डेंगू, मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। मेडिकल कॉलेज में मलेरिया से पीड़ित आने वाले मरीजों की संख्या में इजाफा हो गया है।
बीते साल जब मेडिकल कॉलेज में ब्लड सेपरेशन यूनिट के लिए मशीनों की खरीदारी हुई, तो डेंगू, मलेरिया, थैलिसीमिया, बर्न केस, एचआईवी के मरीजों के लिए आसानी से प्लाज्मा, पैकसेल, प्लेटलेट्स और आरबीसी मिलने के लिए उम्मीदें बढ़ गई। इसके लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर भेजकर दो डॉक्टर और दो एलटी स्टॉफ की ट्रेनिंग भी कराई गई, लेकिन लाइसेंस के इंतजार में अभी तक यह यूनिट अभी तक बंद है।
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-डेंगू : इसके मरीजों को प्लेटलेट्स की आवश्यकता होती है। मशीन की मदद से प्लेटलेट्स को ब्लड से अलग किया जाता है।
-थैलिसीमिया : इस रोग से पीड़ित मरीजों को आरबीसी (लाल रक्त कणिका) की आवश्यकता होती है। जिसे मशीन की मदद से अलग करके इसे मरीज को चढ़ाया जाता है।
-एड्स : इस रोग से पीड़ित मरीज को डब्ल्यूबीसी (श्वेत रक्त कणिका) की आवश्यकता होती है। डब्ल्यूबीसी को मशीन की मदद से खून से अलग कर इसे मरीज को चढ़ाया जाता है। ब्लड से डब्ल्यूबीसी अलग करने में यह मशीन कारगर साबित होती है।
-बर्न केस : इसमें पीड़ित को प्लाज्मा की जरूरत होती है। ब्लड सेपरेशन यूनिट से प्लाज्मा को ब्लड से अलग किया जाता है, लेकिन यहां इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है।
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-वर्जन
ब्लड बैंक के सेपरेशन यूनिट के लिए बीते साल के दिसंबर में लाइसेंस का आवेदन कर दिया गया है। लाइसेंस की प्रक्रिया शासन स्तर पर लंबित है और मिली जानकारी के अनुसार अगले एक महीने के भीतर ब्लड सेपरेशन यूनिट के लिए लाइसेंस आ जाने की उम्मीद है। उसके बाद यह यूनिट काम करना शुरू कर देगा।
-डॉ. आरके शाही, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज
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संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल को ब्लड बैंक में बने ब्लड सेपरेशन यूनिट के लाइसेंस का इंतजार है। पिछले छह माह से यहां के ब्लड सेपरेशन यूनिट में मशीनों को लगाए जाने के साथ-साथ कर्मचारियों की भी ट्रेनिंग पूरी कराई जा चुकी है, लेकिन लाइसेंस के इंतजार में मशीनें धूल फांक रही हैं। अभी यहां पर मरीजों को होल ब्लड ही मिल पा रहा है और प्लाज्मा, पैकसेल और प्लेटलेट्स के लिए मरीजों को गोरखपुर या अन्य सेंटरों पर मजबूरी में जाना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल में ब्लड सेपरेशन यूनिट खुले करीब छह महीना हो चुका है, लेकिन अभी तक इसका लाइसेंस नहीं मिल पाने की वजह से मरीजों को प्लाज्मा, पैकसेल और प्लेटलेट्स के लिए गोरखपुर या हायर सेंटर जाना पड़ रहा है। गर्मी शुरू होते ही मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे डेंगू, मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। मेडिकल कॉलेज में मलेरिया से पीड़ित आने वाले मरीजों की संख्या में इजाफा हो गया है।
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बीते साल जब मेडिकल कॉलेज में ब्लड सेपरेशन यूनिट के लिए मशीनों की खरीदारी हुई, तो डेंगू, मलेरिया, थैलिसीमिया, बर्न केस, एचआईवी के मरीजों के लिए आसानी से प्लाज्मा, पैकसेल, प्लेटलेट्स और आरबीसी मिलने के लिए उम्मीदें बढ़ गई। इसके लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर भेजकर दो डॉक्टर और दो एलटी स्टॉफ की ट्रेनिंग भी कराई गई, लेकिन लाइसेंस के इंतजार में अभी तक यह यूनिट अभी तक बंद है।
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-डेंगू : इसके मरीजों को प्लेटलेट्स की आवश्यकता होती है। मशीन की मदद से प्लेटलेट्स को ब्लड से अलग किया जाता है।
-थैलिसीमिया : इस रोग से पीड़ित मरीजों को आरबीसी (लाल रक्त कणिका) की आवश्यकता होती है। जिसे मशीन की मदद से अलग करके इसे मरीज को चढ़ाया जाता है।
-एड्स : इस रोग से पीड़ित मरीज को डब्ल्यूबीसी (श्वेत रक्त कणिका) की आवश्यकता होती है। डब्ल्यूबीसी को मशीन की मदद से खून से अलग कर इसे मरीज को चढ़ाया जाता है। ब्लड से डब्ल्यूबीसी अलग करने में यह मशीन कारगर साबित होती है।
-बर्न केस : इसमें पीड़ित को प्लाज्मा की जरूरत होती है। ब्लड सेपरेशन यूनिट से प्लाज्मा को ब्लड से अलग किया जाता है, लेकिन यहां इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है।
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-वर्जन
ब्लड बैंक के सेपरेशन यूनिट के लिए बीते साल के दिसंबर में लाइसेंस का आवेदन कर दिया गया है। लाइसेंस की प्रक्रिया शासन स्तर पर लंबित है और मिली जानकारी के अनुसार अगले एक महीने के भीतर ब्लड सेपरेशन यूनिट के लिए लाइसेंस आ जाने की उम्मीद है। उसके बाद यह यूनिट काम करना शुरू कर देगा।
-डॉ. आरके शाही, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज