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कुंडा कांड: मुख्य आरोपी बबलू बालिग करार
लखनऊ/ब्यूरो
Updated Thu, 30 May 2013 12:12 AM IST
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प्रतापगढ़ के कुंडा सीओ जिया उल हक की हत्या के मामले में मुख्य आरोपी योगेंद्र सिंह यादव उर्फ बबलू हत्या के वक्त बालिग था।
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किशोर न्याय बोर्ड लखनऊ ने बुधवार को यह निर्णय दिया। आरोपी के नाबालिगी के दावे के तौर पर अपनी दसवीं की मार्कशीट पेश की थी, जिसमें उसकी जन्म तिथि 15 मई 1996 दर्शाई गई थी।
बोर्ड ने इसकी जांच के लिए उसके शैक्षिक दस्तावेज मंगवाए थे, जिसमें काफी काटा-छांट पाई गई और जिसके आधार पर दसवीं की मार्कशीट में दर्ज उसकी जन्मतिथि को गलत करार दिया गया।
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बोर्ड ने अपराध के वक्त योगेंद्र की उम्र 18 वर्ष 2 महीने 15 दिन मानते हुए उसे जिला कारागार लखनऊ भेजने के निर्देश दिए।
कुंडा के तिहरे हत्याकांड की जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन के लिए यह एक बहुत बड़ी सफलता मानी जा रही है।
ब्यूरो ने योगेंद्र को बालिग साबित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था, तो वहीं दूसरी ओर जेजे बोर्ड के निर्णय को भी साहसिक माना जा रहा है जहां आरोपी द्वारा हेरफेर से तैयार दसवीं की मार्कशीट को बोर्ड ने नकार दिया।
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जेजे बोर्ड लखनऊ के प्रधान न्यायाधीश उदयवीर सिंह और बोर्ड सदस्यों दिनेश पांडेय और डॉ. रश्मि रस्तोगी ने अपने फैसले में लिखा कि शैक्षिक दस्तावेजों में यह स्पष्ट होता है कि जन्मतिथि को बदलने के लिए 2007-08 से लेकर बाद के वर्षों के शैक्षिक दस्तावेजों में दर्ज जन्मतिथि में कांट-छांट की गई। इस दौरान वह कक्षा 8 व 9 में था। इसी के आधार पर कक्षा 10 में अपनी उम्र करीब डेढ़ वर्ष कम लिखवा सका।
दावे की जांच जरूरी
बोर्ड ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) नियमावली 2007 के नियम 12(3)1 का उल्लेख करते हुए कहा कि आयु निर्धारण में दसवीं की मार्कशीट को प्रथम साक्ष्य के तौर पर माना गया है और उसके उपलब्ध न होने पर उसके पहली बार गए स्कूल से प्रमाण पत्र को स्वीकारा गया है।
इस दौरान ओमप्रकाश बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान मामले का उद्धरण दिया गया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ‘जघन्य अपराधों की स्थिति में अदालतों का यह दायित्व है कि वे आरोपियों के उम्र के दावों की गहन जांच करें और उम्र तय करने बेहद सावधानी बरतें। ताकि खुद को नाबालिग बताते हुए अपराधी सजा से न बच जाएं।’
हाथ से लिखना पड़ा फैसला
जेजे बोर्ड लखनऊ की खस्ताहाली ही कहेंगे कि राज्य सरकार के लिए किरकिरी बने कुंडा हत्याकांड के एक महत्वपूर्ण फैसले को लिखने के लिए बोर्ड के पास क्लर्क तक नहीं था। यहां नियुक्त एकमात्र क्लर्क छुट्टी पर था, नतीजतन बोर्ड की ही सदस्य डॉ. रश्मि रस्तोगी को 17 पेज का फैसला हाथ से लिखना पड़ा जिसमें घंटों लग गए।