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श्रीराम से जुड़ी जमीनों पर कब्जा, बौद्ध के स्थल ही गायब
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श्रीराम से जुड़ी जमीनों पर कब्जा, बौद्ध के स्थल ही गायब
- 13 साल पहले डीयू के शोध छात्रों ने की थी परलेयक वन, परलेयक हाथी के स्मारक, देव श्रव्य कुंड आदि की खोज
- महात्मा बुद्ध का एक विहार भी अस्तित्व में नहीं, बेपरवाह प्रशासन को नहीं है फिक्र
मंझनपुर। गंगा-यमुना के मध्य बसे दोआबा में जहां एक ओर प्रभु श्रीराम से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों की भूमि पर दबंगों का कब्जा है। वहीं, दूसरी ओर महात्मा बुद्ध से ताल्लुक रखने वाले ऐतिहासिक स्थल तो गायब ही हो गए हैं। हैरतअंगेज बात है कि तत्कालीन सम्राट महाराजा उदयन के मंत्री द्वारा बनवाया गया एक विहार भी धरातल पर नजर नहीं आ रहा है। कुछ स्थलों की खोज करीब 13 साल पहले डीयू से आई शोध छात्रों की टीम ने की थी। बेपरवाही है कि प्रशासन ने खुद कभी स्थलों की फिक्र नहीं की। जिस कारण मौजूदा पीढ़ी इन्हें भूल चुकी है।
बौद्ध धर्म ग्रंथों के मुताबिक ईशा से छह शताब्दी पहले महात्मा बुद्ध कौशाम्बी आए थे। उन्होंने यहां चौमासा गुजारा था। उनके सम्मान में तत्कालीन सम्राट महाराजा उदयन के मंत्री रहे घोषिताराम, कुक्कुटाराम, बद्रिकाराम व पवरिकाराम ने एक-एक विहार अपने नाम से बनवाए थे। बड़ी बात है कि पवरिकाराम द्वारा बनवाया गया विहार कहीं नजर ही नहीं आ रहा है। गनीमत है कि बाकी अस्तित्व में हैं। हालांकि यह शासन-प्रशासन की उपेक्षा का शिकार होने की बदौलत दिन-ब-दिन खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। वर्ष 2006 में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के शोध छात्रों की टीम अध्ययन करने कौशाम्बी आई थी। तब इस टीम ने महात्मा बुद्ध से जुड़े परलेयक वन, परलेयक हाथी के स्मारक, देव श्रव्य कुंड आदि की खोज की थी। शोध छात्र रहे डॉ. सुरेश नागर चौधरी तथा छात्रा डॉ. नेहा राय ने बताया कि इन स्थलों की खोज की जानकारी स्थानीय प्रशासन के साथ पर्यटन विभाग को भी दे दी गई थी। बेपरवाही की हद है कि किसी ने स्थलों की ओर ध्यान नहीं दिया। इसका नतीजा है कि यह अब तक अतीत के पन्नों पर ही सिमटे हुए हैं।
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महात्मा बुद्ध ने किया था कुंड में स्नान
मंझनपुर। शोध छात्रों ने बताया कि देव श्रव्य कुंड कौशाम्बी खास क्षेत्र में था। इसमें महात्मा बुद्ध ने स्नान किया था। इसका पानी आज भी कभी सूखता नहीं है। जानकारी के अभाव में ग्रामीण इसे तालाब समझ बैठे हैं और इसमें मवेशियों को पानी पिलाते हैं। प्रशासन ने विकास कराया होता तो आज कुंड की तस्वीर ही दूसरी होती। ये पर्यटन का केन्द्र भी बन चुका होता।
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पाली और बनी में था वन व स्मारक
मंझनपुर। शोध छात्र रहे डॉ. सुरेश नागर चौधरी ने बताया कि परलेयक वन तथा परलेयक हाथी का स्मारक पाली और बनी गांव में था। तक दोनों गांव वन क्षेत्र में आते थे। बाद में परलेयक के नाम से पाली गांव बना और वन को बनी कहा जाने लगा। परलेयक हाथी वन का राजा था। मौत के बाद उसका स्मारक बनाया गया था।
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बुद्ध के वियोग में दिया था प्राण
मंझनपुर। डॉ. सुरेश नागर चौधरी ने बताया कि महात्मा बुद्ध से परलेयक हाथी काफी प्रभावित हो गया था। चौमासा गुजारने के बाद बुद्ध जब कौशाम्बी से जा रहे थे तो हाथी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। बाद में बुद्ध के चले जाने पर उनके वियोग में उसने प्राण त्याग दिए। तभी तत्कालीन सम्राट ने स्मारक बनवाई थी।
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इनका कहना है
पवरिकाराम द्वारा बनवाया गया विहार अस्तित्व में नहीं है। शासन-प्रशासन को इसकी खोज कराना चाहिए। वर्ष 2006 में खोजे गए बौद्ध स्थलों की सुधि लेने वाला भी कोई नहीं है। इन स्थलों का विकास कराकर दोआबा में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
डॉ. सुरेश नागर चौधरी-शोध छात्र
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- 13 साल पहले डीयू के शोध छात्रों ने की थी परलेयक वन, परलेयक हाथी के स्मारक, देव श्रव्य कुंड आदि की खोज
- महात्मा बुद्ध का एक विहार भी अस्तित्व में नहीं, बेपरवाह प्रशासन को नहीं है फिक्र
मंझनपुर। गंगा-यमुना के मध्य बसे दोआबा में जहां एक ओर प्रभु श्रीराम से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों की भूमि पर दबंगों का कब्जा है। वहीं, दूसरी ओर महात्मा बुद्ध से ताल्लुक रखने वाले ऐतिहासिक स्थल तो गायब ही हो गए हैं। हैरतअंगेज बात है कि तत्कालीन सम्राट महाराजा उदयन के मंत्री द्वारा बनवाया गया एक विहार भी धरातल पर नजर नहीं आ रहा है। कुछ स्थलों की खोज करीब 13 साल पहले डीयू से आई शोध छात्रों की टीम ने की थी। बेपरवाही है कि प्रशासन ने खुद कभी स्थलों की फिक्र नहीं की। जिस कारण मौजूदा पीढ़ी इन्हें भूल चुकी है।
बौद्ध धर्म ग्रंथों के मुताबिक ईशा से छह शताब्दी पहले महात्मा बुद्ध कौशाम्बी आए थे। उन्होंने यहां चौमासा गुजारा था। उनके सम्मान में तत्कालीन सम्राट महाराजा उदयन के मंत्री रहे घोषिताराम, कुक्कुटाराम, बद्रिकाराम व पवरिकाराम ने एक-एक विहार अपने नाम से बनवाए थे। बड़ी बात है कि पवरिकाराम द्वारा बनवाया गया विहार कहीं नजर ही नहीं आ रहा है। गनीमत है कि बाकी अस्तित्व में हैं। हालांकि यह शासन-प्रशासन की उपेक्षा का शिकार होने की बदौलत दिन-ब-दिन खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। वर्ष 2006 में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के शोध छात्रों की टीम अध्ययन करने कौशाम्बी आई थी। तब इस टीम ने महात्मा बुद्ध से जुड़े परलेयक वन, परलेयक हाथी के स्मारक, देव श्रव्य कुंड आदि की खोज की थी। शोध छात्र रहे डॉ. सुरेश नागर चौधरी तथा छात्रा डॉ. नेहा राय ने बताया कि इन स्थलों की खोज की जानकारी स्थानीय प्रशासन के साथ पर्यटन विभाग को भी दे दी गई थी। बेपरवाही की हद है कि किसी ने स्थलों की ओर ध्यान नहीं दिया। इसका नतीजा है कि यह अब तक अतीत के पन्नों पर ही सिमटे हुए हैं।
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महात्मा बुद्ध ने किया था कुंड में स्नान
मंझनपुर। शोध छात्रों ने बताया कि देव श्रव्य कुंड कौशाम्बी खास क्षेत्र में था। इसमें महात्मा बुद्ध ने स्नान किया था। इसका पानी आज भी कभी सूखता नहीं है। जानकारी के अभाव में ग्रामीण इसे तालाब समझ बैठे हैं और इसमें मवेशियों को पानी पिलाते हैं। प्रशासन ने विकास कराया होता तो आज कुंड की तस्वीर ही दूसरी होती। ये पर्यटन का केन्द्र भी बन चुका होता।
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पाली और बनी में था वन व स्मारक
मंझनपुर। शोध छात्र रहे डॉ. सुरेश नागर चौधरी ने बताया कि परलेयक वन तथा परलेयक हाथी का स्मारक पाली और बनी गांव में था। तक दोनों गांव वन क्षेत्र में आते थे। बाद में परलेयक के नाम से पाली गांव बना और वन को बनी कहा जाने लगा। परलेयक हाथी वन का राजा था। मौत के बाद उसका स्मारक बनाया गया था।
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बुद्ध के वियोग में दिया था प्राण
मंझनपुर। डॉ. सुरेश नागर चौधरी ने बताया कि महात्मा बुद्ध से परलेयक हाथी काफी प्रभावित हो गया था। चौमासा गुजारने के बाद बुद्ध जब कौशाम्बी से जा रहे थे तो हाथी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। बाद में बुद्ध के चले जाने पर उनके वियोग में उसने प्राण त्याग दिए। तभी तत्कालीन सम्राट ने स्मारक बनवाई थी।
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इनका कहना है
पवरिकाराम द्वारा बनवाया गया विहार अस्तित्व में नहीं है। शासन-प्रशासन को इसकी खोज कराना चाहिए। वर्ष 2006 में खोजे गए बौद्ध स्थलों की सुधि लेने वाला भी कोई नहीं है। इन स्थलों का विकास कराकर दोआबा में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है।
डॉ. सुरेश नागर चौधरी-शोध छात्र