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किसकी नाव पर सवार होंगे ‘दलित’
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Thu, 12 Jan 2017 12:07 AM IST
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जिले की तीनों विधानसभा सीटों में दलित मतदाता सबसे ज्यादा हैं। जिस दल की ओर जाएंगे, उसकी काफी हद तक राह आसान कर देंगे। इनकी संख्या को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों ने इनको अपने पाले में खींचने की कवायद तेज कर दी है। इसके लिए दलित नेताओं को आगे कर दिया गया है।
जिले की तीनों विधानसभा सीट दलित बाहुल्य है। सबसे ज्यादा मंझनपुर में वोटर हैं। इसके बाद चायल और सिराथू में। 1993 में बसपा ने इन्हीं की बदौलत मंझनपुर व सिराथू पर कब्जा किया था। इसके बाद 2002 के चुनाव में बसपा तीनों सीट पर काबिज हुई। वर्ष 2007 के भी चुनाव में तीनों सीट बसपा ने झटक ली थी। दलित मतदाताओं को बसपा ने पाले में पूरी तरह से ले लिया था। सिराथू सीट में वर्ष 2012 में दलितों ने भाजपा की ओर रुख किया। परिणाम चौंकाने वाला था। भाजपा के केशव प्रसाद मौर्य के सिर सेहरा बंधा था। बसपा ने इस सीट पर एड़ीचोटी का जोर लगाया था, लेकिन वह दलितों को एकजुट रखने में कामयाब नहीं हो पाई थी।
अबकी होने वाले चुनाव में दलित मतदाताओं पर एक बार फिर सभी राजनीतिक दलों की निगाह टिक गई है। बसपा दलित व मुस्लिम गठजोड़ के भरोसे जीत का ख्वाब संजोए हैं। वहीं दूसरे दल इसमें सेंध लगाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। भाजपा दलित व पिछड़ी जाति के वोटों का ध्रुवीकरण कर अपनी नैया पार लगाने की फिराक में है। वहीं सपा पिछड़ी जाति व मुस्लिम मतदाताओं के भरोसे मैदान जीतने की कोशिश में जुटी है। यदि दलितों का वोट मिला तो वह उनके लिए बोनस होगा। चुनावी रणनीति का हिस्सा बने इन वोटरों को रिझाने के लिए दलित नेता सक्रिय हो गए हैं। राजनीतिक दलों की ओर से आए यह नेता बैठक आदि कर अपनी-अपनी पार्टी की नीतियां व विचार उन्हें बता रहे हैं। सबका मकसद एक ही है कि यह वोटर किसी भी कीमत पर उनसे मुंह न मोड़ने पाएं।
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बसपा से बागी हुए नेताओं की भूमिका होगी अहम
बसपा में भगदड़ मचने के दौरान जिले के भी कई नेताओं ने अपना पाल बदल लिया था। बसपा से कई नेताओं ने मुंह मोड़ लिया था। चुनाव के वक्त इन नेताओं की भूमिका अहम होगी। आशीष मौर्य, अमरनाथ कुशवाहा आदि लोग अपने समर्थकों के साथ बसपा को चुनौती दे रहे हैं।
बसपा में कैडर के नेता सक्रिय
दलित वोटों में बिखराव न होने पाए और दूसरे दल सेंध न लगाने पाए। इसके लिए बसपा में कैडर के नेता सक्रिय हो गए हैं। वह गांव-गांव जाकर मतदाताओं से बातचीत कर रहे हैं। साथ ही पिछली सरकार का हवाला देकर उन्हें एकजुट रखने का प्रयास कर रहे हैं।
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जिले की तीनों विधानसभा सीट दलित बाहुल्य है। सबसे ज्यादा मंझनपुर में वोटर हैं। इसके बाद चायल और सिराथू में। 1993 में बसपा ने इन्हीं की बदौलत मंझनपुर व सिराथू पर कब्जा किया था। इसके बाद 2002 के चुनाव में बसपा तीनों सीट पर काबिज हुई। वर्ष 2007 के भी चुनाव में तीनों सीट बसपा ने झटक ली थी। दलित मतदाताओं को बसपा ने पाले में पूरी तरह से ले लिया था। सिराथू सीट में वर्ष 2012 में दलितों ने भाजपा की ओर रुख किया। परिणाम चौंकाने वाला था। भाजपा के केशव प्रसाद मौर्य के सिर सेहरा बंधा था। बसपा ने इस सीट पर एड़ीचोटी का जोर लगाया था, लेकिन वह दलितों को एकजुट रखने में कामयाब नहीं हो पाई थी।
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अबकी होने वाले चुनाव में दलित मतदाताओं पर एक बार फिर सभी राजनीतिक दलों की निगाह टिक गई है। बसपा दलित व मुस्लिम गठजोड़ के भरोसे जीत का ख्वाब संजोए हैं। वहीं दूसरे दल इसमें सेंध लगाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। भाजपा दलित व पिछड़ी जाति के वोटों का ध्रुवीकरण कर अपनी नैया पार लगाने की फिराक में है। वहीं सपा पिछड़ी जाति व मुस्लिम मतदाताओं के भरोसे मैदान जीतने की कोशिश में जुटी है। यदि दलितों का वोट मिला तो वह उनके लिए बोनस होगा। चुनावी रणनीति का हिस्सा बने इन वोटरों को रिझाने के लिए दलित नेता सक्रिय हो गए हैं। राजनीतिक दलों की ओर से आए यह नेता बैठक आदि कर अपनी-अपनी पार्टी की नीतियां व विचार उन्हें बता रहे हैं। सबका मकसद एक ही है कि यह वोटर किसी भी कीमत पर उनसे मुंह न मोड़ने पाएं।
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बसपा से बागी हुए नेताओं की भूमिका होगी अहम
बसपा में भगदड़ मचने के दौरान जिले के भी कई नेताओं ने अपना पाल बदल लिया था। बसपा से कई नेताओं ने मुंह मोड़ लिया था। चुनाव के वक्त इन नेताओं की भूमिका अहम होगी। आशीष मौर्य, अमरनाथ कुशवाहा आदि लोग अपने समर्थकों के साथ बसपा को चुनौती दे रहे हैं।
बसपा में कैडर के नेता सक्रिय
दलित वोटों में बिखराव न होने पाए और दूसरे दल सेंध न लगाने पाए। इसके लिए बसपा में कैडर के नेता सक्रिय हो गए हैं। वह गांव-गांव जाकर मतदाताओं से बातचीत कर रहे हैं। साथ ही पिछली सरकार का हवाला देकर उन्हें एकजुट रखने का प्रयास कर रहे हैं।