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जागरूकता से ही रुकेगी मातृ-शिशु मृत्युदर
ब्यूरो/अमर उजाला कौशाम्बी
Updated Thu, 08 Jan 2015 12:28 AM IST
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मंझनपुर (ब्यूरो)। प्रसूताओं और नवजात शिशुओं की सही देखभाल से ही मातृ-शिशु मृत्युदर में कमी लाई जा सकती है। यह सीख जिला अस्पताल में पांच दिवसीय आशा कार्यकत्रियों के बुधवार से शुरू हुए प्रशिक्षण में प्रशिक्षकों ने कही। उन्होंने गांव की महिलाओं को इसके लिए जागरूक बनाने का आह्वान किया।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना के तहत महकमा मातृ-शिशु मृत्युदर में कमी लाने की कवायद में जुटा है। इसके लिए गांव-गांव प्रसूताओं की निगरानी को तैनात की गईं आशाओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है। इसीक्रम में बुधवार से जिला अस्पताल में पांच दिवसीय प्रशिक्षण भी शुरू हुआ। इसमें सिराथू ब्लाक की 30 आशाएं शामिल हैं।
इन्हें प्रशिक्षिका महरोज फातिमा, दीपिका श्रीवास्तव और रीतू सिंह ने प्रसूताओं की देखभाल, उन्हें खानपान की जानकारी देने, समय से बीमारियों से बचाव के टीके लगवाने और प्रसव काल के दौरान समय से चेकअप कराते रहने की सीख दी। वहीं युवतियों को नवजातों की देखभाल की जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाने की जानकारी दी गई। प्रशिक्षिका दीपिका श्रीवास्तव ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं की जागरूकता से ही मातृ-शिशु मृत्युदर में कमी लाई जा सकती है। ऐसे में महिलाओं को जागरूक करने की सबसे अहम जिम्मेदारी गांव में तैनात आशा कार्यकत्रियों को ही निभानी होगी। तभी समाज को स्वस्थ रखा जा सकता है।
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राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना के तहत महकमा मातृ-शिशु मृत्युदर में कमी लाने की कवायद में जुटा है। इसके लिए गांव-गांव प्रसूताओं की निगरानी को तैनात की गईं आशाओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है। इसीक्रम में बुधवार से जिला अस्पताल में पांच दिवसीय प्रशिक्षण भी शुरू हुआ। इसमें सिराथू ब्लाक की 30 आशाएं शामिल हैं।
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इन्हें प्रशिक्षिका महरोज फातिमा, दीपिका श्रीवास्तव और रीतू सिंह ने प्रसूताओं की देखभाल, उन्हें खानपान की जानकारी देने, समय से बीमारियों से बचाव के टीके लगवाने और प्रसव काल के दौरान समय से चेकअप कराते रहने की सीख दी। वहीं युवतियों को नवजातों की देखभाल की जानकारी देकर उन्हें जागरूक बनाने की जानकारी दी गई। प्रशिक्षिका दीपिका श्रीवास्तव ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं की जागरूकता से ही मातृ-शिशु मृत्युदर में कमी लाई जा सकती है। ऐसे में महिलाओं को जागरूक करने की सबसे अहम जिम्मेदारी गांव में तैनात आशा कार्यकत्रियों को ही निभानी होगी। तभी समाज को स्वस्थ रखा जा सकता है।
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