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दो जिलों के मतदाता चुनते हैं कौशाम्बी का सांसद
Thu, 18 Apr 2019 07:45 PM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कौशाम्बी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कौशाम्बी
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 18 Apr 2019 07:45 PM IST
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मतदाता
- फोटो : Amar Ujala
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नाम और क्षेत्र में परिवर्तन के साथ वर्ष 2009 के चुनाव से अस्तित्व में आई कौशाम्बी संसदीय सीट के लिए दो जिलों के मतदाता वेट डालते हैं। इस लोकसभा सीट के तहत आने वाली पांच में दो विधानसभाएं प्रतापगढ़ व तीन कौशाम्बी की हैं।
आजादी के बाद से इस क्षेत्र का चार बार परिसीमन हो चुका है। वर्ष 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र के लोग इलाहाबाद ईष्ट कम जौनपुर वेस्ट संसदीय सीट के लिए वोट करते थे। पांच साल बाद हुए दूसरे लोकसभा चुनाव में यह क्षेत्र फूलपुर संसदीय सीट में शामिल हो गया। फिर 1962 में ही लोकसभा सीट चायल (सुरक्षित) वजूद में आ गई।
उस वक्त तत्कालीन इलाहाबाद (अब का प्रयागराज) की शहर पश्चिमी व फतेहपुर जनपद की खागा विधानसभा के साथ ही जिले की मंझनपुर, चायल और सिराथू समेत पांच विधानसभाएं शामिल थी। 47 साल बाद एक बार फिर परिसीमन में सीट बदल गई।
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2009 के 15वें लोकसभा चुनाव में चायल (सुरक्षित) में शामिल रही इलाहाबाद और फतेहपुर जनपद की दोनों विधानसभाओं को काटकर प्रतापगढ़ के कुंडा और बाबागंज को जोड़ दी गई। इसका नाम कौशाम्बी (सुरक्षित) संसदीय कर दिया गया। इस सीट पर हुए पहले चुनाव में सपा के शैलेंद्र कुमार सांसद निर्वाचित हुए। जबकि 2014 में भाजपा के विनोद सोनकर विजयी हुए।
दूरी के चलते रहती है भागदौड़
कौशाम्बी संसदीय सीट में जिले की चायल, मंझनपुर और सिराथू विधानसभा के साथ प्रतापगढ़ जनपद के कुंडा तथा बाबागंज जोड़ने से जनप्रतिनिधियों और जनता दोनों को दिक्कतें होती हैं। दोनों क्षेत्रों के लोगों के अलग-अलग होने की वजह से अधिक जुड़ाव नहीं है।
बड़े नेताओं की जनसभाएं कौशाम्बी में लगती हैं। जबकि दो विधानसभा क्षेत्र के मतदाता दूसरे जिले में होते हैं। कुंडा और बाबागंज विधानसभा की दूरी अधिक होने के कारण प्रत्याशियों को प्रचार में काफी दिक्कत होती है।
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आजादी के बाद से इस क्षेत्र का चार बार परिसीमन हो चुका है। वर्ष 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र के लोग इलाहाबाद ईष्ट कम जौनपुर वेस्ट संसदीय सीट के लिए वोट करते थे। पांच साल बाद हुए दूसरे लोकसभा चुनाव में यह क्षेत्र फूलपुर संसदीय सीट में शामिल हो गया। फिर 1962 में ही लोकसभा सीट चायल (सुरक्षित) वजूद में आ गई।
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उस वक्त तत्कालीन इलाहाबाद (अब का प्रयागराज) की शहर पश्चिमी व फतेहपुर जनपद की खागा विधानसभा के साथ ही जिले की मंझनपुर, चायल और सिराथू समेत पांच विधानसभाएं शामिल थी। 47 साल बाद एक बार फिर परिसीमन में सीट बदल गई।
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2009 के 15वें लोकसभा चुनाव में चायल (सुरक्षित) में शामिल रही इलाहाबाद और फतेहपुर जनपद की दोनों विधानसभाओं को काटकर प्रतापगढ़ के कुंडा और बाबागंज को जोड़ दी गई। इसका नाम कौशाम्बी (सुरक्षित) संसदीय कर दिया गया। इस सीट पर हुए पहले चुनाव में सपा के शैलेंद्र कुमार सांसद निर्वाचित हुए। जबकि 2014 में भाजपा के विनोद सोनकर विजयी हुए।
दूरी के चलते रहती है भागदौड़
कौशाम्बी संसदीय सीट में जिले की चायल, मंझनपुर और सिराथू विधानसभा के साथ प्रतापगढ़ जनपद के कुंडा तथा बाबागंज जोड़ने से जनप्रतिनिधियों और जनता दोनों को दिक्कतें होती हैं। दोनों क्षेत्रों के लोगों के अलग-अलग होने की वजह से अधिक जुड़ाव नहीं है।
बड़े नेताओं की जनसभाएं कौशाम्बी में लगती हैं। जबकि दो विधानसभा क्षेत्र के मतदाता दूसरे जिले में होते हैं। कुंडा और बाबागंज विधानसभा की दूरी अधिक होने के कारण प्रत्याशियों को प्रचार में काफी दिक्कत होती है।