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हालैंड की रजनीगंधा से महकेगा कौशाम्बी
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
Updated Sun, 12 Mar 2017 10:30 PM IST
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कौशाम्बी
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कौशाम्बी की फिजां में अब हालैंड के रजनीगंधा (सुंगधराज) की भीनी-भीनी खुशबू महकेगी। इस विदेशी रजनीगंधा की खेती जिले में शुरू हो गई है। अब इसे वृहद रूप देने की तैयारी उद्यान विभाग कर रहा है। चमेली, गुलाब की खेती के बाद रजनीगंधा की खेती कराने के लिए उद्यान विभाग ने खाका खींच लिया है। यमुना की तराई से इसकी शुरूआत हो चुकी है। इस खेती से किसान अच्छी आय कमा रहे हैं।
गौतम बुद्ध की नगरी कौशाम्बी में सुगंधराज की खुशबू शांति का पैगाम देगी। सुगंधराज (रजनीगंधा) की महक से जल्द ही दोआबा सराबोर होगा। किसानों को मालामाल करने वाली यह खेती सजावट में भी अहम भूमिका निभाएगी। जेट्रोफा, गुलाब के बाद रजनीगंधा की भी खेती की शुरूआत हो गई है। उद्यान विभाग ने यमुना की तराई में करीब तीन बीघे में 75 हजार पौध रोपित कराया है। शाहपुर गांव के किसान ओम प्रकाश और उदय नारायण भीनी खुशबू बिखेरने वाले रजनीगंधा की खेती शुरू कर दी है। अपर जिला उद्यान अधिकारी मेवाराम ने बताया कि हालैंड से रजनीगंधा के पौधे मंगाकर रोपित कराए गए हैं। इस खेती से एक बीघे में एक से डेढ़ लाख रुपये की सालाना आमदनी होती है। रंजनीगंधा के फूलों को बेचने के लिए किसानों को कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। कारोबारी खुद चलकर उनके पास आएंगे। इस खेती में विपणन की समस्या नही है। मार्केट में इसकी डिमांड होने के कारण किसानों को ज्यादा हाथ-पैर नहीं चलाना पड़ेगा।
सजावट में दिखता है अलग अंदाज
रजनीगंधा के फूल मैदानी क्षेत्रों में अप्रैल से सितंबर और पहाड़ी क्षेत्रों में जून से सितंबर माह में खिलते हैं। रजनीगंधा की तीन किस्में होती है। रजनीगंधा के फूलों का उपयोग माला और गुलदस्ता बनाने में किया जाता है। इसकी लंबी डंडियों को सजावट के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
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औषधीय गुणों से भरपूर है रंजनीगंधा
रजनीगंधा के सुगंधित फूलों को चाकलेट से निर्मित पेय पदार्थों में शक्तिवर्धक औषधियों के साथ मिलाकर सेवन किया जाता है। इसके कंदों को हल्दी और मक्खन के साथ पेस्ट कर कील मुहासों में भी प्रयोग किया जाता है। विदेशों में इसके फूलों का सेवन सूप के साथ भी लोग करते हैं।
8-10 रुपये में बिकती है एक कली
सुगंधराज यानि रजनीगंधा की एक कली 8-10 रुपये में बिकती है। रोपाई के तीन महीने बाद यह खेती तैयार होती है। एक बार रोपित होने के बाद यह पौधे तीन साल तक फूल देते हैं।
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गौतम बुद्ध की नगरी कौशाम्बी में सुगंधराज की खुशबू शांति का पैगाम देगी। सुगंधराज (रजनीगंधा) की महक से जल्द ही दोआबा सराबोर होगा। किसानों को मालामाल करने वाली यह खेती सजावट में भी अहम भूमिका निभाएगी। जेट्रोफा, गुलाब के बाद रजनीगंधा की भी खेती की शुरूआत हो गई है। उद्यान विभाग ने यमुना की तराई में करीब तीन बीघे में 75 हजार पौध रोपित कराया है। शाहपुर गांव के किसान ओम प्रकाश और उदय नारायण भीनी खुशबू बिखेरने वाले रजनीगंधा की खेती शुरू कर दी है। अपर जिला उद्यान अधिकारी मेवाराम ने बताया कि हालैंड से रजनीगंधा के पौधे मंगाकर रोपित कराए गए हैं। इस खेती से एक बीघे में एक से डेढ़ लाख रुपये की सालाना आमदनी होती है। रंजनीगंधा के फूलों को बेचने के लिए किसानों को कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। कारोबारी खुद चलकर उनके पास आएंगे। इस खेती में विपणन की समस्या नही है। मार्केट में इसकी डिमांड होने के कारण किसानों को ज्यादा हाथ-पैर नहीं चलाना पड़ेगा।
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सजावट में दिखता है अलग अंदाज
रजनीगंधा के फूल मैदानी क्षेत्रों में अप्रैल से सितंबर और पहाड़ी क्षेत्रों में जून से सितंबर माह में खिलते हैं। रजनीगंधा की तीन किस्में होती है। रजनीगंधा के फूलों का उपयोग माला और गुलदस्ता बनाने में किया जाता है। इसकी लंबी डंडियों को सजावट के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
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औषधीय गुणों से भरपूर है रंजनीगंधा
रजनीगंधा के सुगंधित फूलों को चाकलेट से निर्मित पेय पदार्थों में शक्तिवर्धक औषधियों के साथ मिलाकर सेवन किया जाता है। इसके कंदों को हल्दी और मक्खन के साथ पेस्ट कर कील मुहासों में भी प्रयोग किया जाता है। विदेशों में इसके फूलों का सेवन सूप के साथ भी लोग करते हैं।
8-10 रुपये में बिकती है एक कली
सुगंधराज यानि रजनीगंधा की एक कली 8-10 रुपये में बिकती है। रोपाई के तीन महीने बाद यह खेती तैयार होती है। एक बार रोपित होने के बाद यह पौधे तीन साल तक फूल देते हैं।