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परम सौभाग्य: त्रेता के बाद द्वापर युग में भी कौशाम्बी आए थे भगवान विष्णु अवतार

Sat, 20 Jan 2024 03:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी Updated Sat, 20 Jan 2024 03:41 AM IST
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Great good fortune: After Treta, Lord Vishnu incarnation came to Kaushambi in Dwapar Yuga also
संदीपन घाट ​स्थित महंत त्यागी बाबा मंदिर। संवाद
कौशाम्बी की धरती पर भगवान विष्णु ने दो बार चरण रखे थे। त्रेता युग में वनगमन के समय भगवान श्री राम इसी धरती पर चरण रख रखकर गए थे। जबकि द्वापर में भगवान श्री कृष्ण ने इसी धरती पर संदीपन मुनि से शिक्षा दीक्षा ली थी। इतना ही नहीं भगवान श्री कृष्ण कौशम्बी की धरती पर बहेलिये के तीर लगने के बाद गोलोकवासी हुए।
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अयोध्या में राम मंदिर को लेकर उत्सव का माहौल है। कौशाम्बी में भी लोग काफी उत्साहित है। क्योंकि भगवान विष्णु ने त्रेता व द्वापर में अवतार लेने के बाद दोनों बार यहां चरण रखे थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी के शोध छात्र सुरेश नागर चौधरी ने बताया कि वन में 14 साल तक रहने के दौरान भगवान राम ने 249 स्थानों पर विश्राम किया था। इनमें कौशाम्बी में चरवा भी शामिल है।
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चरवा को अयोध्या से निकलने के बाद भगवान के 16वें विश्रामस्थल के रूप में चिह्नित किया है। चरवा स्थित रामजूठा तालाब को पहले से ही रामविश्राम स्थल के रूप में यहां के लोग जानते-मानते रहे हैं। इसी तरह बांके बिहारी भगवान श्रीकृष्ण के पवित्र कदम गंगा-यमुना के बीच बसे कौशाम्बी में पड़े।
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द्वापर में बांके बिहारी का जिक्र होते ही मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल से लेकर द्वारका तक का नाम आ जाता है। पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक कन्हैया का बड़ा नजदीक रिश्ता कौशाम्बी से भी रहा।
पंडित ज्ञानेंद्र शास्त्री ने बताया कि पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक कन्हैया को बचपन में ऋषि संदीपन ने शिक्षा दीक्षा दी थी। ऋषि संदीपन का आश्रम कोखराज क्षेत्र के गंगा घाट पास है। इसे संदीपन आश्रम के नाम से जाना जाता है। कहते हैं इसी आश्रम में ऋषि संदीपन पूरे आर्यावर्त के छात्रों को शिक्षा-दीक्षा देते थे।
ग्रंथों में बताया गया कि बचपन में कन्हैया ने इसी आश्रम में बाल गोपालों के साथ शिक्षा दीक्षा ग्रहण की थी। श्रीकृष्ण की दूसरी याद यमुना किनारे स्थित जैन मंदिर से भी जुड़ी है। जैन संप्रदाय के लोग श्रीकृष्ण को अपना तीर्थंकर मानते हैं।
भैला मकदूमपुर के अखिल जैन का कहना है कि जीवन के अंतिम दिनों में श्रीकृष्ण कौशाम्बी आए थे। उन्होंने काफी समय इस पवित्र भूमि पर गुजारा। जैनियों में मान्यता है कि श्रीकृष्ण कौशाम्बी में ही एक बहेलिया के तीर का शिकार होकर गोलोकवासी हुए। उनके जीवन के अंतिम दिनों का गवाह यमुना किनारे का एक मंदिर है। इसमे उभरे पदचिन्ह को श्रीकृष्ण का मानकर पूरी आस्था से पूजन करते हैं।

22 जनवरी को कौशाम्बी के मंदिरों में उत्सव मनाया जाएगा। मंदिरों की साफ-सफाई हो गई है। संदीपन घाट आश्रम में मंदिर के पुजारी अमरदीप गिरी का कहना है पूजित अक्षत मिला है। मंदिर की सजावट करने के साथ ही 21 जनवरी से कीर्तन-भजन का कार्यक्रम रखा है। 22 को भंडारे का आयोजन होगा।
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