बालिका दिवस विशेष: दो बहनें, एक सपना, डॉक्टर बनकर करना चाहती हैं लोगों की सेवा
डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करना और अपने जिले में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना। अजुहा की सगी बहनें स्वरांजलि अग्रहरि और जाह्नवी अग्रहरि इसी सपने को पूरा करने की राह पर हैं।
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डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करना और अपने जिले में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना। अजुहा की सगी बहनें स्वरांजलि अग्रहरि और जाह्नवी अग्रहरि इसी सपने को पूरा करने की राह पर हैं। स्वरांजलि ने नीट में 585 अंक हासिल कर ऑल इंडिया रैंक 15,604 प्राप्त की, जबकि जाह्नवी को 551 अंक के साथ 36,361वीं रैंक मिली। बालिका दिवस पर दोनों बहनों ने अपनी तैयारी, संघर्ष और भविष्य के सपनों को साझा किया।
अजुहा के वार्ड नंबर 12 निवासी 19 वर्षीय स्वरांजलि ने बताया कि दूसरी कक्षा में ही डॉक्टर बनने की इच्छा जागी थी। नानाजी और माता-पिता भी उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे। समाज की सेवा करने की चाह ने उनके सपने को और मजबूत किया। वहीं, 18 वर्षीय जाह्नवी ने भी बचपन से डॉक्टर बनने का लक्ष्य बनाया था। माता-पिता के सहयोग से उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी तैयारी जारी रखी।
कम अंकों से निराशा, फिर की मेहनत
स्वरांजलि ने बताया कि मॉक टेस्ट में कम अंक आने पर कई बार आत्मविश्वास डगमगाता था। पहले प्रयास में उन्हें 492 अंक मिले थे। उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं आने पर निराशा हुई, लेकिन उन्होंने दोबारा कोशिश की। शिक्षकों के मार्गदर्शन और नियमित पढ़ाई से सफलता हासिल की। जाह्नवी को भी शुरुआती प्रयासों में सफलता नहीं मिली। एक बार कठिन प्रश्नपत्र देखकर उन्हें लगा कि शायद इस बार भी चयन नहीं होगा। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और तीसरे प्रयास में नीट पास कर लिया।
स्वरांजलि रोजाना 12 से 13 घंटे पढ़ाई करती थीं। सुबह आठ से दोपहर तीन बजे तक ऑनलाइन कक्षाएं चलती थीं। इसके बाद वह नोट्स पढ़ने और दोहराव में समय देती थीं। स्कूल के शिक्षकों ने भी उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया। अब उन्हें रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज, बांदा में प्रवेश मिला है। वह आगे सर्जरी के क्षेत्र में काम करना चाहती हैं।
जाह्नवी ने कक्षा 12 तक घर पर रहकर पढ़ाई की। इसके बाद एक साल ऑनलाइन तैयारी की और फिर कोचिंग के लिए कानपुर के काकादेव में रहना पड़ा। घर से दूर रहना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन माता-पिता ने हर कदम पर साथ दिया। उन्हें छत्तीसगढ़ के रायपुर में डेंटल कॉलेज आवंटित हुआ है।
बेटियों को मिलें बराबर अवसर
स्वरांजलि के पिता संतोष कुमार सरकारी शिक्षक हैं। उन्होंने गणित और भौतिक विज्ञान में मदद की। मां अमिता अग्रहरि ने घर के कामों से दूर रखकर पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। स्वरांजलि का मानना है कि बेटियों को भी लड़कों की तरह शिक्षा और करियर के बराबर अवसर मिलने चाहिए।
जिले में अस्पताल खोलने का सपना
स्वरांजलि आगे चलकर सर्जन बनना चाहती हैं। जाह्नवी का सपना अपने जिले में ऐसा अस्पताल खोलने का है, जहां कम कीमत पर इलाज मिल सके। दोनों बहनों का संदेश है कि बेटियों को अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखना चाहिए। जाह्नवी कहती हैं, “लड़कियों, तुमको झुकना नहीं है, बस आगे बढ़ना है। एक बार करके दिखा दो, लोग भी सहयोग करने लगेंगे।”