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दोआबा में धूमधाम से मनाई गई देवोत्थान एकादशी, शुभ कार्य आरंभ
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Dev diwali celebrated with full of joy in district, all good works begins
- फोटो : KAUSHAMBI
मंझनपुर। दोआबा में बुधवार को देवोत्थान एकादशी (डिठवन) परंपरागत तरीके से मनाया गया। इस मौके पर घरो, प्रतिष्ठानों और खेत-खलिहानों में दिवाली जलाई गई। बच्चों और युवाओं ने पटाखे छुड़ाए। इसी के साथ शुभ काम भी प्रारंभ कर दिए गए।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी अथवा प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। दोआबा में इसे डिठवन के नाम से जानते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने दैत्य शंखासुर को मारा था। इस राक्षस को मारने से पहले भगवान विष्णु का उससे लंबे समय तक युद्ध चलता रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु थक कर क्षीरसागर में जाकर सो गए और चार मास बाद सीधे कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे। तब सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु का पूजन किया।
इसी वजह से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। एक अन्य कथा के मुताबिक एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा कि आप रात-दिन जगते हैं या फिर लाखों-करोड़ों वर्ष तक योग निद्रा में ही रहते हैं। इससे संसार के समस्त प्राणियों को उस दौरान तमाम परेशानियों से जूझना पड़ता है। इसलिए आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें।
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इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा। इस पर भगवान विष्णु ने कहा मेरे जागने से सब देवों और खासकर तुमको कष्ट होता है। इसलिए अब मैं प्रतिवर्ष चार माह वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। इसके बाद जिस दिन भगवान विष्णु निद्रा से जगते है। वह दिन देवोत्थान एकादशी कहलाता है। बुधवार को देवोत्थान एकादशी थी। इसे लेकर सुबह से ही लोगों में उत्साह रहा। बाजार में लाई-गट्ठा और मिठाई की दुकानों में भीड़ रही। साथ ही इस दिन लोगों ने घर की साफ.-सफाई भी किया। शाम को दीपावली की तरह घरों, प्रतिष्ठानों और खेत-खलिहानों में दिवाली जलाई गई। बच्चों ने इस अवसर पर खूब पटाखे दागे। कुछ लोगो ने व्रत रखकर भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा की।
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कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी अथवा प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। दोआबा में इसे डिठवन के नाम से जानते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने दैत्य शंखासुर को मारा था। इस राक्षस को मारने से पहले भगवान विष्णु का उससे लंबे समय तक युद्ध चलता रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु थक कर क्षीरसागर में जाकर सो गए और चार मास बाद सीधे कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे। तब सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु का पूजन किया।
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इसी वजह से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। एक अन्य कथा के मुताबिक एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा कि आप रात-दिन जगते हैं या फिर लाखों-करोड़ों वर्ष तक योग निद्रा में ही रहते हैं। इससे संसार के समस्त प्राणियों को उस दौरान तमाम परेशानियों से जूझना पड़ता है। इसलिए आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें।
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इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा। इस पर भगवान विष्णु ने कहा मेरे जागने से सब देवों और खासकर तुमको कष्ट होता है। इसलिए अब मैं प्रतिवर्ष चार माह वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। इसके बाद जिस दिन भगवान विष्णु निद्रा से जगते है। वह दिन देवोत्थान एकादशी कहलाता है। बुधवार को देवोत्थान एकादशी थी। इसे लेकर सुबह से ही लोगों में उत्साह रहा। बाजार में लाई-गट्ठा और मिठाई की दुकानों में भीड़ रही। साथ ही इस दिन लोगों ने घर की साफ.-सफाई भी किया। शाम को दीपावली की तरह घरों, प्रतिष्ठानों और खेत-खलिहानों में दिवाली जलाई गई। बच्चों ने इस अवसर पर खूब पटाखे दागे। कुछ लोगो ने व्रत रखकर भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा की।
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