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‘चौधरी’ के बाद चायल में नहीं जीते सवर्ण
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Fri, 06 Jan 2017 12:29 AM IST
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चायल विधानसभा सीट तीन बार आरक्षण मुक्त हुई। एक बार ही सवर्ण उम्मीदवार को इस सीट पर कामयाबी मिली। पहले चुनाव से लेकर अब तक दलित व मुस्लिम उम्मीदवाराें ने ही इस सीट पर कब्जा जमाए रखा। वर्ष 2012 में सीट सामान्य हुई तो सवर्णों को एक बड़ा मौका मिला था, लेकिन जातीय समीकरण ऐसे बने कि बसपा के आसिफ जाफरी के ही हाथ बाजी लगी।
वर्ष 1951 में पहली बार हुए चुनाव में चायल सीट सामान्य थी। जातीय समीकरणों को देखते हुए इस सीट से कांग्र्रेस ने सैय्यद मुजफ्फर हुसैन को उतारा था। हुसैन के खिलाफ स्वतंत्र प्रत्याशी कल्लन मैदान में उतरे थे। सैय्यद मुजफ्फर हुसैन ने भारी अंतर से चुनाव जीता था। इसके बाद दोबारा हुए चुनाव में मुजफ्फर हुसैन ने बाजी मारी थी। वर्ष 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) के टिकट से चौधरी नौनिहाल सिंह चायल से चुनाव लड़े। चौधरी के सामने कांग्रेस की प्रत्याशी कमल कुमारी गोइंदी थीं। चौधरी ने लगभग पांच हजार मतों से कमल कुमारी गोइंदी को हराया था।
इस चुनाव के बाद से इस सीट पर सवर्ण उम्मीदवारों को जीत नहीं मिली। 1962 के बाद चायल सीट आरक्षित हो गई थी। दलित प्रत्याशी ही चुनाव लड़ते रहे। 2012 में नए परिसीमन के तहत चायल सीट फिर सामान्य हुई। सवर्णों को एक बड़ा मौका मिला था, लेकिन पिछले चुनाव में सवर्णों की मंशा पर जातीय समीकरण ने पानी फेर दिया। दलित व मुस्लिम गठजोड़ का बसपा प्रत्याशी आसिफ जाफरी ने फायदा उठाया और वह सपा प्रत्याशी रहे चंद्रबली पटेल को मामूली अंतर से मात देकर विधायक बन गए थे। अबकी इस सीट पर स्थितियां कुछ बदली हैं। बसपा अपने पुराने समीकरण पर ही चुनाव लड़ेगी। सपा ने पैतरा बदला है। भाजपा भी सवर्ण उम्मीदवार पर दांव खेलने की तैयारी में है। किसको कितनी कामयाबी मिलेगी, यह तो मतदाता ही तय करेगा।
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पहले चायल नार्थ के नाम से जानी जाती थी सीट
चायल सीट पहले चायल नार्थ के नाम से जानी जाती थी। इसमें इलाहाबाद का एक बड़ा हिस्सा भी आता था। इसलिए इसको चायल नार्थ नाम भी मिला था। 1957 में हुए चुनाव में इस सीट को चायल सीट घोषित किया गया, तब से यह सीट इसी नाम से जानी जाती है।
जातीय समीकरणों पर टिकी चुनावी जंग
आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होते ही जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर सियासी सरगर्मी एकदम तेज हो गई है। वर्ष 2012 के चुनाव में बसपा ने चायल और मंझनपुर सीट पर कब्जा जमाए रखा था, जबकि भाजपा के पाले में सिराथू सीट गई थी। हालांकि उप चुनाव में इस सीट पर सपा ने कब्जा जमाया था। उप चुनाव में बसपा मैदान से बाहर थी। भाजपा ने अभी प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है, इससे इस पार्टी में ऊहापोह की स्थिति है। यही हाल कांग्रेस का भी है। पिछले चुनाव की तरह यह चुनाव भी जातीय समीकरणों पर टिका है। बसपा ने इसी गणित को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी उतारे हैं। सपा के प्रत्याशी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। कांग्रेस और भाजपा पार्टी प्रत्याशियों को उतारने पर अभी फिलहाल विचार-विमर्श कर रही है।
मंझनपुर
बसपा ने मौजूदा विधायक व पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज को ही मंझनपुर सीट से मैदान में उतारा है। वह 1996 से लगातार विधायक बन रहे हैं। लगातार पांचवीं बार वह चुनाव लड़ने जा रहे हैं। उनके सामने फिलहाल सपा से शिवमोहन चौधरी हैं, वहीं सीएम गुट के हेमंत टुन्नू भी खुद को प्रत्याशी बता रहे हैं। करीब सवा लाख दलित वोटर हैं। वहीं पिछड़ी जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग एक लाख है। मुस्लिम इस सीट पर करीबन 55 हजार हैं। ब्राह्मण मतदाता लगभग 35 हजार हैं। हमेशा से यह सीट चर्चा में रही।
चायल
बसपा ने चायल सीट से विधायक आसिफ जाफरी पर ही अपना दांव खेला है। उनके सामने सपा से शशिभूषण द्विवेदी उर्फ बालम महराज हैं। वहीं सपा से पिछला चुनाव लड़ चुके चंद्रबली पटेल भी खुद को प्रत्याशी बता रहे हैं। इस सीट पर भी सबसे ज्यादा सवा लाख दलित वोटर हैं। इसके बाद पिछड़ी जाति के वोटर हैं। मुस्लिम यहां लगभग 50 से 55 हजार हैं। सवर्ण व वैश्य मतदाता लगभग बराबर हैं। इस सीट पर सवर्ण व वैश्य मतदाता ही प्रत्याशी के भाग्य का फैसला करेंगे। पिछले चुनाव में आसिफ को मामूली अंतर से जीत मिली थी।
सिराथू
सपा से विधायक वाचस्पति चुनाव लड़ रहे हैं। बसपा ने इस सीट से सईदुररब को प्रत्याशी घोषित किया है। भाजपा व कांग्रेस ने प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। सिराथू सीट भी दलित बाहुल्य है, दलित वोटर लगभग एक लाख के करीब हैं। हालांकि पिछड़ी जाति के वोटर भी यहां एक लाख के आसपास हैं। मुस्लिम वोटर लगभग 60 हजार हैं। इस सीट पर सारा दारोमदार सवर्ण मतदाताओं पर होगा। वह किसी का भी पलड़ा भारी कर सकते हैं। लगभग 20 हजार ब्राह्मणों की खींचतान में प्रत्याशी जुटे हैं।
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वर्ष 1951 में पहली बार हुए चुनाव में चायल सीट सामान्य थी। जातीय समीकरणों को देखते हुए इस सीट से कांग्र्रेस ने सैय्यद मुजफ्फर हुसैन को उतारा था। हुसैन के खिलाफ स्वतंत्र प्रत्याशी कल्लन मैदान में उतरे थे। सैय्यद मुजफ्फर हुसैन ने भारी अंतर से चुनाव जीता था। इसके बाद दोबारा हुए चुनाव में मुजफ्फर हुसैन ने बाजी मारी थी। वर्ष 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) के टिकट से चौधरी नौनिहाल सिंह चायल से चुनाव लड़े। चौधरी के सामने कांग्रेस की प्रत्याशी कमल कुमारी गोइंदी थीं। चौधरी ने लगभग पांच हजार मतों से कमल कुमारी गोइंदी को हराया था।
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इस चुनाव के बाद से इस सीट पर सवर्ण उम्मीदवारों को जीत नहीं मिली। 1962 के बाद चायल सीट आरक्षित हो गई थी। दलित प्रत्याशी ही चुनाव लड़ते रहे। 2012 में नए परिसीमन के तहत चायल सीट फिर सामान्य हुई। सवर्णों को एक बड़ा मौका मिला था, लेकिन पिछले चुनाव में सवर्णों की मंशा पर जातीय समीकरण ने पानी फेर दिया। दलित व मुस्लिम गठजोड़ का बसपा प्रत्याशी आसिफ जाफरी ने फायदा उठाया और वह सपा प्रत्याशी रहे चंद्रबली पटेल को मामूली अंतर से मात देकर विधायक बन गए थे। अबकी इस सीट पर स्थितियां कुछ बदली हैं। बसपा अपने पुराने समीकरण पर ही चुनाव लड़ेगी। सपा ने पैतरा बदला है। भाजपा भी सवर्ण उम्मीदवार पर दांव खेलने की तैयारी में है। किसको कितनी कामयाबी मिलेगी, यह तो मतदाता ही तय करेगा।
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पहले चायल नार्थ के नाम से जानी जाती थी सीट
चायल सीट पहले चायल नार्थ के नाम से जानी जाती थी। इसमें इलाहाबाद का एक बड़ा हिस्सा भी आता था। इसलिए इसको चायल नार्थ नाम भी मिला था। 1957 में हुए चुनाव में इस सीट को चायल सीट घोषित किया गया, तब से यह सीट इसी नाम से जानी जाती है।
जातीय समीकरणों पर टिकी चुनावी जंग
आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होते ही जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर सियासी सरगर्मी एकदम तेज हो गई है। वर्ष 2012 के चुनाव में बसपा ने चायल और मंझनपुर सीट पर कब्जा जमाए रखा था, जबकि भाजपा के पाले में सिराथू सीट गई थी। हालांकि उप चुनाव में इस सीट पर सपा ने कब्जा जमाया था। उप चुनाव में बसपा मैदान से बाहर थी। भाजपा ने अभी प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की है, इससे इस पार्टी में ऊहापोह की स्थिति है। यही हाल कांग्रेस का भी है। पिछले चुनाव की तरह यह चुनाव भी जातीय समीकरणों पर टिका है। बसपा ने इसी गणित को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशी उतारे हैं। सपा के प्रत्याशी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। कांग्रेस और भाजपा पार्टी प्रत्याशियों को उतारने पर अभी फिलहाल विचार-विमर्श कर रही है।
मंझनपुर
बसपा ने मौजूदा विधायक व पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज को ही मंझनपुर सीट से मैदान में उतारा है। वह 1996 से लगातार विधायक बन रहे हैं। लगातार पांचवीं बार वह चुनाव लड़ने जा रहे हैं। उनके सामने फिलहाल सपा से शिवमोहन चौधरी हैं, वहीं सीएम गुट के हेमंत टुन्नू भी खुद को प्रत्याशी बता रहे हैं। करीब सवा लाख दलित वोटर हैं। वहीं पिछड़ी जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग एक लाख है। मुस्लिम इस सीट पर करीबन 55 हजार हैं। ब्राह्मण मतदाता लगभग 35 हजार हैं। हमेशा से यह सीट चर्चा में रही।
चायल
बसपा ने चायल सीट से विधायक आसिफ जाफरी पर ही अपना दांव खेला है। उनके सामने सपा से शशिभूषण द्विवेदी उर्फ बालम महराज हैं। वहीं सपा से पिछला चुनाव लड़ चुके चंद्रबली पटेल भी खुद को प्रत्याशी बता रहे हैं। इस सीट पर भी सबसे ज्यादा सवा लाख दलित वोटर हैं। इसके बाद पिछड़ी जाति के वोटर हैं। मुस्लिम यहां लगभग 50 से 55 हजार हैं। सवर्ण व वैश्य मतदाता लगभग बराबर हैं। इस सीट पर सवर्ण व वैश्य मतदाता ही प्रत्याशी के भाग्य का फैसला करेंगे। पिछले चुनाव में आसिफ को मामूली अंतर से जीत मिली थी।
सिराथू
सपा से विधायक वाचस्पति चुनाव लड़ रहे हैं। बसपा ने इस सीट से सईदुररब को प्रत्याशी घोषित किया है। भाजपा व कांग्रेस ने प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। सिराथू सीट भी दलित बाहुल्य है, दलित वोटर लगभग एक लाख के करीब हैं। हालांकि पिछड़ी जाति के वोटर भी यहां एक लाख के आसपास हैं। मुस्लिम वोटर लगभग 60 हजार हैं। इस सीट पर सारा दारोमदार सवर्ण मतदाताओं पर होगा। वह किसी का भी पलड़ा भारी कर सकते हैं। लगभग 20 हजार ब्राह्मणों की खींचतान में प्रत्याशी जुटे हैं।