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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kasganj News ›   Revolutionaries had taken control of everything from markets and government offices to railway lines.

Kasganj News: बाजारों से लेकर सरकारी दफ्तरों और रेलवे लाइनों पर क्रांतिकारियों ने जमा लिया था कब्जा

Thu, 13 Aug 2026 11:44 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Thu, 13 Aug 2026 11:44 PM IST
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कासगंज। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में जिला क्रांति का एक अत्यंत सशक्त और प्रमुख केंद्र रहा है। यहां के वीर सपूतों ने अंग्रेजी शासकों के कई बार छक्के छुड़ाए। ''भारत छोड़ो आंदोलन'' के आह्वान पर 14 अगस्त 1942 को ब्रिटिश शासन के खिलाफ शहर में एक ऐतिहासिक और उग्र प्रदर्शन हुआ, जिसमें हजारों की संख्या में युवा, महिलाएं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी।
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महात्मा गांधी के आह्वान के बाद लोग सामूहिक रूप से ब्रिटिश शासन के विरोध में सड़कों पर उतर आए। हालांकि, आंदोलन से ठीक पहले अंग्रेजों ने कई प्रमुख कांग्रेस नेताओं और क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन इसका क्रांतिकारी जोश पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। दमनकारी नीतियों के बावजूद आम जनमानस क्रांतिकारियों के साथ पूरी दृढ़ता से एकजुट हो गया।
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14 अगस्त 1942 को भड़की यह क्रांति इतनी प्रचंड थी कि ब्रिटिश शासकों में उसका सामना करने का साहस ही नहीं बचा। क्रांतिकारियों ने नगर के बाजारों से लेकर सभी सरकारी दफ्तरों और सेवाओं पर अपना कब्जा जमा लिया। इसके साथ ही, उन्होंने टेलीफोन की लाइनें काट दीं और रेललाइनों पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया।
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इस क्रांति की ज्वाला ने आसपास के जिले के क्षेत्रों तक को झकझोर दिया। बाबूराम वर्मा, मानपाल गुप्ता, बैनीराम केला और बाबूराम साबूनी जैसे प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद, अन्य सेनानियों ने भूमिगत रहकर इस आंदोलन का बेहद कुशलता से संचालन किया। अंग्रेजी अफसर क्रांतिकारियों के इस सैलाब के आगे पूरी तरह बेबस नजर आए।
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इतिहास के जानकारों की जुबानी
कासगंज आजादी के संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां हजारों क्रांतिकारियों और महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पंडित नेहरू और महात्मा गांधी यहां के आंदोलन को लेकर हमेशा उत्साहित रहते थे और वे यहां आए भी थे। 14 अगस्त 1942 को शहर में क्रांति हुई तो अंग्रेज अफसर टिक नहीं सके थे। - मुनेंद्र सिंह राजपूत (स्वतंत्रता आंदोलन के जानकार)

1857 की प्रथम स्वतंत्रता क्रांति के समय से ही यह क्षेत्र संघर्ष का बड़ा गढ़ बन गया था। देश को आजादी मिलने तक सेनानी हर कीमत पर ब्रिटिश हुकूमत को खदेड़ने के लिए यहीं बैठकर आंदोलन की रणनीति तैयार करते और उसे अमलीजामा पहनाते थे। - डॉ. अखिलेश गौड़ (स्वतंत्रता आंदोलन के जानकार)
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