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Kasganj News: -कासगंज में हिरासत से कैदी के फरार होने पर पुलिसकर्मी की वेतन कटाैती पर दोबारा विचार का आदेश
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सेवा न्यायाधिकरण को कैदी के हिरासत से फरार हाेने के आरोप में पुलिसकर्मी का एक माह का वेतन काटे जाने की सजा पर दोबारा विचार करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि नए आदेश में स्पष्ट किया जाए कि अस्पताल में तैनात पुलिसकर्मी क्या वास्तव में आला अधिकारी की निजी कार चलाने गया था।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने कासगंज में तैनात रहे सिपाही हर्ष वर्धन शर्मा की याचिका पर दिया। याची ने दंडादेश के साथ अपीलीय, पुनरीक्षण आदेश और सेवा न्यायाधिकरण के चार दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी।
न्यायाधिकरण ने निलंबन अवधि तक का पूरा वेतन-भत्ता बहाल करने की राहत तो दी थी पर 30 दिन का वेतन रोकने की सजा बरकरार रखी थी। हाईकोर्ट ने आदेश के इस हिस्से पर नए सिरे से विचार के लिए न्यायाधिकरण को वापस भेज दिया।
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याची ने दलील दी कि उसे अपने उच्चाधिकारी की निजी गाड़ी चलाने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद उसे अस्पताल पहुंचने के लिए कहा गया, जहां इलाज के दौरान एक कैदी के फरार होने की घटना हो चुकी थी। वह खुद कैदी की खोज में जुटी पुलिस टीम के साथ तलाश में लगा था। उस कैदी को उसने सरसों के खेत से दोबारा पकड़ लिया था।
वहीं, राज्य साकार की ओर से दलील दी गई कि याची का बयान विरोधाभासी है। उसके अनुसार वह अस्पताल में रिपोर्ट करने गया था, जबकि याची का दावा है कि उसे पहले अधिकारी की निजी कार चलाने भेजा गया था। कोर्ट ने कहा कि न्यायाधिकरण को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तथ्य तय करना होगा कि याची को कैदी की सुरक्षा के लिए पुलिस बल के सदस्य के रूप में तैनात किया गया था या उसे उच्चाधिकारी की निजी कार चलाने का आदेश दिया गया था। संवाद
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यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने कासगंज में तैनात रहे सिपाही हर्ष वर्धन शर्मा की याचिका पर दिया। याची ने दंडादेश के साथ अपीलीय, पुनरीक्षण आदेश और सेवा न्यायाधिकरण के चार दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी।
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न्यायाधिकरण ने निलंबन अवधि तक का पूरा वेतन-भत्ता बहाल करने की राहत तो दी थी पर 30 दिन का वेतन रोकने की सजा बरकरार रखी थी। हाईकोर्ट ने आदेश के इस हिस्से पर नए सिरे से विचार के लिए न्यायाधिकरण को वापस भेज दिया।
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याची ने दलील दी कि उसे अपने उच्चाधिकारी की निजी गाड़ी चलाने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद उसे अस्पताल पहुंचने के लिए कहा गया, जहां इलाज के दौरान एक कैदी के फरार होने की घटना हो चुकी थी। वह खुद कैदी की खोज में जुटी पुलिस टीम के साथ तलाश में लगा था। उस कैदी को उसने सरसों के खेत से दोबारा पकड़ लिया था।
वहीं, राज्य साकार की ओर से दलील दी गई कि याची का बयान विरोधाभासी है। उसके अनुसार वह अस्पताल में रिपोर्ट करने गया था, जबकि याची का दावा है कि उसे पहले अधिकारी की निजी कार चलाने भेजा गया था। कोर्ट ने कहा कि न्यायाधिकरण को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तथ्य तय करना होगा कि याची को कैदी की सुरक्षा के लिए पुलिस बल के सदस्य के रूप में तैनात किया गया था या उसे उच्चाधिकारी की निजी कार चलाने का आदेश दिया गया था। संवाद