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होली विशेष: बड़ी होली की परंपरा, सवा सौ सालों से शहर की शान
Tue, 03 Mar 2026 10:56 PM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कासगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, कासगंज
Updated Tue, 03 Mar 2026 10:56 PM IST
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फोटो40कासगंज के बड़ी होली क्षेत्र में रखी गई होलिका।संवाद
कासगंज। ब्रज की तरह शहर की बड़ी होली की प्राचीन परंपरा है। मोहल्ला जय-जयराम की होली शहर की प्राचीन होलियों में से एक है। यहां की परंपरा सवा सौ साल से अधिक पुरानी मानी जाती है। इसकी खासियत यह है कि यहां सबसे पहले होलिका दहन किया जाता है। इसी की अग्नि को लेकर शहर के बाकी घरों में होलिका दहन किया जाता है।
समय के साथ बस्ती का स्वरूप बदल गया है, ऊंचे भवन बन गए हैं, लेकिन परंपरा आज भी कायम है। बताया जाता है कि जिस क्षेत्र में बड़ी होली की बस्ती बसी हुई है यह काफी पुरानी है। इस क्षेत्र में ही होलिका जलाई जाती थी। लोग यहीं से अग्नि ले जाकर अपने घरों में होलिका दहन की रस्म करते थे। शहर के विस्तार के साथ शहर के अधिकतर चौराहों एवं बस्तियों में होलिका रखी जाने लगी है, लेकिन बड़ी होली की प्राचीन परंपरा आज भी जीवित है। आज भी शहर के बड़े हिस्से से लोग बड़ी होलिका से अग्नि लेकर अपने घरों में होलिका दहन करते हैं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
समय के साथ होली के मनाने के तरीके में बदलाव आया। पहले बच्चे आलू के ठप्पे बनाकर होली खेलते थे और कांटे से टोपी खींचकर चंदा इकट्ठा करते थे, जिससे होली के लिए लकड़ी खरीदी जाती थी। अब यह प्रचलन कम हो गया है, लेकिन बड़े-बुजुर्ग इस परंपरा को याद कर बताते हैं कि किस तरह पूरी बस्ती एक साथ उत्सव में शामिल होती थी। क्षेत्र के निवासी ज्योतिषाचार्य भरत राम गौड़ ने बताया कि 107 साल पहले दादा इस क्षेत्र में आकर बसे थे। उनके आने से पहले से होली जलाने की परंपरा चली आ रही है। इसी के चलते इस बस्ती का नाम भी बड़ी होली पड़ गया।
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समय के साथ बस्ती का स्वरूप बदल गया है, ऊंचे भवन बन गए हैं, लेकिन परंपरा आज भी कायम है। बताया जाता है कि जिस क्षेत्र में बड़ी होली की बस्ती बसी हुई है यह काफी पुरानी है। इस क्षेत्र में ही होलिका जलाई जाती थी। लोग यहीं से अग्नि ले जाकर अपने घरों में होलिका दहन की रस्म करते थे। शहर के विस्तार के साथ शहर के अधिकतर चौराहों एवं बस्तियों में होलिका रखी जाने लगी है, लेकिन बड़ी होली की प्राचीन परंपरा आज भी जीवित है। आज भी शहर के बड़े हिस्से से लोग बड़ी होलिका से अग्नि लेकर अपने घरों में होलिका दहन करते हैं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
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समय के साथ होली के मनाने के तरीके में बदलाव आया। पहले बच्चे आलू के ठप्पे बनाकर होली खेलते थे और कांटे से टोपी खींचकर चंदा इकट्ठा करते थे, जिससे होली के लिए लकड़ी खरीदी जाती थी। अब यह प्रचलन कम हो गया है, लेकिन बड़े-बुजुर्ग इस परंपरा को याद कर बताते हैं कि किस तरह पूरी बस्ती एक साथ उत्सव में शामिल होती थी। क्षेत्र के निवासी ज्योतिषाचार्य भरत राम गौड़ ने बताया कि 107 साल पहले दादा इस क्षेत्र में आकर बसे थे। उनके आने से पहले से होली जलाने की परंपरा चली आ रही है। इसी के चलते इस बस्ती का नाम भी बड़ी होली पड़ गया।
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