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Kanpur News: संतान की दीर्घायु के लिए महिलाओं ने रखा हरछठ व्रत
Thu, 03 Sep 2026 01:35 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
Updated Thu, 03 Sep 2026 01:35 AM IST
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रसूलाबाद/झींझक। संतान के निरोगी और दीर्घायु होने की कामना को लेकर बुधवार को क्षेत्र में महिलाओं ने हरछठ (हलषष्ठी) का व्रत रखा। व्रती महिलाओं ने घरों में विधि-विधान से भगवान बलराम और हरछठ माता की पूजा-अर्चना की। दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद महिलाओं ने हरछठ माता की कथा सुनी और संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि व परिवार की खुशहाली की कामना की।
पूजा के लिए महिलाओं ने भैंस के गोबर से हरछठ माता का चित्र बनाया। बेर और पलाश की शाखाओं को मिट्टी में स्थापित कर पूजा की गई। मिट्टी के छोटे कुल्हड़ों में चना, ज्वार, बाजरा, जौ, धान, गेहूं और मक्का भरकर पूजन किया गया। इसके बाद पलाश के पत्तों पर दही, महुआ और पसई के चावल का प्रसाद ग्रहण किया। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्मोत्सव से जुड़ा यह पर्व संतान के आरोग्य और दीर्घायु के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं हल से जुते खेत में पैदा होने वाले अन्न का सेवन नहीं करतीं। गाय के दूध, दही और घी का भी सेवन वर्जित माना जाता है जबकि भैंस के दूध का प्रयोग किया जाता है।
पूजन के दौरान महिलाओं ने हरछठ माता की कथा भी सुनी। कथा में व्रत के नियमों का पालन न करने से ग्वालिन के बच्चे पर आए संकट और उसके पश्चात प्रायश्चित करने पर बच्चे के पुनर्जीवित होने का प्रसंग सुनाया गया। कथा सुनने के बाद महिलाओं ने संतान के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए प्रार्थना की।
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पूजा के लिए महिलाओं ने भैंस के गोबर से हरछठ माता का चित्र बनाया। बेर और पलाश की शाखाओं को मिट्टी में स्थापित कर पूजा की गई। मिट्टी के छोटे कुल्हड़ों में चना, ज्वार, बाजरा, जौ, धान, गेहूं और मक्का भरकर पूजन किया गया। इसके बाद पलाश के पत्तों पर दही, महुआ और पसई के चावल का प्रसाद ग्रहण किया। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्मोत्सव से जुड़ा यह पर्व संतान के आरोग्य और दीर्घायु के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं हल से जुते खेत में पैदा होने वाले अन्न का सेवन नहीं करतीं। गाय के दूध, दही और घी का भी सेवन वर्जित माना जाता है जबकि भैंस के दूध का प्रयोग किया जाता है।
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पूजन के दौरान महिलाओं ने हरछठ माता की कथा भी सुनी। कथा में व्रत के नियमों का पालन न करने से ग्वालिन के बच्चे पर आए संकट और उसके पश्चात प्रायश्चित करने पर बच्चे के पुनर्जीवित होने का प्रसंग सुनाया गया। कथा सुनने के बाद महिलाओं ने संतान के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए प्रार्थना की।
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