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खास खबर: पैतृक संपत्ति में ख्वातीन मांग रहीं हक, 40 फीसदी मामले वरासत के…महिलाओं में अधिकतर विधवा या तलाकशुदा

Wed, 05 Mar 2025 01:52 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Wed, 05 Mar 2025 01:52 PM IST
सार

Kanpur News: शरई कानून के अनुसार, संपत्ति में बेटों के मुकाबले बेटियों को आधा हिस्सा दिए जाने का प्रावधान है। जैसे एक पिता की दो लड़कियां और एक लड़का है, तो संपत्ति का आधा हिस्सा बेटे का और बाकी आधे हिस्से को दो भागों में विभाजित कर बेटियों को मिलेगा।

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Women are demanding rights in ancestral property 40 percent of the cases are of inheritance
मुस्लिम महिलाएं - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कानपुर में जागरूकता आने से महिलाएं अपने हक के लिए शरई अदालत का दरवाजा खटखटा रही हैं। पैतृक संपत्ति में बेटियों के हक के मामले (तरका) बढ़ गए हैं। सुन्नी दारुल कजा और महकमा-ए-शरिया दारुल कजा रजबी रोड से मिले आंकड़ों के मुताबिक, हर महीने आने वाले औसतन 120 मामलों में 40 फीसदी विरासत से जुड़े रहते हैं, जबकि पांच साल पहले ये 20 फीसदी थे।

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अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा चाहने वाली महिलाओं में अधिकतर विधवा या तलाकशुदा हैं। कुछ शादीशुदा महिलाएं भी पिता की संपत्ति में अधिकार चाह रही हैं। नायब शहरकाजी कारी मो. सगीर आलम हबीबी ने बताया कि अधिकतर मामलों में भाई अपनी बहनों को हिस्सा देने से इन्कार कर देते हैं। उनका तर्क रहता है कि शादी के वक्त हक दे दिया था, जबकि दहेज या गृहस्थी का सामान शादी के वक्त देने पर भी संपत्ति में बेटी की हिस्सेदारी पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह आपको देना ही पड़ेगा।

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पैतृक संपत्ति में बेटों के मुकाबले बेटियों को मिलता है आधा हिस्सा
शरई कानून के अनुसार, संपत्ति में बेटों के मुकाबले बेटियों को आधा हिस्सा दिए जाने का प्रावधान है। जैसे एक पिता की दो लड़कियां और एक लड़का है, तो संपत्ति का आधा हिस्सा बेटे का और बाकी आधे हिस्से को दो भागों में विभाजित कर बेटियों को मिलेगा। इसी तरह अगर एक बहन और तीन भाई हैं, तो संपत्ति के सात हिस्से लगेंगे। एक हिस्सा बेटी को मिलेगा और बाकी के दो-दो हिस्से बेटों को मिलेंगे।

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केस-1: दारुलकजा ने दिलाया हक
हीरामनकापुरवा से एक विधवा ने अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए दारुलकजा का दरवाजा खटखटाया। महिला ने बताया कि उसके पति की मौत दो साल पहले हो चुकी है। एक बेटी है। ससुराल और दोनों भाइयों ने मदद से मना कर दिया। उसके मामले में करीब छह से सात बार दोनों पक्षों को बुलाकर बातचीत कराई गई और विधवा को उसका अधिकार दिलाया गया।

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केस-2: शरई कानून की जानकारी देने पर माने भाई
बेनाझाबर निवासी महिला ने बताया कि पिता के पास अच्छी संपत्ति है। उसके तीन भाई हिस्सा देने को तैयार नहीं हैं। कहते हैं कि जो तुम्हें देेना था, दहेज में दे चुके हैं। दारुलकजा की ओर से दोनों को सामने बुलाकर शरई कानून की जानकारी देते हुए बेटी की भी हिस्सेदारी को लेकर बताया गया। तब जाकर भाइयों ने बहन को हिस्सा दिया।

बेटियां शिक्षित हो रही हैं, और अपने अधिकारों के लिए जागरुक हैं। हिस्सेदारी लेने के लिए दारुलकजा का रुख उन्हें करना पड़ रहा है। कुछ मामले ऐसे भी हैं जो आपसी सहमति से हिस्सेदारी करना चाहते हैं, तो वे भी शरई कानून की मदद लेने के लिए आते हैं।  -मुफ्ती साकिब अदीब मिस्बाही

विरासत के मामले बढ़े हैं। इसमें काउंसलिंग में भी समय लगता है। नियम कायदे बताने से फर्क पड़ जाता है। लेकिन, कुछ ऐसे पेचीदा मामले होते हैं, जिनमें लोगों को आठ से दस बार बुलाकर उनकी काउंसलिंग करनी पड़ती है।  -कारी मो. सगीर आलम हबीबी, नायब शहरकाजी

विरासत संबंधी मामले भी बढ़े हैं। अधिकतर आने वाले मामलों में लोग हिस्सेदारी पर सवाल करते हैं। बेटियों की हिस्सेदारी के मामले भी आते हैं, जिन्हें हम शरई कानून के अनुसार सुलझाते हैं।  -मुफ्ती अब्दुर्रशीद, सदर महकमा शरिया दारुलकजा रजबी रोड

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