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धूमधाम से हुआ तुलसी-शालिग्राम विवाह, घर-घर हुआ पूजन, महिलाओं ने गाए गीत
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अकबरपुर में शालीग्राम की बरात निकालते लोग। (संवाद)
- फोटो : AKBARPUR
कानपुर देहात/पुखरायां। अकबरपुर कस्बे में सोमवार को देवोत्थान एकादशी पर तुलसी-शालिग्राम विवाह धूमधाम से मनाया गया। शुक्ला मार्केट से निकली शालिग्राम की बरात आर्य समाज मंदिर पहुंची। इसके बाद विधि विधान से विवाह की रस्में अदा की गई।
बाद में भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया। उधर घर-घर में महिलाओं ने उपवास रखा। संध्याकाल में गन्ना, सिंघाड़ा, फल, फूल, रोली, चंदन पकवान से भगवान शालिग्राम व तुलसी का पूजन किया गया।
गौरियापुर के शिक्षक योगेश्वर नाथ अवस्थी व पं. संतोष अवस्थी ने बताया कि तुलसी पूर्व जन्म में वृंदा थीं। राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी वह विष्णु की भक्त थीं। उसका विवाह दानव राज जलंधर से हुआ था।
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वृंदा की पतिव्रत और उसके अनुष्ठान की वजह से देवता युद्ध में जलंधर का वध नहीं कर पा रहे थे। देवताओं के आग्रह पर विष्णु जलंधर का रूप बनाकर वृंदा के सामने प्रकट हुए। वृंदा ने उन्हें पति समझ कर चरण छू लिए।
वृंदा का संकल्प टूटते ही देवताओं ने जलंधर का वध कर दिया। जलंधर का सिर वृंदा के समक्ष गिरा तो वह चौक गई। उसने छल भांप लिया और श्राप देकर विष्णु को पत्थर का बना दिया। देवताओं में हाहाकार मच गया।
लक्ष्मी जी रोने लगी तो वृंदा ने विष्णु को पूर्ववत कर दिया। इसके बाद पति का सिर लेकर सती हो गई। चिता की राख से तुलसी का पौधा निकला। विष्णु ने अपने रूप पत्थर संग पूजन का वचन दिया। शुक्ला मार्केट से निकली शालिग्राम की बरात में अनीता, रामऔतार, पिंटू शुक्ला, महेश ओमर आदि मौजूद रहे। वहीं पुखरायां में 25 रुपये प्रति गन्ने की दर से बिक्री हुई।
गन्ने व सिंघाड़ा की पूजा होने के कारण किसान सुबह ही पुखरायां की बाजार में पहुंच गए। महिलाओं ने परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हुए पूजन किया। वहीं तुलसी-शालिग्राम विवाह के गीत भी गाए गए।
तुलसी माता का शृंगार किया गया। पुखरायां के पंडित विनोद मिश्र ने बताया कि जिस आंगन में तुलसी होती है वहां भगवान विष्णु हमेशा निवास करते है। इसे सर्वोत्तम व्रत माना जाता है।
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बाद में भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया। उधर घर-घर में महिलाओं ने उपवास रखा। संध्याकाल में गन्ना, सिंघाड़ा, फल, फूल, रोली, चंदन पकवान से भगवान शालिग्राम व तुलसी का पूजन किया गया।
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गौरियापुर के शिक्षक योगेश्वर नाथ अवस्थी व पं. संतोष अवस्थी ने बताया कि तुलसी पूर्व जन्म में वृंदा थीं। राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी वह विष्णु की भक्त थीं। उसका विवाह दानव राज जलंधर से हुआ था।
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वृंदा की पतिव्रत और उसके अनुष्ठान की वजह से देवता युद्ध में जलंधर का वध नहीं कर पा रहे थे। देवताओं के आग्रह पर विष्णु जलंधर का रूप बनाकर वृंदा के सामने प्रकट हुए। वृंदा ने उन्हें पति समझ कर चरण छू लिए।
वृंदा का संकल्प टूटते ही देवताओं ने जलंधर का वध कर दिया। जलंधर का सिर वृंदा के समक्ष गिरा तो वह चौक गई। उसने छल भांप लिया और श्राप देकर विष्णु को पत्थर का बना दिया। देवताओं में हाहाकार मच गया।
लक्ष्मी जी रोने लगी तो वृंदा ने विष्णु को पूर्ववत कर दिया। इसके बाद पति का सिर लेकर सती हो गई। चिता की राख से तुलसी का पौधा निकला। विष्णु ने अपने रूप पत्थर संग पूजन का वचन दिया। शुक्ला मार्केट से निकली शालिग्राम की बरात में अनीता, रामऔतार, पिंटू शुक्ला, महेश ओमर आदि मौजूद रहे। वहीं पुखरायां में 25 रुपये प्रति गन्ने की दर से बिक्री हुई।
गन्ने व सिंघाड़ा की पूजा होने के कारण किसान सुबह ही पुखरायां की बाजार में पहुंच गए। महिलाओं ने परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हुए पूजन किया। वहीं तुलसी-शालिग्राम विवाह के गीत भी गाए गए।
तुलसी माता का शृंगार किया गया। पुखरायां के पंडित विनोद मिश्र ने बताया कि जिस आंगन में तुलसी होती है वहां भगवान विष्णु हमेशा निवास करते है। इसे सर्वोत्तम व्रत माना जाता है।