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हरि का कल्लू बंदर जैकेट के अंदर
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
Updated Sat, 07 Feb 2015 03:38 AM IST
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रे पास आओ मेरे दोस्तों, एक किस्सा सुनो। डेढ़ साल पहले की बात है, घनी अंधेरी रात थी, थोड़ी-थोड़ी बरसात थी। भूसाटोली के श्री माता महाकाली मंदिर की छत पर कोई रो रहा था, ऊं-ऊं-ऊं करके सांसें खो रहा था।
बच्चे का रोना सुनकर बगल में रहने वाले हरि गुप्ता चौंक गए, लपक कर मंदिर की छत पर पहुंच गए। इधर देखा-उधर देखा कोई नजर न आया, फिर एक कोने में बंदर का बच्चा घायल पड़ा पाया।
ऊं-ऊं की आवाज उसी की थी, बेचारे की बड़ी दुर्गति थी। बड़े बंदर उसे नोंच-घसोट गए थे, मरा समझ कर छोड़ गए थे। हरि ने छोटे से बंदर को उठाया, कलेजे से लगाया, जख्मों पर मलहम लगाया और रूई के फाहे से दूध पिलाया...भूखा बंदर चीं-चीं करता फिर दूध से पेट भरता।
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पेट में थोड़ा दूध पहुंच गया और घायल बंदर हरि की गोद में लुढ़क गया। अरे-अरे-अरे लुढ़क गया...लुढ़क गया...क्या हुआ? डरो मत बच्चों बंदर को कुछ नहीं हुआ, उसे तो निंदिया रानी ने छुआ।
अगले दिन बंदर जागा, हरि बाहर बैठे थे, लंगड़ा कर उनकी ओर लपका-भागा। हरि ने गोद में बैठा लिया और बस, बंदर ने उन्हें अपना लिया। अब बंदर उनकी संतान जैसा हो गया, खा पीकर थोड़े ही दिन में तंदुरुस्त हो गया। हरि ने उसका नाम रखा कल्लू और दोस्ती के लिए एक और बंदर ले आए गोल मटल्लू।
दोस्त का नाम था गोरेलाल, पर कुछ ही दिन में उसे निगल गया काल। क्या????? काल निगल गया, गोरेलाल मर गया। हां बच्चों गोरेलाल मर गया, च्च्च्च्च्च्। फिर हरि बंदरिया लाए ताकि कल्लू का जी लग जाए।
काम चल गया, कल्लू संभल गया। इन दोनों की जोड़ी आज भी सलामत है, पूरा मोहल्ला कहता है ये ईश्वर की नियामत है। कल्लू आज भी हरि के हृदय से चिपक कर सोता है, हटा दो तो रूठता है, मचलता है, रोता है। हरि खूब देर तक उससे बतियाते हैं और सीने से चिपकाकर ही सुलाते हैं।
सब कहते हैं हरि ये तुम्हारे पिछले जनम का कउनो होई और हरि कहते हैं मानुष-पशु सब प्यार से रहें तो यही दुनिया स्वर्ग सी सुंदर होई।
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बच्चे का रोना सुनकर बगल में रहने वाले हरि गुप्ता चौंक गए, लपक कर मंदिर की छत पर पहुंच गए। इधर देखा-उधर देखा कोई नजर न आया, फिर एक कोने में बंदर का बच्चा घायल पड़ा पाया।
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ऊं-ऊं की आवाज उसी की थी, बेचारे की बड़ी दुर्गति थी। बड़े बंदर उसे नोंच-घसोट गए थे, मरा समझ कर छोड़ गए थे। हरि ने छोटे से बंदर को उठाया, कलेजे से लगाया, जख्मों पर मलहम लगाया और रूई के फाहे से दूध पिलाया...भूखा बंदर चीं-चीं करता फिर दूध से पेट भरता।
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पेट में थोड़ा दूध पहुंच गया और घायल बंदर हरि की गोद में लुढ़क गया। अरे-अरे-अरे लुढ़क गया...लुढ़क गया...क्या हुआ? डरो मत बच्चों बंदर को कुछ नहीं हुआ, उसे तो निंदिया रानी ने छुआ।
अगले दिन बंदर जागा, हरि बाहर बैठे थे, लंगड़ा कर उनकी ओर लपका-भागा। हरि ने गोद में बैठा लिया और बस, बंदर ने उन्हें अपना लिया। अब बंदर उनकी संतान जैसा हो गया, खा पीकर थोड़े ही दिन में तंदुरुस्त हो गया। हरि ने उसका नाम रखा कल्लू और दोस्ती के लिए एक और बंदर ले आए गोल मटल्लू।
दोस्त का नाम था गोरेलाल, पर कुछ ही दिन में उसे निगल गया काल। क्या????? काल निगल गया, गोरेलाल मर गया। हां बच्चों गोरेलाल मर गया, च्च्च्च्च्च्। फिर हरि बंदरिया लाए ताकि कल्लू का जी लग जाए।
काम चल गया, कल्लू संभल गया। इन दोनों की जोड़ी आज भी सलामत है, पूरा मोहल्ला कहता है ये ईश्वर की नियामत है। कल्लू आज भी हरि के हृदय से चिपक कर सोता है, हटा दो तो रूठता है, मचलता है, रोता है। हरि खूब देर तक उससे बतियाते हैं और सीने से चिपकाकर ही सुलाते हैं।
सब कहते हैं हरि ये तुम्हारे पिछले जनम का कउनो होई और हरि कहते हैं मानुष-पशु सब प्यार से रहें तो यही दुनिया स्वर्ग सी सुंदर होई।