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जन्मदिवस विशेष: अपने घर में बेगाने बने गणेश शंकर विद्यार्थी, पुश्तैनी मकान खंडहर
Tue, 26 Oct 2021 02:58 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, फतेहपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, फतेहपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 26 Oct 2021 02:58 PM IST
सार
विद्यार्थी जी के पैतृक घर से कोई दो किलोमीटर दूर विद्यार्थी का स्मारक बनाया गया, प्रतिमा लगाई है और जिसका अनावरण 2008 में किया गया। इसकी चाभी किराना दुकानदार गौरव तिवारी के पास रहती है। उसे तलाशा और तब स्मारक देखने को मिला।
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गणेश शंकर विद्यार्थी जन्मदिवस विशेष
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जो महात्मा गांधी का प्रेरक रहा हो, जिसे जवाहर लाल नेहरू अपना नेता मानते हों, जिसके अखबार प्रताप ने अंगरेजी हुकूमत को हिला दिया हो, जो क्रांतिकारियों का बल रहा, आजादी की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति का योद्धा रहा, जिसने कौमी एकता लिए अपना बलिदान दिया, मजदूर और किसान आंदोलन का अगुवाकार रहा, ऐसे महान पत्रकार, समाजसेवी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद शिरोमणि गणेश शंकर विद्यार्थी के पैतृक गांव फतेहपुर के हथगाम में उनके घर को तलाशना आसान काम तो बिल्कुल नहीं। एक स्मारक है, लेकिन उसके दर्शन के लिए पहले परचून दुकानदार को तलाशना होगा, वह भी किसी ने पता दे दिया तो, वरना भटकिए..।
फतेहपुर मुख्यालय से कोई 55 किलोमीटर दूर खागा होते हुए मिलेगा हथगाम (हथगांव) जहां दिन में खासी चहलपहल दिखती है। देर तक भटकने के बाद मुश्किल से मिला गणेश शंकर विद्यार्थी का पैतृक घर, जिसके एक कोने पर बाउंड्रीवाल के बीच एक सफेद पत्थर लगा है जिस पर अंकित है गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक। यहां न तो उनकी प्रतिमा लगी है और न ही सड़क पर संकेतक। इसी परिसर में विद्यार्थी जी पले, बढ़े, खेले, सीखे और शुरुआती पढ़ाई भी की।
वह पैदा तो इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अतरसुइया में अपने ननिहाल में हुए, लेकिन उसके बाद हथगाम आ गए। घर का परिसर काफी बड़ा है। एक हिस्सा पूरी तरह खंडहर हो गया है। दीवारें और लकड़ी के दरवाजे उसी जमाने के हैं। वहां एक तरफ उनके पाटीदार की घड़ी मरम्मत की दुकान है और उसके पीछे वह परिवार सहित खुद रहते हैं।
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फतेहपुर मुख्यालय से कोई 55 किलोमीटर दूर खागा होते हुए मिलेगा हथगाम (हथगांव) जहां दिन में खासी चहलपहल दिखती है। देर तक भटकने के बाद मुश्किल से मिला गणेश शंकर विद्यार्थी का पैतृक घर, जिसके एक कोने पर बाउंड्रीवाल के बीच एक सफेद पत्थर लगा है जिस पर अंकित है गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक। यहां न तो उनकी प्रतिमा लगी है और न ही सड़क पर संकेतक। इसी परिसर में विद्यार्थी जी पले, बढ़े, खेले, सीखे और शुरुआती पढ़ाई भी की।
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वह पैदा तो इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अतरसुइया में अपने ननिहाल में हुए, लेकिन उसके बाद हथगाम आ गए। घर का परिसर काफी बड़ा है। एक हिस्सा पूरी तरह खंडहर हो गया है। दीवारें और लकड़ी के दरवाजे उसी जमाने के हैं। वहां एक तरफ उनके पाटीदार की घड़ी मरम्मत की दुकान है और उसके पीछे वह परिवार सहित खुद रहते हैं।
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फतेहपुर के अमित राजपूत की पुस्तक में विद्यार्थी जी के पैतृक स्थान का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि इस जगह को ग्राम समाज की बताकर किसी ने पट्टा करा लिया और वह वहां जम गया। विवाद हुआ। मामला बढ़ा तो तत्कालीन जिलाधिकारी ने अपने प्रयास से विद्यार्थी जी के पैतृक घर के एक तरफ उनके नाम का पत्थर लगाकर उसे चाहरदीवारी के घिरवा दिया। एक स्मारक स्तंभ लगवा दिया ताकि कोई वहां कब्जा न कर सके, लेकिन उसकी देखरेख के मुकम्मल इंतजाम नहीं हैं। वहां उनकी प्रतिमा तक नहीं लगी। हथगाम में कोई संकेतक तक नहीं, जिसके जरिए आप विद्यार्थी जी के पैतृक घर तक पहुंच सकें।
स्मारक की चाभी परचून दुकानदार पास
विद्यार्थी जी के पैतृक घर से कोई दो किलोमीटर दूर विद्यार्थी का स्मारक बनाया गया, प्रतिमा लगाई है और जिसका अनावरण 2008 में किया गया। इसकी चाभी किराना दुकानदार गौरव तिवारी के पास रहती है। उसे तलाशा और तब स्मारक देखने को मिला। यहां और खागा तहसील में उनके नाम पर विद्यालय है। फतेहपुर में एक साल पहले कचहरी चौराहा उनके नाम पर रख प्रतिमा स्थापित की गई।
उपेक्षा से बहुत दुखी हूं...
मेरे पिता वासुदेव जी विद्यार्थी जी के भक्त और सहयोगी थे। वह 1957 में खासा से विधायक बने। वह चाहते थे कि विद्यार्थी जी के पैतृक घर को बड़े स्मारक में तब्दील कर दिया जाए। बहुत कोशिश की। यहां नेहरू, इंदिरा सहित कई नेता आए पर सिर्फ आश्वासन ही मिला। नेहरू जी का तो हथगाम संसदीय क्षेत्र (तब यह इलाका इलाहाबाद में था) था। तब भी कुछ नहीं हुआ। यही हाल रहा तो कुछ सालों बाद विद्यार्थी जी के पैतृक आवास की पहचान भी मिट जाएगी।
- देव कुमार दीक्षित, हथगाम
स्मारक की चाभी परचून दुकानदार पास
विद्यार्थी जी के पैतृक घर से कोई दो किलोमीटर दूर विद्यार्थी का स्मारक बनाया गया, प्रतिमा लगाई है और जिसका अनावरण 2008 में किया गया। इसकी चाभी किराना दुकानदार गौरव तिवारी के पास रहती है। उसे तलाशा और तब स्मारक देखने को मिला। यहां और खागा तहसील में उनके नाम पर विद्यालय है। फतेहपुर में एक साल पहले कचहरी चौराहा उनके नाम पर रख प्रतिमा स्थापित की गई।
उपेक्षा से बहुत दुखी हूं...
मेरे पिता वासुदेव जी विद्यार्थी जी के भक्त और सहयोगी थे। वह 1957 में खासा से विधायक बने। वह चाहते थे कि विद्यार्थी जी के पैतृक घर को बड़े स्मारक में तब्दील कर दिया जाए। बहुत कोशिश की। यहां नेहरू, इंदिरा सहित कई नेता आए पर सिर्फ आश्वासन ही मिला। नेहरू जी का तो हथगाम संसदीय क्षेत्र (तब यह इलाका इलाहाबाद में था) था। तब भी कुछ नहीं हुआ। यही हाल रहा तो कुछ सालों बाद विद्यार्थी जी के पैतृक आवास की पहचान भी मिट जाएगी।
- देव कुमार दीक्षित, हथगाम
हम ज्यादा नहीं जानते
विद्यार्थी जी के पैतृक घर परिसर में घड़ी मरम्मत की दुकान चलाने वाले अंकित श्रीवास्तव का दावा है कि वह गणेश शंकर विद्यार्थी के वंशज हैं। लेकिन वह उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। इतना जरूर बताते हैं कि विद्यार्थी के परिवार के लोग कुछ साल पहले तक यहां आते रहे हैं। ज्यादा बात करने से अंकित कतराने लगे।
बलिदान स्थल का हाल बुरा
विद्यार्थी जी की जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा कानपुर में बीता। कानपुर में 25 मार्च 1931 में भयंकर दंगे के बीच वह लोगों को दंगाइयों से बचाने निकल पड़े। इसी दौरान उन पर चौतरफा हमला किया गया और वह मूलगंज के पास चौबेगोला में शहीद हो गए। उस स्थान पर सिर्फ उनके नाम का एक पत्थर लगा है। वहां पतली गली में चौतरफा गंदगी और कब्जे। एक तरह से बलिदान स्थल गुम सा है। आसपास के लोग ही बलिदान स्थल की कहानी नहीं जानते।
प्रताप प्रेस भी गुम
कानपुर के फीलखाना में गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार दैनिक प्रताप का दफ्तर था जो अब कबाड़ हो गया है। नीचे दुकाने हैं। वहां की तो अब पहचान तक गुम हो गई है। उनकी मृत्यु के कई साल बाद तक प्रताप चलता रहा और फिर आर्थिक तंगी के चलते बंद हो गया। अब तो इस स्थान को ढूंढना भी मुश्किल है।
विद्यार्थी जी के पैतृक घर परिसर में घड़ी मरम्मत की दुकान चलाने वाले अंकित श्रीवास्तव का दावा है कि वह गणेश शंकर विद्यार्थी के वंशज हैं। लेकिन वह उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। इतना जरूर बताते हैं कि विद्यार्थी के परिवार के लोग कुछ साल पहले तक यहां आते रहे हैं। ज्यादा बात करने से अंकित कतराने लगे।
बलिदान स्थल का हाल बुरा
विद्यार्थी जी की जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा कानपुर में बीता। कानपुर में 25 मार्च 1931 में भयंकर दंगे के बीच वह लोगों को दंगाइयों से बचाने निकल पड़े। इसी दौरान उन पर चौतरफा हमला किया गया और वह मूलगंज के पास चौबेगोला में शहीद हो गए। उस स्थान पर सिर्फ उनके नाम का एक पत्थर लगा है। वहां पतली गली में चौतरफा गंदगी और कब्जे। एक तरह से बलिदान स्थल गुम सा है। आसपास के लोग ही बलिदान स्थल की कहानी नहीं जानते।
प्रताप प्रेस भी गुम
कानपुर के फीलखाना में गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार दैनिक प्रताप का दफ्तर था जो अब कबाड़ हो गया है। नीचे दुकाने हैं। वहां की तो अब पहचान तक गुम हो गई है। उनकी मृत्यु के कई साल बाद तक प्रताप चलता रहा और फिर आर्थिक तंगी के चलते बंद हो गया। अब तो इस स्थान को ढूंढना भी मुश्किल है।
शहादत का वह दिन
23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह को फांसी के बाद कानपुर में भी दंगे भड़क गए। 25 मार्च को गणेश शंकर विद्यार्थी लोगों को बचाने नंगे पैर बिना कुछ खाए-पिये निकल पड़े। पत्नी ने रोका पर नहीं माने। दो दिन बाद अस्पताल में शव मिला। बाद में जांच से पता लगा कि चौबेगोला में दंगाई की भीड़ से घिर विद्यार्थी पर वार पर वार करके उन्हें मार दिया गया।
चंपारण आंदोलन में भूमिका
बिहार के किसानों की व्यथा से दुखी वहां के राम कुमार शुक्ल महात्मा गांधी को चंपारण ले जाना चाहते थे। वह उनसे दो बार मिले, पर बात नहीं बनी। विद्यार्थी जी के प्रताप अखबार में किसानों की दुदर्शा पर खूब लिखा जा रहा था। विद्यार्थी जी पर शोध पुस्तक लिखने वाले अमित राजपूत का कहना है कि विद्यार्थी के जरिए ही राम कुमार शुक्ल कानपुर में गांधी जी से मिले। इसके बाद ही गांधी जी चंपारण गए और निर्णायक सफल आंदोलन किया। तभी डा.राजेंद्र प्रसाद भी गांधी जी के संपर्क में आए।
झंडा गीत के प्रेरक
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्याम लाल पार्षद जी गणेश शंकर विद्यार्थी के सहयोगी थी। विद्यार्थी जी की प्रेरणा से ही उन्होंने कानपुर में झंडा गीत लिखा, जिसे कुछ संशोधन के बाद जारी कर दिया गया। इसे सबसे पहले कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया। आजादी के बाद 15 अगस्त को देश के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में दिल्ली में श्याम लाल पार्षद ने झंडा गीत (झंडा ऊंचा रहे हमारा) गाया।
23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह को फांसी के बाद कानपुर में भी दंगे भड़क गए। 25 मार्च को गणेश शंकर विद्यार्थी लोगों को बचाने नंगे पैर बिना कुछ खाए-पिये निकल पड़े। पत्नी ने रोका पर नहीं माने। दो दिन बाद अस्पताल में शव मिला। बाद में जांच से पता लगा कि चौबेगोला में दंगाई की भीड़ से घिर विद्यार्थी पर वार पर वार करके उन्हें मार दिया गया।
चंपारण आंदोलन में भूमिका
बिहार के किसानों की व्यथा से दुखी वहां के राम कुमार शुक्ल महात्मा गांधी को चंपारण ले जाना चाहते थे। वह उनसे दो बार मिले, पर बात नहीं बनी। विद्यार्थी जी के प्रताप अखबार में किसानों की दुदर्शा पर खूब लिखा जा रहा था। विद्यार्थी जी पर शोध पुस्तक लिखने वाले अमित राजपूत का कहना है कि विद्यार्थी के जरिए ही राम कुमार शुक्ल कानपुर में गांधी जी से मिले। इसके बाद ही गांधी जी चंपारण गए और निर्णायक सफल आंदोलन किया। तभी डा.राजेंद्र प्रसाद भी गांधी जी के संपर्क में आए।
झंडा गीत के प्रेरक
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्याम लाल पार्षद जी गणेश शंकर विद्यार्थी के सहयोगी थी। विद्यार्थी जी की प्रेरणा से ही उन्होंने कानपुर में झंडा गीत लिखा, जिसे कुछ संशोधन के बाद जारी कर दिया गया। इसे सबसे पहले कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया। आजादी के बाद 15 अगस्त को देश के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में दिल्ली में श्याम लाल पार्षद ने झंडा गीत (झंडा ऊंचा रहे हमारा) गाया।
इनके दम पर विद्यार्थी जी यादों में
1954 में समाजसेवी राधा कृष्ण अवस्थी ने अपने सहयोगी कैलाशनाथ त्रिपाठी के साथ मिलकर गणेश शंकर स्मारक शिक्षा समिति का गठन किया। विद्यार्थी जी के नाम पर पांडुनगर में मांटेसरी और इंटर कालेज खोला। दैनिक गणेश अखबार निकाला। एक प्रतिमा फूलबाग में (अनावरण किया जवाहरलाल नेहरू ने), एक प्रतिमा पांडुनगर में (अनावरण किया इंदिरा गांधी ने) स्थापित करवाई। दिल्ली में पत्रकार विद्यापीठ, व्याख्यान माला, क्रांति का उद्घोष ग्रंथ प्रकाशित करवाया जिसमें विद्यार्थी के प्रताप अखबार के 400 संपादकीय लेखों का संकलन है। 1981 में प्रधानमंत्री आवास में विद्यार्थी जी का 50वां बलिदान दिवस मनाया गया, जिसमें राधा कृष्ण अवस्थी के साथ इंदिरा गांधी, ज्ञानी जैल सिंह और वीपी सिंह मौजूद रहे। राधाकृष्ण अवस्थी की मृत्यु के बाद संस्था का काम कैलाश नाथ त्रिपाठी और मणिकांत जैन संभाल रहे हैं। कानपुर का मेडिकल कालेज विद्यार्थी जी के नाम पर है।
प्रताप शताब्दी समारोह
वरिष्ठ पत्रकार विष्णु त्रिपाठी और उनके सहयोगियों ने प्रताप अखबार के 100 साल पूरे होने पर 2013 को पूरे साल शताब्दी समारोह आयोजित किए थे। कई कार्यक्रम और पुस्तक का प्रकाशन भी करवाया। इस दौरान अमर उजाला ने प्रताप अखबार के संपादकीय के अंश हर दिन (पूरे साल) विश्लेषण के साथ प्रकाशित किए।
1954 में समाजसेवी राधा कृष्ण अवस्थी ने अपने सहयोगी कैलाशनाथ त्रिपाठी के साथ मिलकर गणेश शंकर स्मारक शिक्षा समिति का गठन किया। विद्यार्थी जी के नाम पर पांडुनगर में मांटेसरी और इंटर कालेज खोला। दैनिक गणेश अखबार निकाला। एक प्रतिमा फूलबाग में (अनावरण किया जवाहरलाल नेहरू ने), एक प्रतिमा पांडुनगर में (अनावरण किया इंदिरा गांधी ने) स्थापित करवाई। दिल्ली में पत्रकार विद्यापीठ, व्याख्यान माला, क्रांति का उद्घोष ग्रंथ प्रकाशित करवाया जिसमें विद्यार्थी के प्रताप अखबार के 400 संपादकीय लेखों का संकलन है। 1981 में प्रधानमंत्री आवास में विद्यार्थी जी का 50वां बलिदान दिवस मनाया गया, जिसमें राधा कृष्ण अवस्थी के साथ इंदिरा गांधी, ज्ञानी जैल सिंह और वीपी सिंह मौजूद रहे। राधाकृष्ण अवस्थी की मृत्यु के बाद संस्था का काम कैलाश नाथ त्रिपाठी और मणिकांत जैन संभाल रहे हैं। कानपुर का मेडिकल कालेज विद्यार्थी जी के नाम पर है।
प्रताप शताब्दी समारोह
वरिष्ठ पत्रकार विष्णु त्रिपाठी और उनके सहयोगियों ने प्रताप अखबार के 100 साल पूरे होने पर 2013 को पूरे साल शताब्दी समारोह आयोजित किए थे। कई कार्यक्रम और पुस्तक का प्रकाशन भी करवाया। इस दौरान अमर उजाला ने प्रताप अखबार के संपादकीय के अंश हर दिन (पूरे साल) विश्लेषण के साथ प्रकाशित किए।
गणेश-गाथा
26 अक्तूबर 1890 में जन्म। हथगाम, ग्वालियर और प्रयागराज में शिक्षा-दीक्षा। 1908 में कानपुर आ गए। करेंसी में नौकरी की। पीपीएन कालेज में अध्यापक। कर्मयोगी, स्वराज्य और हितवार्ता से जुड़े। 1911 में सरस्वती पत्रिका में महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहायक बने। अभ्युदय में सहायक संपादक बने। 9 नवंबर 1913 को साप्ताहिक हिंदी अखबार प्रताप शुरू किया जो 1920 में दैनिक हो गया। स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे और सात बाद जेल गए। 1925 में कानपुर में कांग्रेस अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष। 1930 में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष। कइयों को कवि, पत्रकार, साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी बनने की प्रेरणा दी। गोरखपुर हिंदी साहित्य सम्मेलन (19 वें) के अध्यक्ष चुने गए। 1926 में एमएलसी। मजदूर सभा और गणेश सेवा आश्रम की स्थापना। भगत सिंह सहित कई क्रांतिकारियों की शरणस्थली था प्रताप अखबार दफ्तर। महात्मा गांधी सहित कई बड़े नेता प्रताप प्रेस कई बार आए। 25 मार्च 1931 में चौबेगोला में दंगे के दौरान लोगों को बचाते विद्यार्थी जी शहीद हो गए।
प्रस्तुति- शैलेश अवस्थी
26 अक्तूबर 1890 में जन्म। हथगाम, ग्वालियर और प्रयागराज में शिक्षा-दीक्षा। 1908 में कानपुर आ गए। करेंसी में नौकरी की। पीपीएन कालेज में अध्यापक। कर्मयोगी, स्वराज्य और हितवार्ता से जुड़े। 1911 में सरस्वती पत्रिका में महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहायक बने। अभ्युदय में सहायक संपादक बने। 9 नवंबर 1913 को साप्ताहिक हिंदी अखबार प्रताप शुरू किया जो 1920 में दैनिक हो गया। स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे और सात बाद जेल गए। 1925 में कानपुर में कांग्रेस अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष। 1930 में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष। कइयों को कवि, पत्रकार, साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी बनने की प्रेरणा दी। गोरखपुर हिंदी साहित्य सम्मेलन (19 वें) के अध्यक्ष चुने गए। 1926 में एमएलसी। मजदूर सभा और गणेश सेवा आश्रम की स्थापना। भगत सिंह सहित कई क्रांतिकारियों की शरणस्थली था प्रताप अखबार दफ्तर। महात्मा गांधी सहित कई बड़े नेता प्रताप प्रेस कई बार आए। 25 मार्च 1931 में चौबेगोला में दंगे के दौरान लोगों को बचाते विद्यार्थी जी शहीद हो गए।
प्रस्तुति- शैलेश अवस्थी