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‘आधुनिकता और सरल सहज जीवन’ हिंदी भाषा को भूल रहे लोग- शिक्षाविद पवन गुप्ता
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 06 Jul 2018 12:17 AM IST
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यति संकल्प संस्थान की वेबसाइड का लोकार्पण करतीं कुलपति प्रो नीलिमा गुप्ता, शिक्षाविद पवन गुप्ता
- फोटो : अमर उजाला
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कानपुरः सोसायटी फॉर इंटीग्रेटेड डेवलेपमेंट ऑफ हिमालयाज, मसूरी के संस्थापक पवन गुप्ता ने सरल उदाहरण व बातों के जरिए लोगों को आधुनिकता और सहजता का मतलब समझाया। शिक्षा व्यवस्था पर कहा कि वर्तमान में स्कूलों का पाठ्यक्रम सहजता भरा नहीं है बल्कि होड़, तुलना पर आधारित है। इसका बीज मां- बाप ही बच्चे में डालते हैं जब वे उनसे कक्षा में अव्वल रहने की अपेक्षा करते हैं। आज की शिक्षा में ज्ञान और जानकारी में कोई अंतर नहीं रह गया है। स्कूलों में भ्रम फैलाया जा रहा है कि जानकारी ही ज्ञान है, लेकिन आधुनिकता के बाजार को यह भ्रम पसंद है। सबको मिलकर कोशिश करनी चाहिए कि हम ऐसा वातावरण अपने आसपास बनाएं जिससे बच्चे सजग और सरल बनें। आज के स्कूल, कॉलेज के बच्चे आत्मसंकोची हो गए हैं। मैं क्या हूं, क्या बनना चाहता, ये सब दूसरे की नजरों से तय कर रहे हैं।
समाजसेवी यतींद्रजीत सिंह यति की स्मृति व 50वें जन्मदिवस पर सिविल लाइंस स्थित लिटिल शेफ में यति संकल्प संस्थान के उद्घाटन अवसर पर ‘आधुनिकता और सरल सहज जीवन’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. अतुल कपूर, नीलिमा गुप्ता, वीरेंद्र जीत सिंह व नीतू सिंह ने दीप जलाकर किया। कार्यक्रम में शिक्षा, समाजसेवा आदि क्षेत्रों के नामचीन चेहरों ने शिरकत की। यति संकल्प संस्थान का मुख्य उद्देश्य गो सेवा, पर्यावरण संरक्षण, पिछड़े इलाकों में रोजगार परक शिक्षा देना आदि है।
आज की शिक्षा से बस नकलची ही रह जाते हैं बच्चे
पवन गुप्ता ने बताया कि पिछले 30 सालों से वे उत्तराखंड में रह रहे हैं। हमेशा से जानना चाहते थे कि पहाड़ों में रहने वाले लोगों की जीवनशैली कैसी होती है। वहां का एक किस्सा सुनाते हुए पवन ने बताया कि वे मसूरी के एक गांव में जाया करते थे। वहां के प्रधान ने कहा कि गांव में स्कूल नहीं है तो आप बच्चों को पढ़ा दें। उन्होंने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद गांव की महिलाओं ने कहा कि आपकी शिक्षा बच्चों को बर्बाद कर रही है। शिक्षा लेने के बाद बच्चे न घर के रहते हैं न घाट के। ये बात पहले तो उनको समझ नहीं आई लेकिन काफी अध्यनन के बाद उनको ये पता चला कि शिक्षा स्कूल और घर के बीच का फासला बढ़ाती जा रही है। शिक्षित होने के बाद बच्चों के मन में यह भाव पैदा होने लगता है कि उनका घर, परिवार, रहन- सहन ठीक नहीं है। उनके मन में हीन भावना आने लगती है। पवन बोले कि इस बात को 1909 से लेकर 1924 तक महात्मा गांधी भी लगातार कहते थे कि अंग्रेजी शिक्षा ने फासले बढ़ा दिए हैं। घर में दूसरी बोली, रहन- सहन और स्कूल में दूसरा। इस वजह से वो सहजता को भूलते हुए मॉडर्न, विकसित होने के लिए दूसरे की नकल करने लगते हैं और बस एक नकलची ही रह जाते हैं।
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हिंदी भाषा को भूलते जा रहे लोग
आज की मॉडर्न जिंदगी के बारे में बात करते हुए पवन ने कहा कि आज के दौर में लोग अंग्रेजी भाषा को खासा महत्व देने लग गए हैं। उनको लगता है कि बिना अंग्रेजी जाने न उनको समाज में जगह मिलेगी और न ही एक सम्मानित जीवन। हिंदी भाषा को लेकर सबके मन में हीन भावना पैदा होने लगी है। यही वजह है कि वो अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। न आज के बच्चों को लोक कथाओं का ज्ञान है और न ही लोक ज्ञान परंपरा का।
पद-पैसे को सब दे रहे महत्व
पवन बोले कि भारत में लोग एक- दूसरे और यहां तक की खुद को भी पद- पैसे ओर डिग्री के आधार पर बड़ा आदती मानते हैं। यहां पर अगर किसी पीएचडी वाले से उसका नाम पूछो तो वो अपने नाम के आगे डॉ. लगाना नहीं भूलते हैं, लेकिन ये कल्चर विदेशों में नहीं हैं। हम यहां पर अपने बच्चों को भी यही सिखाते हैं कि पद, पैसा ही सबकुछ है। भारतीयों के जीवन में सहजता तो रह नहीं गई।
लोक, ज्ञान, परंपरा को एक बार आजमा कर देखो
अपनी संस्कृति से दूर हो रहे और आधुनिक होने की होड़ रखने वाले लोगों के लिए पवन ने कहा कि एक बार ही सही, लोग लोक ज्ञान परंपरा को आजमा कर के तो देखें। मॉडर्न साइंस लोक ज्ञान को नहीं मानती हैं। उसका कहन है कि यह अंधविश्वास है। एक उदाहरण देते हुए पवन ने कहा कि लोक ज्ञान के हिसाब से कौए के घोंसले की पोजीशन देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि इस बार कितनी बारिश होगी। अगर पेड़ पर मध्य में कौआ घोंसला बनाता है तो इससे अंदाजा लगता है कि इस बार अच्छी बारिश होगी और अगर घोंसला बहुत ऊपर की ओर बना हुआ है तो अंदाजा होता है कि बारिश कम या फिर नहीं होगी।
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समाजसेवी यतींद्रजीत सिंह यति की स्मृति व 50वें जन्मदिवस पर सिविल लाइंस स्थित लिटिल शेफ में यति संकल्प संस्थान के उद्घाटन अवसर पर ‘आधुनिकता और सरल सहज जीवन’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. अतुल कपूर, नीलिमा गुप्ता, वीरेंद्र जीत सिंह व नीतू सिंह ने दीप जलाकर किया। कार्यक्रम में शिक्षा, समाजसेवा आदि क्षेत्रों के नामचीन चेहरों ने शिरकत की। यति संकल्प संस्थान का मुख्य उद्देश्य गो सेवा, पर्यावरण संरक्षण, पिछड़े इलाकों में रोजगार परक शिक्षा देना आदि है।
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आज की शिक्षा से बस नकलची ही रह जाते हैं बच्चे
पवन गुप्ता ने बताया कि पिछले 30 सालों से वे उत्तराखंड में रह रहे हैं। हमेशा से जानना चाहते थे कि पहाड़ों में रहने वाले लोगों की जीवनशैली कैसी होती है। वहां का एक किस्सा सुनाते हुए पवन ने बताया कि वे मसूरी के एक गांव में जाया करते थे। वहां के प्रधान ने कहा कि गांव में स्कूल नहीं है तो आप बच्चों को पढ़ा दें। उन्होंने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद गांव की महिलाओं ने कहा कि आपकी शिक्षा बच्चों को बर्बाद कर रही है। शिक्षा लेने के बाद बच्चे न घर के रहते हैं न घाट के। ये बात पहले तो उनको समझ नहीं आई लेकिन काफी अध्यनन के बाद उनको ये पता चला कि शिक्षा स्कूल और घर के बीच का फासला बढ़ाती जा रही है। शिक्षित होने के बाद बच्चों के मन में यह भाव पैदा होने लगता है कि उनका घर, परिवार, रहन- सहन ठीक नहीं है। उनके मन में हीन भावना आने लगती है। पवन बोले कि इस बात को 1909 से लेकर 1924 तक महात्मा गांधी भी लगातार कहते थे कि अंग्रेजी शिक्षा ने फासले बढ़ा दिए हैं। घर में दूसरी बोली, रहन- सहन और स्कूल में दूसरा। इस वजह से वो सहजता को भूलते हुए मॉडर्न, विकसित होने के लिए दूसरे की नकल करने लगते हैं और बस एक नकलची ही रह जाते हैं।
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हिंदी भाषा को भूलते जा रहे लोग
आज की मॉडर्न जिंदगी के बारे में बात करते हुए पवन ने कहा कि आज के दौर में लोग अंग्रेजी भाषा को खासा महत्व देने लग गए हैं। उनको लगता है कि बिना अंग्रेजी जाने न उनको समाज में जगह मिलेगी और न ही एक सम्मानित जीवन। हिंदी भाषा को लेकर सबके मन में हीन भावना पैदा होने लगी है। यही वजह है कि वो अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। न आज के बच्चों को लोक कथाओं का ज्ञान है और न ही लोक ज्ञान परंपरा का।
पद-पैसे को सब दे रहे महत्व
पवन बोले कि भारत में लोग एक- दूसरे और यहां तक की खुद को भी पद- पैसे ओर डिग्री के आधार पर बड़ा आदती मानते हैं। यहां पर अगर किसी पीएचडी वाले से उसका नाम पूछो तो वो अपने नाम के आगे डॉ. लगाना नहीं भूलते हैं, लेकिन ये कल्चर विदेशों में नहीं हैं। हम यहां पर अपने बच्चों को भी यही सिखाते हैं कि पद, पैसा ही सबकुछ है। भारतीयों के जीवन में सहजता तो रह नहीं गई।
लोक, ज्ञान, परंपरा को एक बार आजमा कर देखो
अपनी संस्कृति से दूर हो रहे और आधुनिक होने की होड़ रखने वाले लोगों के लिए पवन ने कहा कि एक बार ही सही, लोग लोक ज्ञान परंपरा को आजमा कर के तो देखें। मॉडर्न साइंस लोक ज्ञान को नहीं मानती हैं। उसका कहन है कि यह अंधविश्वास है। एक उदाहरण देते हुए पवन ने कहा कि लोक ज्ञान के हिसाब से कौए के घोंसले की पोजीशन देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि इस बार कितनी बारिश होगी। अगर पेड़ पर मध्य में कौआ घोंसला बनाता है तो इससे अंदाजा लगता है कि इस बार अच्छी बारिश होगी और अगर घोंसला बहुत ऊपर की ओर बना हुआ है तो अंदाजा होता है कि बारिश कम या फिर नहीं होगी।