{"_id":"58b6e40c4f1c1b5d1c83110a","slug":"plant-is-panacea-to-cure-goiter-and-thyroid","type":"story","status":"publish","title_hn":"घेंघा और थायराइड के इलाज में रामबाण है ये पौधा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घेंघा और थायराइड के इलाज में रामबाण है ये पौधा
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 03 Mar 2017 01:41 AM IST
विज्ञापन
आयुष्मा अध्यक्ष का दावा, वैज्ञानिक खोज का दिया हवाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
तालाबों को तबाह करने वाली जलकुंभी सिर्फ घास ही नहीं, दवा भी है। घेंघा और थायराइड जैसे खतरनाक मर्जाें की यह अचूक औषधि है। दोनों मर्ज भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं। 10 में से दो महिलाएं इसकी शिकार हैं। यह आंकड़ा और भी बढ़ रहा है।
बांदा के आयुष्मा अध्यक्ष और बोर्ड ऑफ आयुर्वेदिक एंड यूनानी तिब्बती सिस्टम ऑफ मेडिसिन उत्तर प्रदेश सदस्य डॉ. मदनगोपाल वाजपेयी का दावा है कि पोखरों और तालाबों में पाई जाने वाली जलकुंभी की राख घेंघा और थायराइड रोगियों के लिए रामबाण है। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व आयुर्वेद के मनीषी वृंद माधव ने लिखा था- ‘जलकुंभीकजं भस्म पक्व गोमूत्र गालितम्, पिवेत कोद्रव तक्राशी गलगंडोपशांतये’। उन्होंने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिकों की खोज में भी पाया गया है कि जलकुंभी में 0.20 प्रतिशत कैल्शियम, 0.6 प्रतिशत फास्फोरस होता है। विटामिन ए, बी और सी प्रचुर मात्रा में होते हैं। आयुर्वेद के मुताबिक यह शोथहर, रक्तशोधक, पेशाब लाने वाली और दुर्बलता दूर करती है। जलकुंभी की भस्म इस्तेमाल करने पर हायपर थायराइडिज्म रोगी को फायदा होता है। कई चीजों के साथ इसे मिलाकर छह माह सेवन करना चाहिए। डॉ. वाजपेयी ने कहा कि आयुष चिकित्सक अगर जलकुंभी से थायराइड रोगियों का इलाज शुरू कर दें तो तालाब साफ हो जाएंगे और रोगी रोग मुक्त होंगे।
डा.मदनगोपाल वाजपेयी ने बताया कि जलकुंभी की भस्म सीधे आग लगाकर राख करके नहीं बनाई जाती। मिट्टी की हांडी (छोटा मटका) में जलकुंभी बेल भरकर आग पर रख दिया जाता है। आग की आंच में धीरे-धीरे पकने के बाद बेल सूखकर राखनुमा भस्म में तब्दील हो जाएगी। सुझाव दिया कि मरीज आयुर्वेद चिकित्सक से संपर्क करने के बाद भस्म का इस्तेमाल करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
बांदा के आयुष्मा अध्यक्ष और बोर्ड ऑफ आयुर्वेदिक एंड यूनानी तिब्बती सिस्टम ऑफ मेडिसिन उत्तर प्रदेश सदस्य डॉ. मदनगोपाल वाजपेयी का दावा है कि पोखरों और तालाबों में पाई जाने वाली जलकुंभी की राख घेंघा और थायराइड रोगियों के लिए रामबाण है। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व आयुर्वेद के मनीषी वृंद माधव ने लिखा था- ‘जलकुंभीकजं भस्म पक्व गोमूत्र गालितम्, पिवेत कोद्रव तक्राशी गलगंडोपशांतये’। उन्होंने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिकों की खोज में भी पाया गया है कि जलकुंभी में 0.20 प्रतिशत कैल्शियम, 0.6 प्रतिशत फास्फोरस होता है। विटामिन ए, बी और सी प्रचुर मात्रा में होते हैं। आयुर्वेद के मुताबिक यह शोथहर, रक्तशोधक, पेशाब लाने वाली और दुर्बलता दूर करती है। जलकुंभी की भस्म इस्तेमाल करने पर हायपर थायराइडिज्म रोगी को फायदा होता है। कई चीजों के साथ इसे मिलाकर छह माह सेवन करना चाहिए। डॉ. वाजपेयी ने कहा कि आयुष चिकित्सक अगर जलकुंभी से थायराइड रोगियों का इलाज शुरू कर दें तो तालाब साफ हो जाएंगे और रोगी रोग मुक्त होंगे।
विज्ञापन
डा.मदनगोपाल वाजपेयी ने बताया कि जलकुंभी की भस्म सीधे आग लगाकर राख करके नहीं बनाई जाती। मिट्टी की हांडी (छोटा मटका) में जलकुंभी बेल भरकर आग पर रख दिया जाता है। आग की आंच में धीरे-धीरे पकने के बाद बेल सूखकर राखनुमा भस्म में तब्दील हो जाएगी। सुझाव दिया कि मरीज आयुर्वेद चिकित्सक से संपर्क करने के बाद भस्म का इस्तेमाल करें।
विज्ञापन