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यूपी, एमपी और बिहार के तमाम पीएचडी छात्रों ने वर्धा में छेड़ा बड़ा आंदोलन, ये है वजह

Sat, 08 Apr 2017 06:19 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Sat, 08 Apr 2017 06:19 PM IST
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movement of students in mahatma gandhi international hindi university
वर्धा यूनिवर्सिटी में छात्रों का बड़ा आंदोलन
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) में पीएचडी कर रहे हिंदी भाषी राज्यों के तमाम जिलों के छात्रों ने बड़ा आंदोलन छेड़ रखा है। यूजीसी द्वारा शोधकार्य के विषयों में सीटों की संख्या में 87 प्रतिशत कटौती से नाराज होकर छात्रों ने सरकार के इस एक्शन का कड़ा विरोध जताया है। शनिवार को वर्धा यूनिवर्सिटी में हिंदी भाषा से पीएचडी कर रहे यूपी के तमाम छात्रों ने सरकार के इस निर्णय को वापस लेने की मांग की।
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पीएचडी करना मुश्किल
कानपुर के जीएनके इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट और फिर क्राइस्टचर्च कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के बाद वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से सोशलवर्क में पीएचडी करने पहुंचे नरेश गौतम ने पीएचडी और एमफिल की सीटें घटाने का कड़ा विरोध जताया। नरेश ने बताया कि यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (यूजीसी)  ने पिछले साल एमफिल और पीएचडी की फेलोशिप बंद किए जाने का नोटिफिकेशन दिया था । छात्रों के विरोध के बाद इसमें संशोधन कर ऐसा नियम बना दिया गया जिससे अब छात्रों को पीएचडी करना मुश्किल हो जाएगा। शोध कार्यों से जुड़े विषयों में 87 फीसदी सीटों की कटौती कर दी गई। इसका असर ये हुआ कि वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय में इस वर्ष एम.फिल की 66 और पी.एच.डी.की 31 सीटे ही आई हैं जबकि पिछले वर्ष एम.फिल की 240 और पी.एच.डी. की 65 सीटें थीं। यूजीसी, केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के ढुल-मुल रवैये के कारण विद्यार्थीयो में हताशा और आक्रोश एक साथ है।
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कहीं शिक्षा से वंचित न कर दिया
शोध की इच्छा रखने वाले स्टूडेन्ट्स बहुत परेशान हैं कि ऐसी स्थिति में वे अपना शोध कैसे कर पाएंगे। यूजीसी के इस निर्णय का दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उन्नाव की अंकिता कहना है कि अभी तो एम फिल/ पीएच. डी की सीटें काटी जा रहीं हैं, हो सकता है कल को शिक्षा से वंचित कर दिया जाए। इसी तरह कानपुर और आसपास जिलों के तमाम छात्रों अरविंद यादव, राजेश, प्रीती आदि का कहना है कि यूजीसी नोटिफिकेशन में शिक्षक और शोधार्थियों का निश्चित अनुपात होने की बात कही गई है। इसकी आड़ में विद्यार्थियों के एक बड़े वर्ग को शोध से वंचित रखने की साजिश रची जा रही है। शोध की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए जरूरी था कि शिक्षको की संख्या बढाई जाए लेकिन उल्टा विद्यार्थियों की ही संख्या कम कर दी गई। इन छात्रों का मानना है कि सरकार यह नोटिफिकेशन विश्वविद्यालयों पर इस लिए थोप रही है जिससे कि विश्व बाजार के लिए सस्ते श्रम का निर्माण किया जा सके। इससे वंचित समाज के विद्यार्थी प्रभावित तो होंगे ही साथ ही साथ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। छात्रों के इस विरोध प्रदर्शन में आइसा छात्र संगठन (All India Student Association) शामिल हो चुका है लगातार तीसरे दिन आंदोलन जारी है। छात्रों ने अपने आन्दोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि जब-जब  हमारे साथ अन्याय होगा तो हम सभी सड़को पर उतर कर विश्वविद्यालय और यूजीसी का मुंहतोड़ जवाब देंगे।
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