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दहशत के वो 101 घंटे, अपनों से मिल बही आंसुओं की धार, घर पहुंचे व्यापारी ने सुनाई दर्द भरी दास्तां
Tue, 20 Aug 2019 06:25 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
यूपी डेस्क, अमर उजाला, चित्रकूट
यूपी डेस्क, अमर उजाला, चित्रकूट
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Tue, 20 Aug 2019 06:25 PM IST
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डकैतों की कैद से छूटने के बाद घर पहुंचा किसान
- फोटो : अमर उजाला
चित्रकूट के मानिकपुर में कुख्यात डकैत बबुली कोल गैंग की पकड़ से 101 घंटे 30 मिनट बाद छूटकर घर पहुंचे किसान/खोया व्यापारी बृजमोहन पांडेय निवासी निही थाना मानिकपुर ने जब अपने परिजनों को देखा तो उसकी आंखें डबडबा गईं। पत्नी भाई, बच्चों व अन्य लोगाें से गले मिलते ही आंसुओं की धार बहने लगी। वह कमरे के अंदर चले गए और दो घंटे तक किसी से बातचीत नहीं की।
जो भी दरवाजे पर पहुंचता तो यहीं कहते अभी किसी से नहीं मिलना है। कुछ देर बाद अमर उजाला से बातचीत शुरू की तो दर्द की दास्तां बताते उनकी आंखें नम हो गईं। बताया कि 15 अगस्त की रात लगभग 9 बजे डाकू बबुली व लवलेश गैंग उन्हें पकड़कर ले गया था। उसी रात गांव से चंदनियां पहाड़ की ओर से अज्ञात स्थान पर ले गए। रात को कुछ खाने को नहीं मिला।
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जो भी दरवाजे पर पहुंचता तो यहीं कहते अभी किसी से नहीं मिलना है। कुछ देर बाद अमर उजाला से बातचीत शुरू की तो दर्द की दास्तां बताते उनकी आंखें नम हो गईं। बताया कि 15 अगस्त की रात लगभग 9 बजे डाकू बबुली व लवलेश गैंग उन्हें पकड़कर ले गया था। उसी रात गांव से चंदनियां पहाड़ की ओर से अज्ञात स्थान पर ले गए। रात को कुछ खाने को नहीं मिला।
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डकैतों के चंगुल से छूटने के बाद
- फोटो : अमर उजाला
सुबह सूखी रोटी व थोड़ी सब्जी मिली थी। डकैतों की संख्या कभी 5 तो कभी 10 हो जाती थी। दिन में ज्यादातर डकैत उनकी आंखों में पट्टी बांधते थे लेकिन ज्यादा कहीं चलाते नहीं थे। रात को पट्टी खोल देते थे और अड्डा भी बदलते थे। इस दौरान बबुली व लवलेश लगातार फोन से फिरौती पहुंचाने की बात उनके परिजन व अन्य मध्यस्थों से करते थे। कई बार पहाड़ से उन्हें पुलिस भी दूर दिखाई पड़ी।
पुलिस की भनक डकैतों को लगते ही वह चुपचाप पहाड़ों मेें ही दुबक जाते थे। डकैतों के पास असलहे थे और आपस में यह भी बात करते थे कि जल्दी इस अपहरण का मामला फाइनल करो नहीं तो पुलिस का दबाव बढ़ रहा है। दो बार बात बनते बनते रह गई। हर बार डकैत उन्हें लेकर सड़क तक पहुंचे लेकिन अचानक अपनी योजना बदल देते थे। उनके साथ एक डकैत हर समय रहता था जिसे कुछ भी बोलने या पूछने की इजाजत नहीं थी।
अपहृत ने बताया कि दहशत के इन 101 घंटे 30 मिनट इस तरह गुजरे मानों उम्रकैद की कोई सजा काटकर घर आया है। डकैत आधुनिक हथियार से लैस हैं। उनके पास भोजन सामग्री भी रहती है। एक भी दिन डकैतों ने उन्हें भूखा नहीं रखा हां आधा पेट ही भोजन मिलता था। एक तालाब के पास पानी पीने भी सभी जाते थे। इतने दिनों तक डकैतों ने उन्हें एक भी बार मारा पीटा नहीं है लेकिन दहशत के कारण उनका स्वास्थ्य खराब हो गया था।
पुलिस की भनक डकैतों को लगते ही वह चुपचाप पहाड़ों मेें ही दुबक जाते थे। डकैतों के पास असलहे थे और आपस में यह भी बात करते थे कि जल्दी इस अपहरण का मामला फाइनल करो नहीं तो पुलिस का दबाव बढ़ रहा है। दो बार बात बनते बनते रह गई। हर बार डकैत उन्हें लेकर सड़क तक पहुंचे लेकिन अचानक अपनी योजना बदल देते थे। उनके साथ एक डकैत हर समय रहता था जिसे कुछ भी बोलने या पूछने की इजाजत नहीं थी।
अपहृत ने बताया कि दहशत के इन 101 घंटे 30 मिनट इस तरह गुजरे मानों उम्रकैद की कोई सजा काटकर घर आया है। डकैत आधुनिक हथियार से लैस हैं। उनके पास भोजन सामग्री भी रहती है। एक भी दिन डकैतों ने उन्हें भूखा नहीं रखा हां आधा पेट ही भोजन मिलता था। एक तालाब के पास पानी पीने भी सभी जाते थे। इतने दिनों तक डकैतों ने उन्हें एक भी बार मारा पीटा नहीं है लेकिन दहशत के कारण उनका स्वास्थ्य खराब हो गया था।