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Kanpur News: पावर प्लांट के नाम पर चली गई जमीन, छला महसूस कर रहे किसान
Fri, 15 May 2026 01:55 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
Updated Fri, 15 May 2026 01:55 AM IST
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मूसानगर (कानपुर देहात)। भोगनीपुर तहसील के चपरघटा में लगने वाले 1320 मेगावाट के पावर प्लांट के नाम पर सात गांव के किसानों के 2332 एकड़ जमीन लेकर कंपनियों को दे दी गई। जमीन अधिग्रहण के बाद श्रेणी बदलने, खतौनी में नाम दर्ज कराने का खेल किया गया। इसके बाद कंपनियां ऋण लेकर गायब हो गईं। अब किसान अपने आप को छला महसूस कर रहे हैं।
वर्ष 2011 में चपरघटा, अमिलिया, सिहारी, कछगांव, कृपालपुर, रसूलापुर भुरमुंडा, भरतौली में अधिग्रहीत की गई जमीन शर्तों के तहत हिमावत पावर प्राइवेट लिमिटेड और लैंको अनपरा पावर लिमिटेड को दी गई थी। जिस समय जमीन का पुर्नग्रहण, अधिग्रहण हुआ उस समय किसानों को रोजगार दिलाने, क्षेत्र में विकास होने के सपने दिखाए गए थे। 15 वर्ष बीत जाने के बाद आज भी जमीन खाली पड़ी है। इस जमीन पर पावर प्लांट लगने का सपना अधूरा रह गया और कंपनी करोड़ों का ऋण लेकर चलती बनीं। अब शासन के निर्देश पर कूटरचित दस्तावेज तैयार कर धोखाधड़ी किए जाने का मुकदमा दर्ज हुआ तो प्रभावित गांवों के किसानों का दर्द खुलकर सामने आने लगा है। किसान जमीन वापस किए जाने की मांग उठा रहे हैं।
पथार गांव के राजू ने बताया कि उनकी डेढ़ बीघा जमीन पावर प्लांट परियोजना में अधिग्रहीत की गई थी। उस समय उम्मीद थी कि गांव में उद्योग लगने से रोजगार और विकास के अवसर बढ़ेंगे लेकिन इतने वर्षों बाद भी परियोजना शुरू नहीं हो सकी। रामफूल ने बताया कि उनकी करीब सात बीघा तथा उनके पिता सेवक राम की 13 बीघा जमीन अधिग्रहित हुई थी। उन्होंने कहा कि गांव में बड़े प्रोजेक्ट की घोषणा से लोगों को विकास की उम्मीद जगी थी। वर्षों बीतने के बाद भी आज भी जमीन बंजर पड़ी है। कंपनियों ने किसानों के साथ-साथ प्रशासन से भी धोखाधड़ी की है।
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चपरघटा गांव के माधव ने बताया कि उनकी सात बीघा जमीन परियोजना में गई थी। मांग के अनुरूप मुआवजा नहीं मिला। आरोप लगाया कि फर्जी दस्तावेज तैयार कर जमीन की नीलामी तक कर दी गई। उन्होंने कहा कि प्लांट लगने से गांव में रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं की उम्मीद थी लेकिन अब लोग खाली हाथ हैं। किसानों का कहना है कि यदि प्लांट नहीं लगना है तो जमीन वापस की जाए।
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तीन लाख बीघा के हिसाब से मिला रुपया
पथार गांव के राम सजीवन ने बताया कि उनकी तीन बीघा तथा उनके पिता मुंशी की सात बीघा जमीन अधिग्रहीत हुई थी। कंपनी ने हर परिवार को नौकरी, गांव में स्कूल, सड़क, अस्पताल और बेहतर बिजली व्यवस्था का वादा किया था। किसानों को तीन लाख रुपये प्रति बीघा मुआवजा दिया गया जबकि किसान 5.70 लाख रुपये प्रति बीघा की मांग कर रहे थे। शुरुआत से लेकर अब तक किसानों का दर्द किसी ने नहीं समझा।
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रोजगार का दिखाया सपना, नहीं हुआ पूरा
चपरघटा के दिव्यांग गोविंद सिंह ने बताया कि उनकी करीब डेढ़ बीघा जमीन परियोजना में गई थी। जिस समय जमीन अधिग्रहीत की गई थी। तब गांव के युवाओं को नौकरी देने का कंपनियों के प्रतिनिधियों ने वादा किया था। बेरोजगार युवाओं को गांव के पास ही रोजगार मिलने की उम्मीद जगी थी। सालो इंतजार करते गुजर गया। उन्हें उम्मीद थी कि प्लांट लगने पर रोजगार मिलेगा लेकिन आज तक कोई लाभ नहीं मिला।
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जमीन की श्रेणी बदले जाने का हुआ था विरोध
चपरघटा गांव के लालू ने बताया कि वर्ष 2011 में उनकी चार बीघा जमीन अधिग्रहीत हुई थी। क्षेत्र की काफी जमीन ऊबड़-खाबड़ थी लेकिन किसान उसमें थोड़ी बहुत खेती कर लेते थे। आरोप लगाया कि कुछ जमीनों की श्रेणी बदलने की बात भी पता चली। कुछ साल पहले किसानों ने इसका विरोध किया लेकिन किसी जिम्मेदार ने किसानों की बात नहीं सुनी।
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पहले ही जिम्मेदार देते ध्यान तो न बनती यह स्थिति
पथार गांव के कन्हई ने बताया कि उनकी पांच बीघा जमीन अधिग्रहित की गई थी। क्षेत्र के सैकड़ों किसानों की जमीन पावर प्लांट के नाम ली गई, लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी से कंपनियां बिना प्लांट स्थापित करे ही गायब हो गई। दो साल पहले भी लोगों ने आवाज उठाई लेकिन किसानों की बातों को अनसुना कर दिया गया। समय रहते इस पर जिम्मेदार ध्यान देते तो आज यह स्थिति न बनती।
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किसान आज भी जहां के तहां
आढ़न गांव के पुत्तू ने बताया कि जिस समय पावर प्लांट के नाम पर किसानों से जमीन ली गई उस समय लुभावने वादे किए गए। कहा गया था कि क्षेत्र का विकास होगा। बाहरी लोगों की आवाजाही से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर मिलेगा। साथ ही प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को स्थायी नौकरी दिए जाने का वादा किया गया था। किसानों को जमीन के एवज में जो रकम मिली वह भी खर्च हो गई। किसान जहां के तहां है। कई परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट बना हुआ है।
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वर्ष 2011 में चपरघटा, अमिलिया, सिहारी, कछगांव, कृपालपुर, रसूलापुर भुरमुंडा, भरतौली में अधिग्रहीत की गई जमीन शर्तों के तहत हिमावत पावर प्राइवेट लिमिटेड और लैंको अनपरा पावर लिमिटेड को दी गई थी। जिस समय जमीन का पुर्नग्रहण, अधिग्रहण हुआ उस समय किसानों को रोजगार दिलाने, क्षेत्र में विकास होने के सपने दिखाए गए थे। 15 वर्ष बीत जाने के बाद आज भी जमीन खाली पड़ी है। इस जमीन पर पावर प्लांट लगने का सपना अधूरा रह गया और कंपनी करोड़ों का ऋण लेकर चलती बनीं। अब शासन के निर्देश पर कूटरचित दस्तावेज तैयार कर धोखाधड़ी किए जाने का मुकदमा दर्ज हुआ तो प्रभावित गांवों के किसानों का दर्द खुलकर सामने आने लगा है। किसान जमीन वापस किए जाने की मांग उठा रहे हैं।
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पथार गांव के राजू ने बताया कि उनकी डेढ़ बीघा जमीन पावर प्लांट परियोजना में अधिग्रहीत की गई थी। उस समय उम्मीद थी कि गांव में उद्योग लगने से रोजगार और विकास के अवसर बढ़ेंगे लेकिन इतने वर्षों बाद भी परियोजना शुरू नहीं हो सकी। रामफूल ने बताया कि उनकी करीब सात बीघा तथा उनके पिता सेवक राम की 13 बीघा जमीन अधिग्रहित हुई थी। उन्होंने कहा कि गांव में बड़े प्रोजेक्ट की घोषणा से लोगों को विकास की उम्मीद जगी थी। वर्षों बीतने के बाद भी आज भी जमीन बंजर पड़ी है। कंपनियों ने किसानों के साथ-साथ प्रशासन से भी धोखाधड़ी की है।
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चपरघटा गांव के माधव ने बताया कि उनकी सात बीघा जमीन परियोजना में गई थी। मांग के अनुरूप मुआवजा नहीं मिला। आरोप लगाया कि फर्जी दस्तावेज तैयार कर जमीन की नीलामी तक कर दी गई। उन्होंने कहा कि प्लांट लगने से गांव में रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं की उम्मीद थी लेकिन अब लोग खाली हाथ हैं। किसानों का कहना है कि यदि प्लांट नहीं लगना है तो जमीन वापस की जाए।
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तीन लाख बीघा के हिसाब से मिला रुपया
पथार गांव के राम सजीवन ने बताया कि उनकी तीन बीघा तथा उनके पिता मुंशी की सात बीघा जमीन अधिग्रहीत हुई थी। कंपनी ने हर परिवार को नौकरी, गांव में स्कूल, सड़क, अस्पताल और बेहतर बिजली व्यवस्था का वादा किया था। किसानों को तीन लाख रुपये प्रति बीघा मुआवजा दिया गया जबकि किसान 5.70 लाख रुपये प्रति बीघा की मांग कर रहे थे। शुरुआत से लेकर अब तक किसानों का दर्द किसी ने नहीं समझा।
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रोजगार का दिखाया सपना, नहीं हुआ पूरा
चपरघटा के दिव्यांग गोविंद सिंह ने बताया कि उनकी करीब डेढ़ बीघा जमीन परियोजना में गई थी। जिस समय जमीन अधिग्रहीत की गई थी। तब गांव के युवाओं को नौकरी देने का कंपनियों के प्रतिनिधियों ने वादा किया था। बेरोजगार युवाओं को गांव के पास ही रोजगार मिलने की उम्मीद जगी थी। सालो इंतजार करते गुजर गया। उन्हें उम्मीद थी कि प्लांट लगने पर रोजगार मिलेगा लेकिन आज तक कोई लाभ नहीं मिला।
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जमीन की श्रेणी बदले जाने का हुआ था विरोध
चपरघटा गांव के लालू ने बताया कि वर्ष 2011 में उनकी चार बीघा जमीन अधिग्रहीत हुई थी। क्षेत्र की काफी जमीन ऊबड़-खाबड़ थी लेकिन किसान उसमें थोड़ी बहुत खेती कर लेते थे। आरोप लगाया कि कुछ जमीनों की श्रेणी बदलने की बात भी पता चली। कुछ साल पहले किसानों ने इसका विरोध किया लेकिन किसी जिम्मेदार ने किसानों की बात नहीं सुनी।
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पहले ही जिम्मेदार देते ध्यान तो न बनती यह स्थिति
पथार गांव के कन्हई ने बताया कि उनकी पांच बीघा जमीन अधिग्रहित की गई थी। क्षेत्र के सैकड़ों किसानों की जमीन पावर प्लांट के नाम ली गई, लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी से कंपनियां बिना प्लांट स्थापित करे ही गायब हो गई। दो साल पहले भी लोगों ने आवाज उठाई लेकिन किसानों की बातों को अनसुना कर दिया गया। समय रहते इस पर जिम्मेदार ध्यान देते तो आज यह स्थिति न बनती।
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किसान आज भी जहां के तहां
आढ़न गांव के पुत्तू ने बताया कि जिस समय पावर प्लांट के नाम पर किसानों से जमीन ली गई उस समय लुभावने वादे किए गए। कहा गया था कि क्षेत्र का विकास होगा। बाहरी लोगों की आवाजाही से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर मिलेगा। साथ ही प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को स्थायी नौकरी दिए जाने का वादा किया गया था। किसानों को जमीन के एवज में जो रकम मिली वह भी खर्च हो गई। किसान जहां के तहां है। कई परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट बना हुआ है।