Kanpur: कम और बेवक्त सो रहे, युवाओं में बढ़ा तनाव, मनोरोग विभाग की ओपीडी में युवा रोगियों की संख्या बढ़ी
बड़े पैमाने पर आए इस बदलाव के लिए नई श्रेणी बनाई गई है। इसे ‘न्यू नॉर्मल’ कहा जा रहा है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की ओपीडी में प्रतिदिन औसत डेढ़ सौ से दो सौ रोगी आते हैं। इनमें 90 फीसदी को कम सोने की परेशानी होती है। इन रोगियों में 20 से 40 वर्ष आयु के अधिक हैं।
इंडियन साइकेट्रिक सोसाइटी के सेंट्रल जोन के महासचिव डॉ. गणेश शंकर का कहना है कि स्ट्रेस और डिप्रेशन आम आदमियों में अधिक बढ़ा है। यह नींद को प्रभावित करता है। मनोरोग विभाग की ओपीडी में आने वाले युवा रोगियों में डिप्रेशन के रोगी अधिक हैं।
चक्कर आना, पैर की पिंडलियों में ऐंठन, पैर और हाथ के पंजों में झनझनाहट, झटके लगना आदि लक्षण हैं। इनकी हिस्ट्री से पता चला है कि अधिकतर स्ट्रेस का शिकार हैं। इससे उनके अंदर सिगरेट और तंबाकू की लत बढ़ी है। कुछ रोगी रात में एक घंटे ही सो पा रहे हैं।
इनमें आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोग भी शामिल हैं। पुरुषों में यह दिक्कत अधिक है। महिलाओं में अधेड़ आयु वर्ग की रोगियों को यह दिक्कत है। डॉ. गणेश शंकर का कहना है कि देर से सोने को न्यू नॉर्मल श्रेणी में शामिल किया गया।
मोबाइल और लैपटॉप ने बदली आदत
मोबाइल फोन और लैपटॉप पर देर रात तक चैटिंग करने की आदत ने नींद की अवधि प्रभावित की है। मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी का कहना है कि अब रात 12 बजे तक जागना असामान्य नहीं माना जाता है। लोगों को सुबह काम से उठना पड़ता है जिससे नींद पूरी नहीं हो पाती। बाद में यही स्थिति दिक्कत पैदा करती है।
- सोच सकारात्मक रखें, अधिक स्ट्रेस न लें।
- सोने के पहले उलझन वाली बातें न सोचें।
- रात में जल्दी सादा और पौष्टिक भोजन कर लें।
- हल्के रंग की बेड शीट और कपड़े पहनें।
- 60 फीसदी रोगी डिप्रेशन
- 25 फीसदी रोगी एंजाइटी के
- 10 फीसदी रोगी मेनिया के
- पांच फीसदी रोगी सीजोफ्रेनिया और फोबिया के