{"_id":"6094fd0a8ebc3ed7022b7c10","slug":"kanpur-coronavirus-cases-covid-19-pandemic-death-audit","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"चालबाजी: डेथ ऑडिट से बचने के लिए दबाए जा रहे कोरोना से मौतों के आंकड़े, ये है पूरा खेल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चालबाजी: डेथ ऑडिट से बचने के लिए दबाए जा रहे कोरोना से मौतों के आंकड़े, ये है पूरा खेल
Sat, 08 May 2021 12:29 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Sat, 08 May 2021 12:29 PM IST
सार
डेथ कमेटी के अध्यक्ष रहे डॉ. जेएस कुशवाहा ने बताया कि एक-एक करके सभी ने जवाब दे दिया था लेकिन इस बार मौतें कई गुना अधिक हैं जिससे यह खेल रच दिया गया है। मौतों से उनके दिन की पहचान छीन ली जा रही है।
विज्ञापन
भैरो घाट में जलती चिताएं
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कोरोना से मरने वाले रोगियों की संख्या को गोलमोल करके दबाने के पीछे डेथ ऑडिट से बचना भी एक कारण है। डेथ ऑडिट में हर अस्पताल को मौत का कारण और जवाब देना पड़ता है। इसमें यह भी बताना पड़ता है कि रोगी का इलाज किस-किस डॉक्टर ने किया है और उसे कौनसी दवाएं दी गई हैं।
यह भी सवाल किया जाएगा कि फलां दवा के स्थान पर फलां दवा क्यों नहीं दी गई जिससे रोगी की जान बच सकती थी। इन सबसे बचने के लिए अस्पताल ऐसी मौतों का ब्योरा आसानी से अपलोड कर दे रहे हैं जिनमें अधिक जवाब नहीं देना पड़ेगा।
इसके पहले शासन की ओर से पिछले साल जो डेथ ऑडिट टीम गठित हुई थी, उसे बहुत पापड़ बेलने पड़े थे। खासतौर पर निजी अस्पतालों को तीन-चार बार नोटिस जारी की गई और इन संस्थानों ने ब्योरा देने में डेढ़ महीने का समय लगा दिया था।
विज्ञापन
इसके बाद ब्योरा दिया था। डेथ कमेटी के अध्यक्ष रहे डॉ. जेएस कुशवाहा ने बताया कि एक-एक करके सभी ने जवाब दे दिया था लेकिन इस बार मौतें कई गुना अधिक हैं जिससे यह खेल रच दिया गया है। मौतों से उनके दिन की पहचान छीन ली जा रही है।
विज्ञापन
यह भी सवाल किया जाएगा कि फलां दवा के स्थान पर फलां दवा क्यों नहीं दी गई जिससे रोगी की जान बच सकती थी। इन सबसे बचने के लिए अस्पताल ऐसी मौतों का ब्योरा आसानी से अपलोड कर दे रहे हैं जिनमें अधिक जवाब नहीं देना पड़ेगा।
विज्ञापन
इसके पहले शासन की ओर से पिछले साल जो डेथ ऑडिट टीम गठित हुई थी, उसे बहुत पापड़ बेलने पड़े थे। खासतौर पर निजी अस्पतालों को तीन-चार बार नोटिस जारी की गई और इन संस्थानों ने ब्योरा देने में डेढ़ महीने का समय लगा दिया था।
विज्ञापन
इसके बाद ब्योरा दिया था। डेथ कमेटी के अध्यक्ष रहे डॉ. जेएस कुशवाहा ने बताया कि एक-एक करके सभी ने जवाब दे दिया था लेकिन इस बार मौतें कई गुना अधिक हैं जिससे यह खेल रच दिया गया है। मौतों से उनके दिन की पहचान छीन ली जा रही है।
इससे अब उतनी ही डेथ का ऑडिट हो सकेगा जितनी उस दिन के आंकड़ों में दर्ज है। पिछली बार हैलट में हुई कई मौतों के संबंध में विशेषज्ञों की टीम ने जांचों पर सवाल उठाया था। इस पर हैलट में विशिष्ट जांचें शुरू की गईं जिनसे यह पता चल जाता है कि रोगी की हालत गंभीर होने वाली है।
एसीएमओ डॉ. एके सिंह ने बताया कि कोरोना रोगी की मौत पर फार्मेट में पूरी जानकारी देनी पड़ती है और डाटा फीडिंग होती है। इसी से अस्पतालों के स्टाफ को डाटा भरने के संबंध में प्रशिक्षण भी दिया गया है।
इस बार ऑडिट में अधिक होगी पूछताछ
पिछली बार जो मौतों का ऑडिट हुआ है, उसमें रोगी की मौत का प्रमुख कारण कोमॉर्बिडिटी और अस्पताल देर से आना बताया गया था। इसमें बताया कि कोमॉर्बिड होने की वजह से दूसरे अंगों में जटिलताएं पैदा हो गईं और फेल हो गए। इसके साथ ही निमोनिया ने सांस तंत्र फेल कर दिया।
एक बिंदु रोगियों की अधिक उम्र भी थी। ज्यादातर मरने वाले रोगी 60 साल से अधिक थे। लेकिन इस बार 35-40 साल के रोगियों की भी मौत हुई है। इसके अलावा बहुत से रोगी ऐसे थे जो सिर्फ कोरोना की गिरफ्त में रहे और कोमॉर्बिडिटी नहीं थी।
एसीएमओ डॉ. एके सिंह ने बताया कि कोरोना रोगी की मौत पर फार्मेट में पूरी जानकारी देनी पड़ती है और डाटा फीडिंग होती है। इसी से अस्पतालों के स्टाफ को डाटा भरने के संबंध में प्रशिक्षण भी दिया गया है।
इस बार ऑडिट में अधिक होगी पूछताछ
पिछली बार जो मौतों का ऑडिट हुआ है, उसमें रोगी की मौत का प्रमुख कारण कोमॉर्बिडिटी और अस्पताल देर से आना बताया गया था। इसमें बताया कि कोमॉर्बिड होने की वजह से दूसरे अंगों में जटिलताएं पैदा हो गईं और फेल हो गए। इसके साथ ही निमोनिया ने सांस तंत्र फेल कर दिया।
एक बिंदु रोगियों की अधिक उम्र भी थी। ज्यादातर मरने वाले रोगी 60 साल से अधिक थे। लेकिन इस बार 35-40 साल के रोगियों की भी मौत हुई है। इसके अलावा बहुत से रोगी ऐसे थे जो सिर्फ कोरोना की गिरफ्त में रहे और कोमॉर्बिडिटी नहीं थी।