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Kannauj: बैंक से मदद, न बादल मेहरबान, फिर भी मक्का में फायदा, अच्छा मुनाफा कमा रहे किसान
Tue, 23 May 2023 05:40 PM IST
शिखा पांडेय
तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज
तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 23 May 2023 05:40 PM IST
सार
आलू उत्पादन के लिए मशहूर कन्नौज में बड़े पैमाने पर मक्का की भी फसल होती है। भीषण गर्मी में भी मक्का की रिकॉर्ड पैदावार से किसान अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
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मक्का की फसल की सिंचाई
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मौसम मेहरबान है और न ही बैंक या बीमा का साथ है। फिर भी कन्नौज के किसान इस भीषण गर्मी में मक्का की रिकॉर्ड पैदावार कर रहे हैं। जुलाई में बारिश के दौरान मक्का के सीजन से पहले ही यहां के किसान जायद सीजन में रिकॉर्ड पैदावार कर अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं। खास बात यह है कि इस सीजन में उगे मक्का के लिए सरकार की ओर से कोई समर्थन मूल्य भी नहीं मिलता है, फिर भी उन्हें अच्छा मुनाफा होता है।
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इत्र कारोबार के लिए मशहूर कन्नौज में अलग-अलग फसलों की खेती के लिए भी मशहूर है। आलू उत्पादन के लिए मशहूर कन्नौज में उसी तरह बड़े पैमाने पर मक्का की भी फसल होती है। फसल चक्र के मुताबिक मक्का की फसल खरीफ सीजन में धान की फसल के ही साथ होती है लेकिन यहां नजारा जुदा है। यहां खरीफ से ज्यादा मक्का की खेती उसके ठीक पहले जायद सीजन में होती है। भीषण गर्मी में जब न तो आसमान मेहरबान होता है और न ही बैंक से कोई मदद मिलती है। उसके बावजूद यहां के किसान मक्का की रिकॉर्ड फसल कर लेते हैं। किसानों को उम्मीद है कि इस बार भी उन्हें अच्छा मुनाफा हासिल होगा।
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आलू के खुदते ही बो दिया जाता है मक्का
कन्नौज में आलू के फसल की खुदाई होली के बाद खत्म हो जाती है। उसी के ठीक बाद किसान उन्हीं खेतों में मक्का की फसल के लिए बुआई कर देते हैं। तीन महीने में मक्का की जायद फसल तैयार हो जाती है। इस फसल के कटने के बाद फिर बरसात के मौसम में खरीफ के सीजन में फिर से मक्का की खेती शुरू हो जाती है।
आलू की ही तरह दो बार होती है मक्का की फसल
कन्नौज के किसान अमूमन हर फसल को दो-दो बार करते हैं। आलू की कच्ची और पक्की फसल के बाद मक्का की जायद और खरीफ सीजन की फसल की जाती है। एक ही फसल को दो-दो बार पैदावार करने से किसानों को अच्छी आमदनी भी होती है।
कन्नौज में आलू के फसल की खुदाई होली के बाद खत्म हो जाती है। उसी के ठीक बाद किसान उन्हीं खेतों में मक्का की फसल के लिए बुआई कर देते हैं। तीन महीने में मक्का की जायद फसल तैयार हो जाती है। इस फसल के कटने के बाद फिर बरसात के मौसम में खरीफ के सीजन में फिर से मक्का की खेती शुरू हो जाती है।
आलू की ही तरह दो बार होती है मक्का की फसल
कन्नौज के किसान अमूमन हर फसल को दो-दो बार करते हैं। आलू की कच्ची और पक्की फसल के बाद मक्का की जायद और खरीफ सीजन की फसल की जाती है। एक ही फसल को दो-दो बार पैदावार करने से किसानों को अच्छी आमदनी भी होती है।
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पानी के लिए बोरिंग पर ही निर्भर
अमूमन मार्च के आखिर में बोई जाने वाली मक्का की फसल तीन महीने बाद जून के पहले सप्ताह से कटने लगती है। इस दौरान भीषण गर्मी पड़ती है। बारिश की उम्मीद बहुत ही कम रहती है। ऐसे में सिंचाई पूरी तरह से बोरिंग पर ही निर्भर है। तीन महीने के फसल के दौरान खेत की सात से आठ बार सिंचाई करनी पड़ती है। इसमें किसानों को एक बार में सात से आठ घंटे की सिंचाई के लिए 130 से 140 रुपये बीघा कीमत अदा करनी होती है।
अमूमन मार्च के आखिर में बोई जाने वाली मक्का की फसल तीन महीने बाद जून के पहले सप्ताह से कटने लगती है। इस दौरान भीषण गर्मी पड़ती है। बारिश की उम्मीद बहुत ही कम रहती है। ऐसे में सिंचाई पूरी तरह से बोरिंग पर ही निर्भर है। तीन महीने के फसल के दौरान खेत की सात से आठ बार सिंचाई करनी पड़ती है। इसमें किसानों को एक बार में सात से आठ घंटे की सिंचाई के लिए 130 से 140 रुपये बीघा कीमत अदा करनी होती है।
मुर्गी का दाना और मवेशियों का चारा में होता है इस्तेमाल
इस समय तैयार होने वाली मक्का की फसल मुख्य रूप से मुर्गी के दाना और मवेशियों के चारा के रूप में इस्तेमाल की जाती है। फसल कटते ही गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्रा प्रदेश सहित दक्षिण राज्य से इसकी मांग बढ़ जाती है। दो हजार रुपये से ज्यादा क्विंटल की कीमत मिलने पर किसानों को काफी फायदा होता है।
बयान एक: इस समय जायद की फसल है। फसलचक्र के मुताबिक इस सीजन में मक्का की फसल शामिल नहीं होती है। इसलिए कोई भी सरकारी मदद नहीं मिलती है। बरसात के मौसम में होने वाली फसल को हर तरह की मदद मिलती है।- आवेष सिंह, जिला कृषि अधिकारी
बयान दो: बैंक से किसानों को फसल के लिए मिलने वाले ऋण में इस सीजन के मक्का की फसल शामिल नहीं है। जुलाई में बरसात के मौसम में होने वाली मक्का की फसल के लिए ऋण की सुविधा मिलती है।- अभिषेक सिन्हा, एलडीएम
बयान तीन: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत इस सीजन में बोई जाने वाली मक्का की फसल शामिल नहीं है। किसी तरह का नुकसान होने पर कोई मुआवजा नहीं मिलता है। फसल बीमा का लाभ खरीफ और रबी की फसलों पर ही लागू है।- रजत शुक्ला, जिला सह-संयोजक, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना
इस समय तैयार होने वाली मक्का की फसल मुख्य रूप से मुर्गी के दाना और मवेशियों के चारा के रूप में इस्तेमाल की जाती है। फसल कटते ही गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्रा प्रदेश सहित दक्षिण राज्य से इसकी मांग बढ़ जाती है। दो हजार रुपये से ज्यादा क्विंटल की कीमत मिलने पर किसानों को काफी फायदा होता है।
बयान एक: इस समय जायद की फसल है। फसलचक्र के मुताबिक इस सीजन में मक्का की फसल शामिल नहीं होती है। इसलिए कोई भी सरकारी मदद नहीं मिलती है। बरसात के मौसम में होने वाली फसल को हर तरह की मदद मिलती है।- आवेष सिंह, जिला कृषि अधिकारी
बयान दो: बैंक से किसानों को फसल के लिए मिलने वाले ऋण में इस सीजन के मक्का की फसल शामिल नहीं है। जुलाई में बरसात के मौसम में होने वाली मक्का की फसल के लिए ऋण की सुविधा मिलती है।- अभिषेक सिन्हा, एलडीएम
बयान तीन: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत इस सीजन में बोई जाने वाली मक्का की फसल शामिल नहीं है। किसी तरह का नुकसान होने पर कोई मुआवजा नहीं मिलता है। फसल बीमा का लाभ खरीफ और रबी की फसलों पर ही लागू है।- रजत शुक्ला, जिला सह-संयोजक, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना