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Kanpur: चंद्रमा पर बनेगा भारत का रिसर्च स्टेशन, बर्फ की प्रकृति खोज रहे IIT के वैज्ञानिक, जानें क्या हैं फायदे

Fri, 21 Jul 2023 03:31 PM IST
हिमांशु अवस्थी शैली भल्ला, अमर उजाला, कानपुर
शैली भल्ला, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Fri, 21 Jul 2023 03:31 PM IST
सार

Kanpur News: प्रोफेसर ढींगरा ने बताया कि पृथ्वी की कक्षा से चंद्रमा तक जाने या अन्य किसी भी ग्रह तक जाने के लिए काफी ईंधन खर्च करना पड़ता है। चंद्रमा पर रिसर्च स्टेशन बनने से अन्य ग्रहों पर जाना आसान हो सकेगा। इससे दूसरे ग्रहों की दूरी पता चल सकेगी।

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Indias research station will be built on the moon, scientists of IIT Kanpur exploring the nature of ice
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भविष्य में चंद्रमा पर भारत का रिसर्च स्टेशन बन सके। इसके लिए आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक चंद्रमा पर बर्फ की प्रकृति की खोज में जुटे हैं। अगर चंद्रमा पर जमी बर्फ से पीने योग्य पानी मिल जाता है, तो रिसर्च स्टेशन बनाने का रास्ता साफ हो सकेगा।

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ये बातें चंद्रयान मिशन-1 से जुड़े आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंस विभाग के वैज्ञानिक प्रो. दीपक ढींगरा ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताईं। प्रो. दीपक चंद्रमा की सतह से संबंधित कई शोध कर रहे हैं। वह चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग के बाद इसरो द्वारा भेजे गए डाटा का भी विश्लेषण करेंगे।
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प्रो. ढींगरा ने बताया कि मौजूदा समय में वह और उनकी टीम चंद्रमा के ध्रुवों पर बर्फ की खोज कर रही है। उन्होंने कहा कि धरती में बर्फ की चट्टानें हैं तो चंद्रमा में क्यों नहीं, बस अभी इस सवाल का जवाब तलाशा जा रहा है। अगर बर्फ से पानी मिलता है, तो यह हाइड्रोजन फ्यूल के काम आ सकेगा।

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क्यों बनेगा रिसर्च स्टेशन
प्रोफेसर ढींगरा ने बताया कि पृथ्वी की कक्षा से चंद्रमा तक जाने या अन्य किसी भी ग्रह तक जाने के लिए काफी ईंधन खर्च करना पड़ता है। चंद्रमा पर रिसर्च स्टेशन बनने से अन्य ग्रहों पर जाना आसान हो सकेगा। इससे दूसरे ग्रहों की दूरी पता चल सकेगी।

इसलिए की जा रही है पीने योग्य पानी की तलाश
प्रो. ढींगरा ने कहा कि पृथ्वी के आसपास सेटेलाइट रेडियो फ्रीक्वेंसी की भीड़ है। चंद्रमा के आसपास ना सेटेलाइट है ना रेडियो फ्रिक्वेंसी। चंद्रमा पर टेलिस्कोप से देखेंगे, तो एक नया ब्रह्मांड देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि चंद्रमा पर पीने योग्य पानी की तलाश की जा रही है।

इसलिए चंद्रयान को लगेंगे 40 दिन
नील आर्मस्ट्रांग चार दिन के भीतर ही चांद पर पहुंच गए थे, लेकिन चंद्रयान 40 दिन में चांद तक पहुंचेगा के सवाल पर प्रो. ढींगरा ने कहा कि यह सब ईंधन अर्थव्यवस्था का मामला है। छोटी यात्राओं के लिए बहुत अधिक ईंधन की आवश्यकता होती है। चंद्रयान को चंद्रमा की ओर धकेलने के लिए गुरुत्वाकर्षण सहायता तंत्र की मदद ली जा रही है। इसलिए ज्यादा समय लग रहा है।

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