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Kanpur News: शादी के बाद छोड़ दी थी उम्मीद, लेकिन हार नहीं मानी, बनीं एडिशनल डीसीपी

Tue, 06 May 2025 01:16 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 06 May 2025 01:16 AM IST
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I had given up hope after marriage, but I did not give up and became Additional DCP
अमिता सिंह - फोटो : स्रोत : स्वयं
कानपुर। मैंने कभी अच्छे अंकों के लिए पढ़ाई नहीं की, लेकिन जितना पढ़ा मेहनत से पढ़ा। कम अंक मिलने पर निराश होने की जरूरत नहीं है। क्याेंकि, सफल होने में प्रतिशत मायने नहीं रखती है। मेहनत ही सफलता दिलाती है। शादी के बाद मैंने भी पीपीएस बनने की उम्मीदें छोड़ दी थीं और शादी से पहले मिली असफलता मन को बेचैन कर रही थी, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। बच्चा, परिवार और पढ़ाई की जिम्मेदारी के बीच पीपीएस पास किया। यह कहना है कानपुर की एडिशनल डिप्टी कमिश्नर हैं अमिता सिंह।
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उन्होंने बताया कि वर्ष 1998 में स्नातक होने के बाद पीपीएस की तैयारी करने लगी थी। पहले और दूसरे प्रयास में मेंस तक नहीं पहुंच पाईं। इससे मन में निराशा हुई। इस दाैरान गलतियों से सबक लेते हुए दोगुने उत्साह के साथ मेहनत शुरू की। वर्ष 2003, 2004 और 2005 में इंटरव्यू तक पहुंचीं, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस बीच परिजनों ने 2007 में शादी कर दी और पीपीएस बनने का सपना अधूरा लगने लगा था। हालांकि शादी के बाद अंतिम प्रयास सोचकर परीक्षा के लिए 2007 मेंं आवेदन कर दिया। साथ ही पूरी शिद्दत के साथ फिर तैयारी शुरू की। इस बार मेरा चयन हो गया।
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उन्होंने बताया कि शादी के बाद प्रीलिम्स का रिजल्ट आया तक बेटा हो गया था। जब बेटा आठ महीने का था, तब मेंस और जब वह सवा साल का था तब इंटरव्यू दिया था। काफी संघर्षों से जूझते हुए और बच्चे, पढ़ाई और घर की जिम्मेदारी को निभाया। सन 2011 में ट्रेनिंग के लिए पुलिस कॉलेज गए, तब ढाई साल के बेटे को लेकर गए। बच्चे की वजह से रात में जागना पड़ता था और सुबह ट्रेनिंग करनी पड़ती थी। बताया कि पहली पोस्टिंग लखनऊ में हुई। यहां ससुराल की वजह से राहत मिली। बच्चे को परिवार के पास छोड़कर नौकरी करती थी, जिससे राहत मिलती थी।
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अमिता ने बताया कि आज भी यही स्थिति है। सारे कार्य करते हुए ड्यूटी भी करती हूं और पढ़ाई भी कर रही हूं। नौकरी में आने के बाद 2015 में एलएलबी पूरा किया और 2021 में एमए किया। उन्होंने कहा कि रात-रात भर जागकर बच्चे को देखना और सुबह घर के सारे काम करने के बाद तीन घंटे मिलते थे, जिसमें उन्होंने पढ़ाई की।
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