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इस भाषा ने बजाया पूरे विश्व में डंका
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sun, 25 Dec 2016 10:46 PM IST
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विदेश में चमक रही हिंदी
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एक ऐसी भाषा जिसका डंका आज पूरे विश्व में बज रहा है। फॉरेनर्स जिस भाषा को सीखने के लिए सात समंदर पार जाने से भी हिचक रहे वो भाषा और कोई नहीं हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी है। हर भारतीय को ये जानकर गर्व होगा कि हिंदी के महत्व को हमसे ज्यादा ये लोग समझ रहे हैं।
राष्ट्रीय एकता के लिए समर्पित देश की प्रमुख संस्था मानस संगम की ओर से कानपुर शिवाला प्रांगण में रविवार को आयोजित 48वें वार्षिक समारोह में हिंदीनिष्ठ विदेशियों का सम्मान भी किया गया। वहीं डॉ. नीलांबर कौशिक (प्रकाशन), संदीप मिश्रा (कूड़ा बीनने वाले बच्चों और महिलाओं को स्वावलंबी बनाने), अंकुर दुबे (गायन), प्रेम स्वरूप माहेश्वरी (पूर्वजों की परंपरा को बरकरार रखने), विकास चतुर्वेदी (धर्मशाला निर्माण) अमित सिंह (गायन) और डॉ. अरविंद अरोड़ा (लेखन) को उत्कृष्ट काम करने के लिए कानपुर गौरव सम्मान-2016 दिया गया। मानस संगम की वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका का लोकार्पण इंडिया टुडे के संपादक डा. अंशुमान तिवारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, सांसद देवेंद्र सिंह भोले, मानस संगम संगम के संयोजक बद्री नारायण तिवारी द्वारा किया गया। न्यूयार्क (अमेरिका) में प्रवक्ता डॉ. बिंदु अग्रवाल ने कविता के माध्यम से अमेरिका और भारत की संस्क़ति का परिचय दिया।
अरमेनिया में खोलेंगी हिंदी स्कूल
मानस संगम के मंच पर अरमेनिया की सोना पेत्रोस्यान को सम्मानित किया गया। आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी भाषा सीख रहीं सोना ने बताया कि आज पूरे विश्व में भारतीय परंपराओं और सिनेमा की धूम है। पहली बार अरमेनिया में उन्होंने हिंदी फिल्म देखी। इसके बाद भारत के बारे में और अधिक जानने की उत्सुकता ने उन्हें हिंदी भाषा सीखने के लिए प्रेरित किया। सोना ने बताया कि अरमेनिया और हिंदी भाषा के कई शब्द समान है। एक को हम मेक, गाजर को गजार, हां को यां, हजार को सजार कहते हैं। मैं वापस लौटकर लोगों को हिंदी सिखाऊंगी।
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मिस्र में भी खूब बोली जाती हिंदी
मिस्र के काहिरा की निवासी माई ने बताया कि मिस्र में भारतीयों की खासी संख्या है। देश के अधिकांश हिस्से में हिंदी का खूब इस्तेमाल होता है। वहां भारतीय सिनेमा, टीवी सीरियल, मेंहदी, बिंदी, डोसा, समोसा आदि व्यंजनों की भरमार है। हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता और जरूरत के कारण मैंने इसे सीखने का निश्चय किया। मैं वापस लौटकर हिंदी सिखोन के लिए अपना स्कूल खोलूंगी।
ये हैं हिंदीनिष्ठ विदेशी
कुमारी सोना (आरमेनिया), गुफरानुल्लाह (काबुल), इसरू उपान्डा (श्रीलंका), सलीम अडौम(डु चाड), वैजुयल गुलियन (आजरबाइजन), अहमद जकी (काबुल), निशानी मधुवन्थी (श्रीलंका), याया इसा (डु चाड), गिन्नोखे सुनंदा थेरो (श्रीलंका), क्षिमथो चतुरंगा (श्रीलंका), कुमारी मैशम अली अब्राहम (इजिप्टियन अरब), कुमारी अली नजमा अब्देलमोनेम महमूद अहमद (अरब कंट्री), कुमारी मधुशिका (श्रीलंका), कुमारी निशादी (श्रीलंका), रोशनी मलकी (श्रीलंका), हरसिनी संदामली (श्रीलंका)
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राष्ट्रीय एकता के लिए समर्पित देश की प्रमुख संस्था मानस संगम की ओर से कानपुर शिवाला प्रांगण में रविवार को आयोजित 48वें वार्षिक समारोह में हिंदीनिष्ठ विदेशियों का सम्मान भी किया गया। वहीं डॉ. नीलांबर कौशिक (प्रकाशन), संदीप मिश्रा (कूड़ा बीनने वाले बच्चों और महिलाओं को स्वावलंबी बनाने), अंकुर दुबे (गायन), प्रेम स्वरूप माहेश्वरी (पूर्वजों की परंपरा को बरकरार रखने), विकास चतुर्वेदी (धर्मशाला निर्माण) अमित सिंह (गायन) और डॉ. अरविंद अरोड़ा (लेखन) को उत्कृष्ट काम करने के लिए कानपुर गौरव सम्मान-2016 दिया गया। मानस संगम की वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका का लोकार्पण इंडिया टुडे के संपादक डा. अंशुमान तिवारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, सांसद देवेंद्र सिंह भोले, मानस संगम संगम के संयोजक बद्री नारायण तिवारी द्वारा किया गया। न्यूयार्क (अमेरिका) में प्रवक्ता डॉ. बिंदु अग्रवाल ने कविता के माध्यम से अमेरिका और भारत की संस्क़ति का परिचय दिया।
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अरमेनिया में खोलेंगी हिंदी स्कूल
मानस संगम के मंच पर अरमेनिया की सोना पेत्रोस्यान को सम्मानित किया गया। आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी भाषा सीख रहीं सोना ने बताया कि आज पूरे विश्व में भारतीय परंपराओं और सिनेमा की धूम है। पहली बार अरमेनिया में उन्होंने हिंदी फिल्म देखी। इसके बाद भारत के बारे में और अधिक जानने की उत्सुकता ने उन्हें हिंदी भाषा सीखने के लिए प्रेरित किया। सोना ने बताया कि अरमेनिया और हिंदी भाषा के कई शब्द समान है। एक को हम मेक, गाजर को गजार, हां को यां, हजार को सजार कहते हैं। मैं वापस लौटकर लोगों को हिंदी सिखाऊंगी।
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मिस्र में भी खूब बोली जाती हिंदी
मिस्र के काहिरा की निवासी माई ने बताया कि मिस्र में भारतीयों की खासी संख्या है। देश के अधिकांश हिस्से में हिंदी का खूब इस्तेमाल होता है। वहां भारतीय सिनेमा, टीवी सीरियल, मेंहदी, बिंदी, डोसा, समोसा आदि व्यंजनों की भरमार है। हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता और जरूरत के कारण मैंने इसे सीखने का निश्चय किया। मैं वापस लौटकर हिंदी सिखोन के लिए अपना स्कूल खोलूंगी।
ये हैं हिंदीनिष्ठ विदेशी
कुमारी सोना (आरमेनिया), गुफरानुल्लाह (काबुल), इसरू उपान्डा (श्रीलंका), सलीम अडौम(डु चाड), वैजुयल गुलियन (आजरबाइजन), अहमद जकी (काबुल), निशानी मधुवन्थी (श्रीलंका), याया इसा (डु चाड), गिन्नोखे सुनंदा थेरो (श्रीलंका), क्षिमथो चतुरंगा (श्रीलंका), कुमारी मैशम अली अब्राहम (इजिप्टियन अरब), कुमारी अली नजमा अब्देलमोनेम महमूद अहमद (अरब कंट्री), कुमारी मधुशिका (श्रीलंका), कुमारी निशादी (श्रीलंका), रोशनी मलकी (श्रीलंका), हरसिनी संदामली (श्रीलंका)