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प्रदूषण और ठंड से नसें पड़ी नीली, हाथ-पैर में हो रहा गैंगरीन, बरतें ये एहतियात
Tue, 08 Jan 2019 03:08 PM IST
शिखा पांडेय
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Tue, 08 Jan 2019 03:08 PM IST
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प्रदूषण और ठंड के उतार-चढ़ाव से गैंगरीन के मरीज बढ़ रहे हैं। कानपुर में लाला लाजपत राय अस्पताल (हैलट) की ओपीडी में आए कृष्णानगर के रोहित कुमार (37) के दोनों हाथों की मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा उंगली गाढ़ी नीली पड़ गई।
इसी तरह उनके पैरों की तीन उंगलियां काली पड़ गईं। इनमें गैंगरीन हो गया है। रोगी ने सीनियर सर्जन डॉ. जीडी यादव की ओपीडी में अपनी दिक्कत बताई। इसी तरह और भी रोगी गैंगरीन की चपेट में आए। पिछले साल की तुलना में इस बार जनवरी के पहले सप्ताह में गैंगरीन के चार गुना अधिक रोगी आए हैं।
हैलट के सर्जरी विभाग की ओपीडी में बीते साल जनवरी के पहले सप्ताह में गैंगरीन के 16 रोगी आए थे। इस साल यहां जांच कराने वालों की संख्या 65 हो गई है। साथ ही निजी अस्पतालों में भी ऐसे रोगी आ रहे हैं। डॉ. जीडी यादव का कहना है कि लोग नसों की बीमारी की गिरफ्त में पहले से होते है, लेकिन सर्दी में नसों के सिकुड़ने से खून जम जाता और नसें नीली-काली पड़ जाती हैं। अगर एक बार उंगलियां नीली-काली हुईं तो उन्हें फिर नहीं सुधारा जा सकता। इससे बचाव ही बेहतर तरीका होता है।
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इसी तरह उनके पैरों की तीन उंगलियां काली पड़ गईं। इनमें गैंगरीन हो गया है। रोगी ने सीनियर सर्जन डॉ. जीडी यादव की ओपीडी में अपनी दिक्कत बताई। इसी तरह और भी रोगी गैंगरीन की चपेट में आए। पिछले साल की तुलना में इस बार जनवरी के पहले सप्ताह में गैंगरीन के चार गुना अधिक रोगी आए हैं।
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हैलट के सर्जरी विभाग की ओपीडी में बीते साल जनवरी के पहले सप्ताह में गैंगरीन के 16 रोगी आए थे। इस साल यहां जांच कराने वालों की संख्या 65 हो गई है। साथ ही निजी अस्पतालों में भी ऐसे रोगी आ रहे हैं। डॉ. जीडी यादव का कहना है कि लोग नसों की बीमारी की गिरफ्त में पहले से होते है, लेकिन सर्दी में नसों के सिकुड़ने से खून जम जाता और नसें नीली-काली पड़ जाती हैं। अगर एक बार उंगलियां नीली-काली हुईं तो उन्हें फिर नहीं सुधारा जा सकता। इससे बचाव ही बेहतर तरीका होता है।
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डायबिटीज, नसों के रोगियों को खतरा अधिक
गैंगरीन होने पर रोगी के अंग में सड़न होने लगती है। इससे प्रभावित अंग को काटना पड़ता है। नसों के रोगियों के अलावा डायबिटीज के मरीजों को भी यह दिक्कत हो जाती है। डायबिटीज अनियंत्रित रहने पर इसका बुरा असर नसों पर पड़ता है। खून जमने से शुरुआत में नाखून नीला पड़ता है। धीरे-धीरे इसका असर उंगलियों के नीचे तक आ जाता है। खून का थक्का जमने पर हार्ट और ब्रेन अटैक का खतरा भी रहता है।
यह एहतियात बरतें
- ठंडे पानी में हाथ-पैर न डालें, इसे गुनगुना कर लें।
- ठंड में शाम को नसों के रोगी मोजे और दस्ताने न उतारें।
- उंगलियों के नाखून अगर हल्के नीले दिखें तो आग पर सेंक लें।
- हथेलियों को मलते रहें जिससे खून का बहाव बना रहे।
- नाखून में नीलापन दिखने पर फौरन डॉक्टर के पास जाएं।
- डायबिटीज के रोगी ब्लड शुगर नियंत्रित रखें।
- खून का बहाव दुरुस्त रखने के लिए व्यायाम करें।
गैंगरीन होने पर रोगी के अंग में सड़न होने लगती है। इससे प्रभावित अंग को काटना पड़ता है। नसों के रोगियों के अलावा डायबिटीज के मरीजों को भी यह दिक्कत हो जाती है। डायबिटीज अनियंत्रित रहने पर इसका बुरा असर नसों पर पड़ता है। खून जमने से शुरुआत में नाखून नीला पड़ता है। धीरे-धीरे इसका असर उंगलियों के नीचे तक आ जाता है। खून का थक्का जमने पर हार्ट और ब्रेन अटैक का खतरा भी रहता है।
यह एहतियात बरतें
- ठंडे पानी में हाथ-पैर न डालें, इसे गुनगुना कर लें।
- ठंड में शाम को नसों के रोगी मोजे और दस्ताने न उतारें।
- उंगलियों के नाखून अगर हल्के नीले दिखें तो आग पर सेंक लें।
- हथेलियों को मलते रहें जिससे खून का बहाव बना रहे।
- नाखून में नीलापन दिखने पर फौरन डॉक्टर के पास जाएं।
- डायबिटीज के रोगी ब्लड शुगर नियंत्रित रखें।
- खून का बहाव दुरुस्त रखने के लिए व्यायाम करें।