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जेब नहीं है गरम, चुनावी माहौल हो रहा ठंडा
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 24 Jan 2017 09:51 PM IST
सार
- नोटबंदी के बाद खुलकर खर्च नहीं कर पा रहीं पार्टियां
- सभा में ‘फोकट में जुटने वालों’ की संख्या में आई कमी
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विस्तार
नोटबंदी का असर इस बार विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों पर भी पड़ा है। पार्टियों ने कैश की उपलब्धता को देखते हुए चुनावी कार्यालय के बजट में कटौती की है। बार-बार चाय-पकौड़ी, सब्जी-पूड़ी, बीड़ी, सिगरेट, पान मसाला पर अधिक खर्च न करने की हिदायत दी गई है। व्यवस्था देख रहे कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि उतना ही खर्च करें जितना जरूरी है। इसलिए प्रचार ठंडा है। कार्यालयों में मजमा लगाए लोगों की संख्या कम हुई है। अपने नेता के पीछे ‘फोकट में जुटने वाले’ लोग घरों में दुबके हैं।
राजनीतिक पार्टियों के सूत्र बताते हैं कि बेरोजगारों के लिए चुनाव किसी सहालग से कम नहीं होते थे। पूरा महीना उनका व्यस्त जाता और जेब के लिए चार पैसे भी जुट जाते थे। पिछले चुनाव में कार्यालयों, नुक्कड़ सभाओं, जनसंपर्क अभियान आदि में अनायास ही लोग जुट जाते थे। इसके बदले में उन्हें बढ़िया नाश्ता-पानी, दिन भर का खर्च और कभी-कभी तो अच्छा गिफ्ट मिल जाता था। इस बार ऐसा नहीं है। चुनाव सिर पर हैं और ‘फोकट में जुटने वाले’ गायब हैं। कारण एक ही है। करेंसी की उपलब्धता सीमित है और ऑनलाइन खरीदारी पर सब कुछ ऑन रिकार्ड है। ऐसे में नेता अपने समर्थकों पर दिल खोलकर खर्च नहीं कर पा रहे हैं। कुछ न मिलने की आशंका में ऐसे लोगों ने भी चुनाव कार्यालयों से दूरी बना ली है।
मोबाइल पाकर खुश हुए थे कार्यकर्ता
पिछले विधानसभा चुनाव में शहर के एक प्रत्याशी ने वोटिंग से तीन महीना पहले ही अपने कार्यकर्ताओं को कैटेगरी में बांटकर सस्ता और महंगा मोबाइल गिफ्ट किया था। मोबाइल पाने के बाद कार्यकर्ता दिन रात नेता जी की टोलियों में जुटे रहते। इस बार उनकी तरफ से कोई गिफ्ट कार्यकताओं के लिए नहीं आया है। चर्चा है कि जो कर्मठ कार्यकर्ता की श्रेणी में थे उन्होंने भी दूरी बना ली है।
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राजनीतिक पार्टियों के सूत्र बताते हैं कि बेरोजगारों के लिए चुनाव किसी सहालग से कम नहीं होते थे। पूरा महीना उनका व्यस्त जाता और जेब के लिए चार पैसे भी जुट जाते थे। पिछले चुनाव में कार्यालयों, नुक्कड़ सभाओं, जनसंपर्क अभियान आदि में अनायास ही लोग जुट जाते थे। इसके बदले में उन्हें बढ़िया नाश्ता-पानी, दिन भर का खर्च और कभी-कभी तो अच्छा गिफ्ट मिल जाता था। इस बार ऐसा नहीं है। चुनाव सिर पर हैं और ‘फोकट में जुटने वाले’ गायब हैं। कारण एक ही है। करेंसी की उपलब्धता सीमित है और ऑनलाइन खरीदारी पर सब कुछ ऑन रिकार्ड है। ऐसे में नेता अपने समर्थकों पर दिल खोलकर खर्च नहीं कर पा रहे हैं। कुछ न मिलने की आशंका में ऐसे लोगों ने भी चुनाव कार्यालयों से दूरी बना ली है।
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मोबाइल पाकर खुश हुए थे कार्यकर्ता
पिछले विधानसभा चुनाव में शहर के एक प्रत्याशी ने वोटिंग से तीन महीना पहले ही अपने कार्यकर्ताओं को कैटेगरी में बांटकर सस्ता और महंगा मोबाइल गिफ्ट किया था। मोबाइल पाने के बाद कार्यकर्ता दिन रात नेता जी की टोलियों में जुटे रहते। इस बार उनकी तरफ से कोई गिफ्ट कार्यकताओं के लिए नहीं आया है। चर्चा है कि जो कर्मठ कार्यकर्ता की श्रेणी में थे उन्होंने भी दूरी बना ली है।
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