फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   do not vote for my party candidate

लगा रहे गुहार, हमें वोट मत दो सरकार

Thu, 16 Feb 2017 09:59 AM IST
आदर्श त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
आदर्श त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर Updated Thu, 16 Feb 2017 09:59 AM IST
सार

- आर्यनगर सीट पर कांग्रेसी पंजे और कैंट में सपाई साइकिल का बटन न दबाने की कर रहे अपील
- कानपुर के विधानसभा चुनाव के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है
- इससे पहले 1971 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेसियों ने निर्दलीय प्रत्याशी के लिए मांगे थे वोट
- 1984 में लोकसभा चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस को दिया था अंदरखाने समर्थन
 

विज्ञापन
do not vote for my party candidate
डेमो

विस्तार

कानपुर शहर के विधानसभा चुनाव के इतिहास में पहली बार कांग्रेस और सपा के नेता अपनी पार्टी के प्रत्याशियों को वोट न देने की अपील कर रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान आर्यनगर विधानसभा सीट पर कांग्रेसी लोगों से पंजे की जगह साइकिल वाला बटन दबाने को कह रहे हैं। यही हाल कैंट सीट का है। यहां पर सपाई साइकिल की बजाय पंजे वाला बटन दबाने की सलाह दे रहे हैं।
विज्ञापन


हालांकि लोकसभा चुनावों में इससे पहले दो बार यह स्थिति आ चुकी है। प्रदेश में कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन और फिर प्रत्याशियों की घोषणा में देरी के कारण शहर की कई सीटों पर दोनों दलों के प्रत्याशियों ने नामांकन करा लिए। आर्यनगर सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी मैदान से बाहर हो चुके हैं, लेकिन हटने में हुई देरी के कारण पार्टी का सिंबल ईवीएम में दर्ज रहेगा। यही स्थिति कैंट सीट पर भी है। गठबंधन में यह सीट कांग्रेस के पास है, लेकिन सिंबल को देखकर पड़ने वाले वोटों का नुकसान रोकने के लिए सपाई साइकिल को वोट न देने की अपील कर रहे हैं।
विज्ञापन


चुनाव प्रचार के अंतिम चरण तक पहुंचते-पहुंचते कई और सीटों पर यही स्थिति हो सकती है। कांग्रेस महानगर अध्यक्ष हरप्रकाश अग्निहोत्री और सपा नगर अध्यक्ष फजल महमूद ने कहा कि वे गठबंधन प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे हैं। गठबंधन प्रत्याशियों के नाम और सिंबल की जानकारी लोगों को है। 1971 में आई थी यही स्थिति 1971 में कानपुर लोकसभा के चुनाव में एसएम बनर्जी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शंकरदत्त मिश्र ने बताया कि बनर्जी 1957, 62 और 67 से लगातार सांसद चुने जा रहे थे। 1971 में जनसंघ के प्रत्याशी बाबूराम शुक्ला उन्हें तगड़ी चुनौती दे रहे थे। उन्हें रोकने के लिए कांग्रेस ने बनर्जी को समर्थन दिया और उनके चुनाव चिन्ह शेर के लिए वोट मांगे। चुनाव में बनर्जी की जीत हुई।
विज्ञापन
विज्ञापन


कांग्रेस को मिला था भाजपा का समर्थन 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नरेश चंद्र चतुर्वेदी, भाजपा के सोमनाथ शुक्ला और जनता पार्टी के सैयद शहाबुद्दीन मैदान में थे। शहाबुद्दीन के मुकाबले में सोमनाथ शुक्ला कमजोर पड़ रहे थे। शहर के पुराने राजनीति के जानकारों की मानें तो शहाबुद्दीन को जीतने से रोकने के लिए भाजपा ने कांग्रेस प्रत्याशी को अंदरखाने समर्थन दे दिया। कांग्रेस के नरेश चंद्र चतुर्वेदी भारी मतों से चुनाव जीते।


कई सीटों पर लड़ाने वाले हुए शिफ्ट गठबंधन के फेर में दावेदारी गंवाने और पार्टी के दबाव में नाम वापस लेने वाले प्रत्याशी या तो साइलेंट मोड पर हैं या फिर किसी और विधानसभा में चुनाव लड़ाने निकल गए हैं। किदवई नगर सीट पर अधिकतर प्रमुख सपाई देहात सीट पर सक्रिय हो गए हैं। गोविंदनगर सीट पर दिग्गज कांग्रेसी साइलेंट मोड पर हैं। महाराजपुर में अलग-अलग प्रचार जारी है। बिठूर में कांग्रेसी के भाजपाई हो जाने के बाद कई पदाधिकारी पुराने संबंधों के कारण असमंजस में हैं। घाटमपुर सीट कांग्रेस को जाने के बाद दिग्गज सपाई साइलेंट हैं।
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed