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Kanpur News: स्कोपस में शोध प्रकाशित नहीं होने से अधर में अटकी उपाधि
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कानपुर। शोध पत्रों का अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्कोपस और वेब ऑफ साइंस में प्रकाशित होना अनिवार्य होने के कारण छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय के कई शोधार्थियाें की उपाधि अधर में लटक गई है। तीन वर्ष से अधिक समय से शोध कार्य पूरा कर चुके शोधार्थी और महाविद्यालयों के शिक्षक इसका विरोध कर रहे हैं। इसे गंभीरता से लेते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन समाधान की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। जल्द ही समस्या के निवारण के लिए समिति का गठन किया जाएगा।
सीएसजेएमयू में अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नई रिसर्च अवार्ड एवं इंसेंटिव नीति लागू की गई है। इसके तहत शोध के लिए लाखों रुपये के पुरस्कार देने का प्रावधान है। शोध की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए स्कोपस और वेब ऑफ साइंस जैसे प्रतिष्ठित जर्नलों में दो से तीन शोध पत्रों का प्रकाशन अनिवार्य किया गया है। इन्हीं के आधार पर अंक तय होंगे और अंकों के अनुसार पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।
शोधार्थियों का कहना है कि अब नए सिरे से स्कोपस में प्रकाशन के लिए आवेदन करना होगा। जहां विश्वभर के संस्थानों के शोध पत्रों के कारण कम से कम छह महीने या उससे अधिक की प्रतीक्षा अवधि रहती है। आवेदन के कई महीनों बाद ही यह स्पष्ट हो पाता है कि शोध पत्र कब प्रकाशित होगा। इससे कई महाविद्यालयों के शिक्षकों की पीएचडी उपाधि भी अटक गई है।
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कानपुर यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रो. बीडी पांडेय ने कहा कि इस नीति का सीधा असर शिक्षकों की प्रोन्नति और कॅरिअर से जुड़े मामलों पर पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि समाज विज्ञान और कला संकायों के शोध पत्रों को स्कोपस में अपेक्षाकृत कम महत्व मिलता है क्योंकि ये जर्नल मुख्य रूप से विज्ञान विषयों पर केंद्रित हैं। ऐसे में वैकल्पिक और न्यायसंगत मानक तय किए जाने की मांग विश्वविद्यालय प्रशासन से की गई है।
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सीएसजेएमयू में अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नई रिसर्च अवार्ड एवं इंसेंटिव नीति लागू की गई है। इसके तहत शोध के लिए लाखों रुपये के पुरस्कार देने का प्रावधान है। शोध की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए स्कोपस और वेब ऑफ साइंस जैसे प्रतिष्ठित जर्नलों में दो से तीन शोध पत्रों का प्रकाशन अनिवार्य किया गया है। इन्हीं के आधार पर अंक तय होंगे और अंकों के अनुसार पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।
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शोधार्थियों का कहना है कि अब नए सिरे से स्कोपस में प्रकाशन के लिए आवेदन करना होगा। जहां विश्वभर के संस्थानों के शोध पत्रों के कारण कम से कम छह महीने या उससे अधिक की प्रतीक्षा अवधि रहती है। आवेदन के कई महीनों बाद ही यह स्पष्ट हो पाता है कि शोध पत्र कब प्रकाशित होगा। इससे कई महाविद्यालयों के शिक्षकों की पीएचडी उपाधि भी अटक गई है।
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कानपुर यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रो. बीडी पांडेय ने कहा कि इस नीति का सीधा असर शिक्षकों की प्रोन्नति और कॅरिअर से जुड़े मामलों पर पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि समाज विज्ञान और कला संकायों के शोध पत्रों को स्कोपस में अपेक्षाकृत कम महत्व मिलता है क्योंकि ये जर्नल मुख्य रूप से विज्ञान विषयों पर केंद्रित हैं। ऐसे में वैकल्पिक और न्यायसंगत मानक तय किए जाने की मांग विश्वविद्यालय प्रशासन से की गई है।