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Navratri 2023: काली मठिया मंदिर में 41 दिनों तक आरती में शामिल होने से पूरी होती है मनोकामनाएं
Thu, 23 Mar 2023 11:51 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Thu, 23 Mar 2023 11:51 AM IST
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काली मठिया मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
कानपुर में शास्त्री नगर स्थित काली मठिया मंदिर में मां काली की मूर्ति एक सिद्ध मूर्ति मानी जाती है। इस मंदिर के बारे में बताया जाता है कि मां काली मठिया के दोनों पहर की होने वाली आरती में जो भक्त 41 दिन तक शामिल होता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। नवरात्रि में भक्त मां के मंदिर में चुनरी बांधकर मनोकामना मांगने पहुंचते हैं। साथ ही भारी भीड़ के बीच खड़े रह कर मां का दर्शन करते हैं।
फलदायनी हैं मां कालीका
माता दुर्गा के रूप नौ तरह के हैं। नवरात्रि में मां अपने रूप के हिसाब से भक्तों को फल देती हैं। मां काली मठिया का स्वरूप देखने में काफी अलग है। लेकिन, माता सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। भक्त भी मां काली मठिया का स्वरूप देखकर कभी भयभीत नहीं होते हैं।
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फलदायनी हैं मां कालीका
माता दुर्गा के रूप नौ तरह के हैं। नवरात्रि में मां अपने रूप के हिसाब से भक्तों को फल देती हैं। मां काली मठिया का स्वरूप देखने में काफी अलग है। लेकिन, माता सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। भक्त भी मां काली मठिया का स्वरूप देखकर कभी भयभीत नहीं होते हैं।
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रोचक है काली मठिया मंदिरा की कहानी
मंदिर के पुजारी उमेश चंद तिवारी के अनुसार मां काली मठिया की कहानी कुछ अलग ही है। कहा जाता है कि 200 साल पहले यहां एक पहाड़नुमा टीला था। टीले में एक ही जड़ में पीपल, नीम, बरगद और गूलर का पेड़ था। कई वर्षों तक लोगों ने देखा कि एक गाय आकर यहां पर अपना दूध छोड़ जाती थी। जिसको देखकर लोगों के मन में शंका होने लगी। उन्होंने शंका को दूर करने के लिए टीले की खुदाई शुरू कर दी। टीले की खुदाई के दौरान वहां मां काली की प्रतिमा मिली। मां काली का स्वरूप मूर्ति में पूर्ण रूप से काले पत्थर में था। तो लोगों ने उस जगह को काली मठिया नाम दे दिया। जिसके बाद 1971 में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और मां काली की बड़ी प्रतिमा लाकर वहां पर स्थापित की गई।
मंदिर के पुजारी उमेश चंद तिवारी के अनुसार मां काली मठिया की कहानी कुछ अलग ही है। कहा जाता है कि 200 साल पहले यहां एक पहाड़नुमा टीला था। टीले में एक ही जड़ में पीपल, नीम, बरगद और गूलर का पेड़ था। कई वर्षों तक लोगों ने देखा कि एक गाय आकर यहां पर अपना दूध छोड़ जाती थी। जिसको देखकर लोगों के मन में शंका होने लगी। उन्होंने शंका को दूर करने के लिए टीले की खुदाई शुरू कर दी। टीले की खुदाई के दौरान वहां मां काली की प्रतिमा मिली। मां काली का स्वरूप मूर्ति में पूर्ण रूप से काले पत्थर में था। तो लोगों ने उस जगह को काली मठिया नाम दे दिया। जिसके बाद 1971 में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और मां काली की बड़ी प्रतिमा लाकर वहां पर स्थापित की गई।