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UP election 2022: कानपुर में भितरघात से बचने के लिए भाजपा ने प्रत्याशियों की सीट की अदला-बदली
Sat, 22 Jan 2022 01:32 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sat, 22 Jan 2022 01:32 PM IST
सार
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद जारी की गई सूची में भितरघात से बचने के लिए भाजपा ने प्रत्याशियों की सीट की अदला-बदली की है। सलिल विश्नोई और सुरेश अवस्थी की सीटों में बदलाव सबसे ज्यादा चर्चा में है। बदलाव के पीछे क्या गणित है, इसे हर कोई जानना चाहता है।
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कानपुर से भाजपा के प्रत्याशी
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
भाजपा ने विधानसभा चुनाव के लिए जारी की तीसरी सूची में कई पुराने चेहरों को वरीयता दी है। ऐसे में कानपुर की सीसामऊ और आर्यनगर विधानसभा सीट पर प्रत्याशियों की अदला-बदली का भाजपा का दांव इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा में है। वर्ष 2017 में आर्यनगर से चुनाव लड़ने वाले सलिल विश्नोई को पार्टी इस बार सीसामऊ से आजमा रही है।
वहीं, सीसामऊ से चुनाव लड़े सुरेश अवस्थी को आर्यनगर में उतारा गया है। इस बदलाव के पीछे क्या गणित है, इसे हर कोई जानना चाहता है। सूत्रों की मानें तो यह बदलाव कर पार्टी ने दोनों प्रत्याशियों को भितरघात से बचाने की कोशिश की है, जिसके शिकार ये दोनों पिछले चुनाव में भी हुए थे।
पिछले चुनाव में शिकस्त के बाद सलिल विश्नोई ने भाजपा संगठन में अपनी पैठ जमाई और पहले प्रदेश महामंत्री फिर प्रदेश उपाध्यक्ष की भूमिका तक पहुंचे। इस बीच, उन्हें प्रदेश की सबसे प्रमुख और चर्चित प्रधानमंत्री मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी का प्रभारी बनाया गया। वह एमएलसी भी हैं।
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वहीं, सीसामऊ से चुनाव लड़े सुरेश अवस्थी को आर्यनगर में उतारा गया है। इस बदलाव के पीछे क्या गणित है, इसे हर कोई जानना चाहता है। सूत्रों की मानें तो यह बदलाव कर पार्टी ने दोनों प्रत्याशियों को भितरघात से बचाने की कोशिश की है, जिसके शिकार ये दोनों पिछले चुनाव में भी हुए थे।
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पिछले चुनाव में शिकस्त के बाद सलिल विश्नोई ने भाजपा संगठन में अपनी पैठ जमाई और पहले प्रदेश महामंत्री फिर प्रदेश उपाध्यक्ष की भूमिका तक पहुंचे। इस बीच, उन्हें प्रदेश की सबसे प्रमुख और चर्चित प्रधानमंत्री मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी का प्रभारी बनाया गया। वह एमएलसी भी हैं।
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सलिल के एमएलसी बनने के बाद आर्यनगर क्षेत्र से चुनाव लड़ने के इच्छुक कार्यकर्ताओं की खुशी का ठिकाना नहीं था। इसी वजह से उस सीट से इस बार टिकट मांगने वालों की अच्छीखासी संख्या थी।
बताया जा रहा है कि पिछली बार उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं की नाराजगी का शिकार होना पड़ा था, जिससे मोदी लहर के बावजूद उनकी सीट नहीं निकल पाई। यही हाल सीसामऊ में सुरेश अवस्थी का रहा। काफी भागदौड़ के बावजूद वह अपनी सीट नहीं निकाल पाए।
सीसामऊ में भी पार्टी ने जब 2017 की हार-जीत का आकलन किया तो पता चला कि कार्यकर्ताओं में आपसी तालमेल न होने से सीट चली गई। इसे देखते हुए इस बार सीसामऊ में भी कई दावेदार सामने आ गए। 2022 के चुनाव में 2017 जैसे हालात न बनने पाएं, इसे देखते हुए पार्टी ने दोनों की सीटों को अंतिम चरण में बदलने का फैसला लिया। बताया जाता है कि इसके लिए दोनों से पूर्व में सहमति भी ले ली गई थी।
...पर इनका क्या
सीसामऊ और आर्यनगर सीट से दो दर्जन से अधिक दावेदार थे। टिकट न मिलने से ये सभी तमतमाए घूम रहे हैं। ये खुलकर तो सामने नहीं आ रहे, लेकिन दबी जुबान यह कहने से भी नहीं चूक रहे कि क्षेत्र में मेहनत अपने लिए की थी। अब दूसरा चुनाव लड़ेगा तो लड़े। हमारा क्या लेनादेना।
बताया जा रहा है कि पिछली बार उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं की नाराजगी का शिकार होना पड़ा था, जिससे मोदी लहर के बावजूद उनकी सीट नहीं निकल पाई। यही हाल सीसामऊ में सुरेश अवस्थी का रहा। काफी भागदौड़ के बावजूद वह अपनी सीट नहीं निकाल पाए।
सीसामऊ में भी पार्टी ने जब 2017 की हार-जीत का आकलन किया तो पता चला कि कार्यकर्ताओं में आपसी तालमेल न होने से सीट चली गई। इसे देखते हुए इस बार सीसामऊ में भी कई दावेदार सामने आ गए। 2022 के चुनाव में 2017 जैसे हालात न बनने पाएं, इसे देखते हुए पार्टी ने दोनों की सीटों को अंतिम चरण में बदलने का फैसला लिया। बताया जाता है कि इसके लिए दोनों से पूर्व में सहमति भी ले ली गई थी।
...पर इनका क्या
सीसामऊ और आर्यनगर सीट से दो दर्जन से अधिक दावेदार थे। टिकट न मिलने से ये सभी तमतमाए घूम रहे हैं। ये खुलकर तो सामने नहीं आ रहे, लेकिन दबी जुबान यह कहने से भी नहीं चूक रहे कि क्षेत्र में मेहनत अपने लिए की थी। अब दूसरा चुनाव लड़ेगा तो लड़े। हमारा क्या लेनादेना।