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भारत माता की जय उद्घोष संग विदा हुआ शहीद
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
Updated Fri, 03 Jun 2016 01:31 AM IST
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श्यामनगर स्थित आवास पहुंचे शहीद कांस्टेबिल सत्यप्रकाश (इनसेट) के शव को कंधा देते परिजन व स्थानीय लोग।
- फोटो : amarujala
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कानपुर। महाराष्ट्र के वर्धा आयुध डिपो अग्निकांड में शहीद हुए कांस्टेबिल सत्यप्रकाश के पार्थिव शरीर को गुरुवार दोपहर श्यामनगर डी ब्लाॅक स्थित घर लाया गया तो परिजन, रिश्तेदार, मुहल्ले के लोग रोते-बिलखते, चिल्लाते वाहन की ओर दौड़ पड़े। उन्हें समझा बुझाकर ताबूत को घर के बाहर दरी पर रखा गया। उससे लिपटकर रोते लोगों की आंखों से धार बहने लगी। इसके बाद भारत माता की जय उद्घोष से उन्हें भैरव घाट ले जाया गया जहां अंतिम संस्कार किया गया।
दोपहर 3:40 बजे पुलगांव डीएससी यूनिट के जवान हरीबाबू एंबुलेंस से पार्थिव शरीर लेकर पहुंचे। यहां हजारों लोग इकट्ठा थे। एसीएम सतीश चंद्र भी पहुंचे। 3:49 बजे पार्थिव शरीर रखे ताबूत को बाहर लाया गया।
परिजन-नाते-रिश्तेदार ताबूत से लिपट कर रो पड़े। काफी देर बाद जब ताबूत उठाया जाने लगा तो हजारों लोग बिलख पड़े। पत्नी गीता सिंह, बेटी दीक्षा गश खा गईं। पार्थिव शरीर को यहां से भैरव घाट पहुंचाने के लिए असम 3 रेजीमेंट से सेना को आना था। 4:20 बजे रेजीमेंट के नायब सूबेदार लाल थाकुन्गा और नरेश्वर बड़ो 22 सदस्यीय दल के साथ पहुंचे। 4:33 बजे पार्थिव शरीर को भारत माता की जय के उद्घोष से लोगों ने आर्मी वाहन से रवाना किया। बेटा ऋषभ, उनका साला विश्व विजय सिंह, भतीजे नीरज सिंह रवाना हुए।
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फायर ब्रिगेड गाड़ी के आगे थे सत्यप्रकाश
सत्य प्रकाश मूल रूप से हरदोई के हरपाल के गांव ज्यूरी चंद्रमपुर के निवासी थे। उनके साले विश्व विजय सिंह ने बताया कि उनके एक रिश्तेदार भी वर्धा फैक्ट्री में पोस्टेड है। उन्होंने बताया कि जीजा (सत्य प्रकाश सिंह) आग की सूचना पर फायर ब्रिगेड गाड़ी के आगे बढ़े तभी धमाके की चपेट पर आ गए। वह सिक्योरिटी में एनसीओ थे। उनका काम जवानों की ड्यूटी और काम को जांचना था। मुहल्ले के प्रशांत निगम, सुनील थापा, शैलेंद्र द्विवेदी, शुभम वर्मा आदि ने कहा कि वह बहुत मिलनसार थे। लगता ही नहीं था कि सेना में नौकरी करते हैं। सत्यप्रकाश के गांव से आए पूर्व प्रधान राजेश्वर सिंह कुशवाहा ने कहा कि शहीद के गांव हरपालपुर (हरदोई) के गांव ज्यूरी चंद्रमपुर में ग्राम पंचायत से प्रतिमा लगवाने की मांग करेंगे।
‘पैसा नहीं, बेटे को सेना में नौकरी दे सरकार’
मौत तो सबकी होती है, सब चार कंधों पर जाते हैं। मेरे पति देश के लिए शहीद हुए हैं। उनकी विदाई पर कितने लोग आए, इस बात का फख्र है। हमें सरकार से पैसा नहीं बल्कि बेटे ऋषभ की सेना में नौकरी चाहिए। यह बातें शहीद सत्य प्रकाश की पत्नी ने पति की अंतिम विदाई के बाद नम आंखों से कहंीं।
सत्य प्रकाश बेटी पर छिड़कते थे जान
सत्य प्रकाश अपनी बेटी दीक्षा उर्फ गौरी पर जान छिड़कते थे। परिजनों ने बताया कि वे कहते थे कि बेटी की शादी ऐसे घर में करूंगा कि जहां काम के नाम पर एक चम्मच भी न उठाना पड़े। दीक्षा ने कहा कि पापा चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी कर अपने पैरों पर खड़ी हो। उनका सपना पूरा करूंगी। बेटे ऋषभ ने कहा कि पापा का हर सपना पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।
रघुनंदन के अलावा कोई नहीं पहुंचा
कैंट विधायक रघुनंदन भदौरिया के अलावा कोई जनप्रतिनिधि शहीद के घर नहीं पहुंचा। विधायक ने शहीद के परिजनों को ढांढस बधाया। कहा कि वह परिवार के साथ हैं।
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दोपहर 3:40 बजे पुलगांव डीएससी यूनिट के जवान हरीबाबू एंबुलेंस से पार्थिव शरीर लेकर पहुंचे। यहां हजारों लोग इकट्ठा थे। एसीएम सतीश चंद्र भी पहुंचे। 3:49 बजे पार्थिव शरीर रखे ताबूत को बाहर लाया गया।
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परिजन-नाते-रिश्तेदार ताबूत से लिपट कर रो पड़े। काफी देर बाद जब ताबूत उठाया जाने लगा तो हजारों लोग बिलख पड़े। पत्नी गीता सिंह, बेटी दीक्षा गश खा गईं। पार्थिव शरीर को यहां से भैरव घाट पहुंचाने के लिए असम 3 रेजीमेंट से सेना को आना था। 4:20 बजे रेजीमेंट के नायब सूबेदार लाल थाकुन्गा और नरेश्वर बड़ो 22 सदस्यीय दल के साथ पहुंचे। 4:33 बजे पार्थिव शरीर को भारत माता की जय के उद्घोष से लोगों ने आर्मी वाहन से रवाना किया। बेटा ऋषभ, उनका साला विश्व विजय सिंह, भतीजे नीरज सिंह रवाना हुए।
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फायर ब्रिगेड गाड़ी के आगे थे सत्यप्रकाश
सत्य प्रकाश मूल रूप से हरदोई के हरपाल के गांव ज्यूरी चंद्रमपुर के निवासी थे। उनके साले विश्व विजय सिंह ने बताया कि उनके एक रिश्तेदार भी वर्धा फैक्ट्री में पोस्टेड है। उन्होंने बताया कि जीजा (सत्य प्रकाश सिंह) आग की सूचना पर फायर ब्रिगेड गाड़ी के आगे बढ़े तभी धमाके की चपेट पर आ गए। वह सिक्योरिटी में एनसीओ थे। उनका काम जवानों की ड्यूटी और काम को जांचना था। मुहल्ले के प्रशांत निगम, सुनील थापा, शैलेंद्र द्विवेदी, शुभम वर्मा आदि ने कहा कि वह बहुत मिलनसार थे। लगता ही नहीं था कि सेना में नौकरी करते हैं। सत्यप्रकाश के गांव से आए पूर्व प्रधान राजेश्वर सिंह कुशवाहा ने कहा कि शहीद के गांव हरपालपुर (हरदोई) के गांव ज्यूरी चंद्रमपुर में ग्राम पंचायत से प्रतिमा लगवाने की मांग करेंगे।
‘पैसा नहीं, बेटे को सेना में नौकरी दे सरकार’
मौत तो सबकी होती है, सब चार कंधों पर जाते हैं। मेरे पति देश के लिए शहीद हुए हैं। उनकी विदाई पर कितने लोग आए, इस बात का फख्र है। हमें सरकार से पैसा नहीं बल्कि बेटे ऋषभ की सेना में नौकरी चाहिए। यह बातें शहीद सत्य प्रकाश की पत्नी ने पति की अंतिम विदाई के बाद नम आंखों से कहंीं।
सत्य प्रकाश बेटी पर छिड़कते थे जान
सत्य प्रकाश अपनी बेटी दीक्षा उर्फ गौरी पर जान छिड़कते थे। परिजनों ने बताया कि वे कहते थे कि बेटी की शादी ऐसे घर में करूंगा कि जहां काम के नाम पर एक चम्मच भी न उठाना पड़े। दीक्षा ने कहा कि पापा चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी कर अपने पैरों पर खड़ी हो। उनका सपना पूरा करूंगी। बेटे ऋषभ ने कहा कि पापा का हर सपना पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।
रघुनंदन के अलावा कोई नहीं पहुंचा
कैंट विधायक रघुनंदन भदौरिया के अलावा कोई जनप्रतिनिधि शहीद के घर नहीं पहुंचा। विधायक ने शहीद के परिजनों को ढांढस बधाया। कहा कि वह परिवार के साथ हैं।