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बेहमई कांड ने फूलन को बनाया बैंडिट क्वीन: ईंट के नीचे छत पर मिले थे तीन खत, लिखे थे 12 नाम

Thu, 15 Feb 2024 12:47 PM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Thu, 15 Feb 2024 12:47 PM IST
सार

Kanpur Dehat News: बहुचर्चित बेहमई गांव में 20 लोगों की सामूहिक हत्या के मामले में 43 साल बाद कोर्ट ने बुधवार की शाम फैसला सुनाया। 

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Behmai incident: Three letters were found under the brick on the roof
बेहमई कांड (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बेहमई गांव में नरसंहार होने के बाद अगले दिन 15 फरवरी को गांव की एक छत में ईट के नीचे तीन खत मिले थे। इसमें 12 नाम लिखे हुए थे। गांव के मरजाद ने खत में लिखे चार डकैतों की पहचान फूलनदेवी के साथियों के रूप में की और चारों पर नामजद मुकदमा दर्ज कराया था।

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बेहमई गांव में नरसंहार के बाद विपक्षी राजनैतिक दलों ने सत्ता पक्ष के लोगों को घेरना शुरू कर दिया था। इस दौरान पूरे देश में धरना प्रदर्शन हुए। इसी बीच घटना के दूसरे दिन गांव के मरजाद सिंह के घर पर तीन खत ईट के नीचे दबे हुए मिले थे। मरजाद ने खत देखें तो वह ठीक तरह से पढ़ नहीं पाए। उन्होंने गांव के कुछ अन्य लोगों को खत पढ़ाया और इसके बाद पुलिस को सौंप दिया। पुलिस की पूछताछ में खत के अंदर लिखे 12 नाम में से चार नाम को मरजाद जानता था। उसने चारों की पहचान फूलन देवी के साथ आए डकैतों के रूप में की। इसके बाद पुलिस ने मरजाद की तहरीर पर मुकदमा दर्ज किया। इसके बाद पुलिस ने सभी की तलाश शुरू की थी।

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बेहमई कांड का घटनाक्रम एक नजर में
- बेहमई कांड का घटनाक्रम एक नजर में14 फरवरी 1981 को नरसंहार
- 07 अप्रैल 1981 को पहली चार्जशीट
- 31 अक्तूबर को आठवीं चार्जशीट
- वर्ष 1994 में फूलनदेवी पेरोल पर रिहा
- 25 जुलाई 2001 को फूलन की हत्या
- वर्ष 2012 में सुनवाई के लिए मामला डीजीसी राजू पोरवाल को मिला
- वर्ष 2012 में ही पांच आरोपियों पर आरोप तय हुए।
- वर्ष 2014 में गवाहों की गवाही पूरी हुई।
- 14 फरवरी 2024 को फैसला आया।
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बचपन से बुढ़ापा आते-आते बहुत कुछ खोकर मिला इंसाफ
अपने आप में बेहमई कांड का मामला एक मिसाल बन गया, जहां एक नाबालिग दसवीं कक्षा के छात्र को मामले में आरोपी बनकर जेल जाना पड़ा। लंबी कानूनी दांवपेच से उलझे इस मुकदमे में उसकी किशोर अवस्था कब बुढ़ापा में तब्दील हो गई, उसे भी पता नहीं चला। इतना ही नहीं मुकदमे के सफर में जमीन तक बिक गई।

मामले में 43 साल तक अदालत के चक्कर लगाने के बाद दोषमुक्त हुए अमराहट क्षेत्र के गांव महेशपुर निवासी विश्वनाथ ने अदालत में आए फैसले पर राहत की सांस ली। कोर्ट में अपने लड़कों से लिपट गया। इस दौरान उसकी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। पूछने पर उसने बताया कि वह घटना के समय 1981 में उमरपुर के जनता इंटर कालेज में 10वीं कक्षा में पढ़ता था। उस समय उसकी उम्र करीब सोलह वर्ष थी। वह रोज की तरह 30 मार्च 1981 को स्कूल गया था। उसी समय ग्राम प्रधान के जरिए पुलिस ने उसे स्कूल से थाने बुलवाया, जहां उससे पूछताछ की गई और उसे 1 अप्रैल को जेल भेज दिया। जेल से करीब दो तीन महीने बाद उसकी जमानत मंजूर होने पर रिहाई हो सकी। जेल जाने के बाद उसकी पढ़ाई बंद हो गई। आए दिन अदालत में तारीखों पर आने जाने के कारण उसे कंगाली के दौर से गुजरना पड़ा। इस दौरान उसकी लगभग पांच बीघे जमीन भी बिक गई। अब मात्र दो बीघे जमीन बची है, जिससे उसके परिवार का गुजर बसर हो रहा था। इस बीच वह कई गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो गया। पत्नी के घर में काम करते हुए गिरने से उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट आ गईं, जिसका इलाज भी वह सही से नहीं करवा पाया और उसने 15 दिन पहले उसका साथ छोड़ दिया। आज उसके बरी होने पर उसके साथ खुशी मानने के लिए उसकी पत्नी नहीं है। यह कहते ही उसके आंसू निकल पड़े। इस दौरान उसके साथ उसके दोनों बेटे अमर और विनय ने उसे संभाला।
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