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लकड़ी कारोबार पर ट्रांजिट टैक्स की मार

Wed, 13 Jul 2016 12:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर Updated Wed, 13 Jul 2016 12:58 AM IST
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Bash Transit tax on timber trade
income tax - फोटो : income tax
कानपुर। लकड़ी कारोबार पर एक बार फिर ट्रांजिट टैक्स की मार पड़ी है। पहले से ही 16.50 फीसदी टैक्स से परेशान लकड़ी कारोबारियों को अब पांच फीसदी ट्रांजिट टैक्स अतिरिक्त देना पड़ रहा है। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा। प्रदेश में 24 जून से ट्रांजिट पास लागू हो गया है।
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24 जून से पहले तक एक ट्रक माल एक जिले से दूसरे जिले में भेजने पर वन विभाग को 380 रुपये टैक्स देकर पास (ट्रांजिट पास) बनवा लिया जाता था। अब पांच फीसदी टैक्स लगने से एक गाड़ी पर करीब 25 हजार रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। नए ट्रांजिट टैक्स का खराब पहलू यह है कि लकड़ी जितनी बार एक जिले से दूसरे जिले भेजी जाएगी कारोबारियों को पांच फीसदी टैक्स वन विभाग को देना होगा। यानी हर बार माल पांच फीसदी महंगा होकर अगले कारोबारी तक पहुंचेगा। महंगाई की मार सबसे ज्यादा साखू, सागौन और चीड़ की लकड़ी पर पड़ेगी, क्योंकि ये लकड़ी कई व्यापारियों के जरिए अलग-अलग जगहों पर पहुंचती है।
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गिनीज बुक में दर्ज है इसका विरोध
अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल से जुड़े टिंबर मर्चेंट गुरजिंदर सिंह ने बताया कि प्रदेश में लकड़ी पर ट्रांजिट फीस का विरोध गिनीज बुक में दर्ज है। 20 अक्तूबर 2010 को पहली बार मायावती सरकार के समय पांच फीसदी ट्रांजिट शुल्क लगाया गया। लकड़ी और कोयला कारोबारियों ने इसके विरोध में हाईकोर्ट में कुल 1069 याचिकाएं दाखिल कर दीं। हाईकोर्ट ने कारोबारियों को राहत दी। फैसले के एक माह बाद वन विभाग के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट चले गए। जवाब में कारोबारियों ने 2012 में इस पर स्टे ले लिया। अभी 24 जून 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांजिट शुल्क पर लगी रोक हटा ली। हालांकि अंतिम फैसला अगस्त में आना है लेकिन कारोबारियों ने अभी से इसे अपने विपक्ष में मान लिया है।
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