Banda Boat Accident: सात साल से खराब पड़े हैं दो मोटरबोट, अधिकारियों ने नहीं ली सुध, बाढ़ आई तो कैसे बचाएंगे
मर्का थाना क्षेत्र में यमुना नदी के हादसे में पुलिस और प्रशासन की लापरहवाही सामने आ रही है। वहीं, केन नदी के किनारे सात साल से दो मोटरबोट खराब पड़े हैं, जिनकी मरम्मत की अधिकारियों ने सुध नहीं ली है। केन की बाढ़ से शहर सहित कई गांव प्रभावित होते हैं। ऐसे में यदि बाढ़ आई, तो कैसे रेस्क्यू अभियान चलाया जाएगा।
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बांदा जिले में मर्का के नाव हादसे के बाद भी प्रशासन सबक नहीं ले रहा है। केन नदी बाढ़ के मुहाने पर खड़ी है। यह खतरा अभी दो महीने तक बरकार रहेगा। वहीं, देखरेख नहीं होने से भूरागढ़ घाट पर दो मोटरबोट (स्टीमर) कबाड़ हो चुके हैं। इन दोनों बोट के बहने का भी खतरा मडराने लगा है। राजस्व विभाग के अफसर इसे खराब बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं।
केन नदी की बाढ़ शहर से कई मोहल्लों सहित नदी किनारे के एक सैकड़ा गांवों को प्रभावित करती है। सन 1989 के बाद 2005 में केन की बाढ़ ने शहर सहित कई गांवों में तबाही मचाई थी। बाढ़ के पानी से गांव के गांव बह गए थे। बढ़ी संख्या में जन हानि भी हुई थी।
वर्ष 2005 में प्रलयंकारी बाढ़ से लोगों को बचाने के लिए शासन ने प्रशासन को दो मोटरबोट (स्टीमर) उपलब्ध कराए थे। शुरू के कुछ वर्षो में केन की बाढ़ के समय पीड़ितों को राहत भी मिली। मोटरबोट के जरिए प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों में पहुंचाया गया, लेकिन बीते चार साल से राजस्व विभाग ने इन मोटरबोटों से नजर फेर ली है। अलबत्ता धीरे-धीरे यह मोटरबोट कबाड़ हो गए।
वर्ष 2015 से दोनों मोटरबोट भूरागढ़ घाट किनारे पड़े हुए है। रखरखाव के आभाव में इनमें खास जम आई है। कीड़े मकौड़ों ने डेरा जमा लिया है। बाढ़ की तेजधारा को पार करने के लिए नाव के अतिरिक्त कोई साधन नहीं है। अफसर भी अनदेखी कर रहे है। सात सालों में किसी ने इन्हें दुरुस्त कराने की सुध तक नहीं ली। लगातार कई दिनों से हो रही बारिश से केन का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। बाढ़ आई तो नदी किनारे आबाद बस्तियों के लोगों को बचाने के प्रयास विफल हो सकते है।
सात सालों से मानदेय भी नहीं मिला
कल्लू निषाद का कहना है कि 2005 में जिलाधिकारी के आदेश पर उन्हे बतौर चालक 4500 रुपये में नियुक्त किया गया था। लेकिन मोटरबोट खराब होने के बाद उन्हें न तो मानदेय मिला और न ही नए मोटरबोट आए। बाढ़ के समय मोटरबोट पीड़ितों की जान बचाने में बेहद काम आता था। प्रत्येक मोटरबोट में 12 सीट है, यानि एक बार में 24 पीड़ितों को इधर से उधर पहुंचाया जा सकता है।
पुराने कंडम, नए मांगे है मोटरबोट
दैवीय आपदा प्रभारी व एडीएम उमाकांत त्रिपाठी का कहना है कि दोनों मोटरबोट (स्टीमर) पीडब्ल्यूडी की तकनीकी जांच में कंडम पाए गए है। अप्रैल माह में ही शासन को मोटरबोट (स्टीमर) उपलब्ध कराने के लिए पत्र भेजा गया है। इसके पूर्व भी कई पत्र भेजे गए है। उधर, तहसीलदार पुष्कर का कहना है कि मोटरबोट के कंडम होने की जानकारी दैवीय आपदा विभाग को है।