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एथलेटिक्स प्रतियोगिता का ओवरऑल चैंपियन बना उन्नाव का बाबू जयशंकर महाविद्यालय
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Updated Sun, 14 Oct 2018 04:32 PM IST
सार
- कानपुर यूनिवर्सिटी में चल रही अंतर महाविद्यालय एथलेटिक्स प्रतियोगिता का समापन
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विस्तार
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में चल रही अंतर महाविद्यालय एथलेटिक्स प्रतियोगिता का ओवरऑल चैंपियन का खिताब सुमेरपुर उन्नाव के बाबू जयशंकर महाविद्यालय ने जीता। सभी 22 प्रतियोगिओं में सबसे ज्यादा विजेता इसी महाविद्यालय के छात्र रहे। रायबरेली का एफजी कॉलेज दूसरे नंबर पर रहा। तीसरे नंबर पर बैशवारा पीजी कॉलेज रायबरेली की टीम रही। शनिवार को समापन अवसर पर कुलपति प्रो. नीलिमा गुप्ता ने विजेताओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया। मीडिया प्रभारी प्रो. संजय स्वर्णकार ने बताया कि प्रतियोगिता में खेलने वाले सभी खिलाड़ियों का 10 दिन का कैंप विश्वविद्यालय में होगा। इसमें खिलाड़ियों का चयन कर 25 से 29 नवंबर तक होने वाली अखिल भारतीय विश्वविद्यालय प्रतियोगिता के लिए मंगलौर भेजा जाएगा।
ये रहे विजेता और उपविजेता
खेल विजेता उपविजेता
बालक वर्ग
10 किमी पैदल चाल सुनील सिंह अनूप कुमार
10000 मीटर दौड़ अमरीश कुमार विपिन कुमार
भाला फेंक लवकेश सिंह राजेश यादव
ट्रिपल जंप द्रावेश कुमार करुण शंकर
400 मीटर दौड़ संजय कुमार श्रीकांत सिंह
बालिका वर्ग
5 किमी दौड़ निकिता सिंह स्वाती कुमार
1500 मीटर शीलू पांडेय आकांक्षा कुशवाहा
10000 मीटर लक्ष्मी श्वेता पाल
जैवलीन थ्रो सीता निशा सिंह
ट्रिपल जंप सुमन राजपूत प्रिंसी पाल
डिस्कस थ्रो सोनिका वंदना सिंह
भाई के सपनों को पूरा कर रहीं निधी
रायबरेली नयापुरवा निवासी किसान जगदीश की बेटी निधि ने बाधा दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर भाई के सपने को पूरा करने का काम किया है। निधि ने बताया कि उसका भाई सर्वेश एथलेटिक्स का खिलाड़ी है। उसका सपना है कि मैं बड़े स्तर की खिलाड़ी बनूं। गांव में कोच न होने के कारण स्कूल के मैदान में ही अभ्यास करना शुरू कर दिया था। आज कई प्रदेश स्तरीय व महाविद्यालय प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर अपने गांव का नाम रोशन कर रही हैं।
अच्छा कोच बनना मेरा सपना
रायबरेली के दयालपुर गांव निवासी राज मिस्त्री जिया लाल की पुत्री सीता ने बताया कि हम लोगों के गांव में कोच न मिलने के कारण खिलाड़ी अच्छी ट्रेनिंग नहीं कर पाते हैं। स्कूल में ही भाला फेंक का अभ्यास करती हूं। गांव के बच्चे भी कुछ कर सकते हैं, मगर सबसे बड़ी समस्या है कि उनका मनोबल बढ़ाने वाला कोई नहीं हैं, न ही कोई ट्रेनर है। मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बनकर अपने गांव के बच्चों को ट्रेनिंग दूंगी।
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पिता का नाम रोशन करना है
रायबरेली लालगंज निवासी सब्जी का ठेला लगाने वाले स्वयंभर सिंह के बेटे सुशील सिंह पिछले नौ साल से स्कूल में ही एथलेटिक्स का अभ्यास कर रहे हैं। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण कभी किसी कोच के पास नहीं जा सके। दूसरे को देखकर अभ्यास किया करते हैं। सुशील ने कहा कि पिता ने बड़ी मुश्किलों से मुझे यहां तक पहुंचाया है, अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलकर पिता का नाम रोशन करना है।
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ये रहे विजेता और उपविजेता
खेल विजेता उपविजेता
बालक वर्ग
10 किमी पैदल चाल सुनील सिंह अनूप कुमार
10000 मीटर दौड़ अमरीश कुमार विपिन कुमार
भाला फेंक लवकेश सिंह राजेश यादव
ट्रिपल जंप द्रावेश कुमार करुण शंकर
400 मीटर दौड़ संजय कुमार श्रीकांत सिंह
बालिका वर्ग
5 किमी दौड़ निकिता सिंह स्वाती कुमार
1500 मीटर शीलू पांडेय आकांक्षा कुशवाहा
10000 मीटर लक्ष्मी श्वेता पाल
जैवलीन थ्रो सीता निशा सिंह
ट्रिपल जंप सुमन राजपूत प्रिंसी पाल
डिस्कस थ्रो सोनिका वंदना सिंह
भाई के सपनों को पूरा कर रहीं निधी
रायबरेली नयापुरवा निवासी किसान जगदीश की बेटी निधि ने बाधा दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर भाई के सपने को पूरा करने का काम किया है। निधि ने बताया कि उसका भाई सर्वेश एथलेटिक्स का खिलाड़ी है। उसका सपना है कि मैं बड़े स्तर की खिलाड़ी बनूं। गांव में कोच न होने के कारण स्कूल के मैदान में ही अभ्यास करना शुरू कर दिया था। आज कई प्रदेश स्तरीय व महाविद्यालय प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर अपने गांव का नाम रोशन कर रही हैं।
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अच्छा कोच बनना मेरा सपना
रायबरेली के दयालपुर गांव निवासी राज मिस्त्री जिया लाल की पुत्री सीता ने बताया कि हम लोगों के गांव में कोच न मिलने के कारण खिलाड़ी अच्छी ट्रेनिंग नहीं कर पाते हैं। स्कूल में ही भाला फेंक का अभ्यास करती हूं। गांव के बच्चे भी कुछ कर सकते हैं, मगर सबसे बड़ी समस्या है कि उनका मनोबल बढ़ाने वाला कोई नहीं हैं, न ही कोई ट्रेनर है। मैं अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बनकर अपने गांव के बच्चों को ट्रेनिंग दूंगी।
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पिता का नाम रोशन करना है
रायबरेली लालगंज निवासी सब्जी का ठेला लगाने वाले स्वयंभर सिंह के बेटे सुशील सिंह पिछले नौ साल से स्कूल में ही एथलेटिक्स का अभ्यास कर रहे हैं। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण कभी किसी कोच के पास नहीं जा सके। दूसरे को देखकर अभ्यास किया करते हैं। सुशील ने कहा कि पिता ने बड़ी मुश्किलों से मुझे यहां तक पहुंचाया है, अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलकर पिता का नाम रोशन करना है।