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रनियां बाल गृह में एक और बच्ची ने दम तोड़ा
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
Updated Mon, 13 Jun 2016 01:38 AM IST
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हैलट के बाल रोग विभाग में प्रेरणा की जांच करते डॉक्टर।
- फोटो : amarujala
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रनियां (कानपुर देहात)। कसबा स्थित शांति देवी मेमोरियल बाल गृह में रहने वाली एक और बच्ची ने रविवार सुबह दम तोड़ दिया। तीन दिन के अंतराल में दो बच्चियों की मौत हो चुकी है। इस मामले में अभी तक कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई। सिर्फ लिखा-पढ़ी जारी है। अधिकारी विस्तृत जांच कराने के बाद दोषियों को दंडित करने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं।
बाल गृह के अधिकारी संतोष कुशवाहा ने बताया कि सीता देवी (11 माह) सीडब्ल्यूसी कानपुर से 6 अक्तूबर 2015 को उनके यहां आई थी। शुक्रवार को अचानक उसे उल्टी व दस्त चालू हो गए थे। शनिवार सुबह सीता को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने हालत ठीक बताकर उसी दिन उसे डिस्चार्ज कर दिया था। रविवार सुबह बालगृह में सीता की मौत हो गई। बाद में पुलिस ने पंचनामा भरकर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा। बच्ची की मौत की खबर जिला प्रोबेशन अधिकारी के अलावा अन्य अफसरों को भी दे दी गई, लेकिन कोई प्रशासनिक अधिकारी बालगृह नहीं पहुंचा। देर शाम को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक बच्ची सिप्टीसेमिया के चलते कोमा में गई और उसकी मौत हो गई।
बच्चों को छोड़कर सबका पेट भर रहा
कानपुर देहात (ब्यूरो)। रनियां स्थित बाल गृह में कितना बजट आता है, अनाथ बच्चों पर कितना खर्च किया जाता है, बच्चों को क्या खिलाया-पिलाया जाता है, जिला प्रोबेशन अधिकारी विमल बिहारी पांडेय को कुछ नहीं पता। सूत्रों के अनुसार इस बालगृह को कथित नेताओं का भी संरक्षण है जिनके दबाव में कभी कार्रवाई नहीं होती। सालों से खेल चल रहा है, संचालक-नेता-अफसर सबका पेट भर रहा है लेकिन बच्चों के पेट में कुछ नहीं जा रहा।
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जिला प्रोबेशन अधिकारी का कहना है कि रनियां स्थित बाल गृह संचालकों को सीधे प्रदेश सरकार से बजट मिलता है। जिलाधिकारी या उनका कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। उन्होंने छानबीन की थी पर संचालक ने कोई भी अभिलेख नहीं दिखाए। न ही बजट व खर्च के बारे में कोई जानकारी दी। देहात जिले में बालगृह संबंधी कोई विभागीय अधिकारी न होने के कारण इसके संचालन संबंधी मानकों का विस्तृत विवरण भी नहीं मिल सका है। इस संबंध में पहले आला अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी थी पर कुछ हुआ नहीं। इनके बयान से साफ है कि नीचे से ऊपर तक सब जगह गोलमाल है। बालगृह के बजट-खर्च आदि बिंदुओं की छानबीन आज तक क्यों नहीं हुई। बच्चों को क्या खिलाया-पिलाया जा रहा है, इसे क्यों नहीं जांचा गया, इन सवालों का कोई जवाब नहीं।
‘बिना मां-बाप के बच्चे हैं, मार डालोगे क्या
रनियां बाल गृह से जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बाल रोग अस्पताल पहुंची प्रेरणा (2) को देख डॉक्टर दंग रह गए। कुपोषण के कारण प्रेरणा की हालत बेहद नाजुक है। जिला प्रोबेशन अधिकारी से जूनियर डॉक्टर ने सवाल किया कि, आप लोगों ने बच्चों की क्या हालत बना दी है। बच्चों को कैसे रखते हो, इतनी बुरी हालत में आज तक किसी बच्चे को नहीं देखा है। कम से कम अपने बच्चे का तो ख्याल कर खिलाते-पिलाते। बाल रोग में बच्चों की हालत देख दूसरे तीमारदारों की आंखें नम हो गईं। उनका कहना था कि बिना मां-बाप के बच्चों का ख्याल अपने बच्चों से ज्यादा रखना चाहिए लेकिन रुपये कमाने के चक्कर में लोग मानवीय संवेदनाओं को भी भूल गए हैं।
कानपुर देहात के सहायक निदेशक बचत व प्रभारी जिला प्रोबेशन अधिकारी विपिन बिहारी पांडेय रविवार को प्रेरणा, उमा (2), मुस्कान (4), दीप्ति (4) और नान्या (3) को लेकर बाल रोग अस्पताल पहुंचे तो बच्चों की हालत देखकर डॉक्टर हैरान रह गए। कहा लगता है पानी तक नहीं दिया जाता।
बच्चों को बचाना प्राथमिता
जिला प्रोबेशन अधिकारी ने बताया कि फिलहाल पहली प्राथमिकता बच्चों को बचाना है। बालगृह से चार बच्चों को कानपुर हैलट अस्पताल भेजा है। वहां मेडिकल फिट होने का प्रमाणपत्र मिल जाने के बाद इनको लखनऊ स्थित राजकीय बालिका गृह में शिफ्ट किया जाएगा। इस संबंध में लखनऊ राजकीय बालिका गृह के डायरेक्टर से फोन पर बातचीत हो गई है।
भर्ती बच्ची बेहद कमजोर
जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती एक अन्य बच्ची कीर्ति की हालत भी नाजुक है। रविवार को नर्स ने बताया कि कीर्ति की सेहत बेहद कमजोर है। उसकी लगातार देखभाल हो रही है। पौष्टिक तत्व दिए जा रहे हैं।
दो बार बगैर डिस्चार्ज उठा ले गए
बालगृह के संचालकों ने बच्चियों के उपचार के दौरान भी संवेदनहीनता का परिचय दिया। जिला अस्पताल में भर्ती होने के बाद बगैर डिस्चार्ज के ही परिजन उसे लेकर जाते रहे। रविवार को ड्यूटी पर तैनात नर्स शशि पांडेय ने बताया कि बच्ची प्रेरणा को दो बार सुबह भर्ती कराने के बाद शाम को लेकर चले गए। इसी तरह अन्य बच्चों को भी शाम के वक्त लेकर चले जाते रहे और सुबह हालत बिगड़ने पर फिर लाते रहे।
चर्चा का विषय रही सपा का झंडा लगी कार
जिला अस्पताल में एक महिला सपा का झंडा लगी कार से पहुंची। बेंच पर बैठी चार मासूम बच्चियों के पास जाकर उन्हें पाउच से पानी पिलाया। इसके बाद कानपुर के लिए रेफर की गई एक बीमार बच्ची व अन्य चारों बच्चियों को एंबुलेंस में बैठाया गया तो वह महिला वहां पहुंची। बच्चों के साथ गई बालगृह की एक कर्मचारी से बातचीत कर अलर्ट रहने को कहा। एंबुलेंस के जाने के बाद महिला कार से उसके पीछे-पीछे गई। महिला की सक्रियता पर तरह-तरह चर्चाएं होती रहीं।
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बाल गृह के अधिकारी संतोष कुशवाहा ने बताया कि सीता देवी (11 माह) सीडब्ल्यूसी कानपुर से 6 अक्तूबर 2015 को उनके यहां आई थी। शुक्रवार को अचानक उसे उल्टी व दस्त चालू हो गए थे। शनिवार सुबह सीता को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने हालत ठीक बताकर उसी दिन उसे डिस्चार्ज कर दिया था। रविवार सुबह बालगृह में सीता की मौत हो गई। बाद में पुलिस ने पंचनामा भरकर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा। बच्ची की मौत की खबर जिला प्रोबेशन अधिकारी के अलावा अन्य अफसरों को भी दे दी गई, लेकिन कोई प्रशासनिक अधिकारी बालगृह नहीं पहुंचा। देर शाम को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक बच्ची सिप्टीसेमिया के चलते कोमा में गई और उसकी मौत हो गई।
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बच्चों को छोड़कर सबका पेट भर रहा
कानपुर देहात (ब्यूरो)। रनियां स्थित बाल गृह में कितना बजट आता है, अनाथ बच्चों पर कितना खर्च किया जाता है, बच्चों को क्या खिलाया-पिलाया जाता है, जिला प्रोबेशन अधिकारी विमल बिहारी पांडेय को कुछ नहीं पता। सूत्रों के अनुसार इस बालगृह को कथित नेताओं का भी संरक्षण है जिनके दबाव में कभी कार्रवाई नहीं होती। सालों से खेल चल रहा है, संचालक-नेता-अफसर सबका पेट भर रहा है लेकिन बच्चों के पेट में कुछ नहीं जा रहा।
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जिला प्रोबेशन अधिकारी का कहना है कि रनियां स्थित बाल गृह संचालकों को सीधे प्रदेश सरकार से बजट मिलता है। जिलाधिकारी या उनका कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। उन्होंने छानबीन की थी पर संचालक ने कोई भी अभिलेख नहीं दिखाए। न ही बजट व खर्च के बारे में कोई जानकारी दी। देहात जिले में बालगृह संबंधी कोई विभागीय अधिकारी न होने के कारण इसके संचालन संबंधी मानकों का विस्तृत विवरण भी नहीं मिल सका है। इस संबंध में पहले आला अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी थी पर कुछ हुआ नहीं। इनके बयान से साफ है कि नीचे से ऊपर तक सब जगह गोलमाल है। बालगृह के बजट-खर्च आदि बिंदुओं की छानबीन आज तक क्यों नहीं हुई। बच्चों को क्या खिलाया-पिलाया जा रहा है, इसे क्यों नहीं जांचा गया, इन सवालों का कोई जवाब नहीं।
‘बिना मां-बाप के बच्चे हैं, मार डालोगे क्या
रनियां बाल गृह से जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के बाल रोग अस्पताल पहुंची प्रेरणा (2) को देख डॉक्टर दंग रह गए। कुपोषण के कारण प्रेरणा की हालत बेहद नाजुक है। जिला प्रोबेशन अधिकारी से जूनियर डॉक्टर ने सवाल किया कि, आप लोगों ने बच्चों की क्या हालत बना दी है। बच्चों को कैसे रखते हो, इतनी बुरी हालत में आज तक किसी बच्चे को नहीं देखा है। कम से कम अपने बच्चे का तो ख्याल कर खिलाते-पिलाते। बाल रोग में बच्चों की हालत देख दूसरे तीमारदारों की आंखें नम हो गईं। उनका कहना था कि बिना मां-बाप के बच्चों का ख्याल अपने बच्चों से ज्यादा रखना चाहिए लेकिन रुपये कमाने के चक्कर में लोग मानवीय संवेदनाओं को भी भूल गए हैं।
कानपुर देहात के सहायक निदेशक बचत व प्रभारी जिला प्रोबेशन अधिकारी विपिन बिहारी पांडेय रविवार को प्रेरणा, उमा (2), मुस्कान (4), दीप्ति (4) और नान्या (3) को लेकर बाल रोग अस्पताल पहुंचे तो बच्चों की हालत देखकर डॉक्टर हैरान रह गए। कहा लगता है पानी तक नहीं दिया जाता।
बच्चों को बचाना प्राथमिता
जिला प्रोबेशन अधिकारी ने बताया कि फिलहाल पहली प्राथमिकता बच्चों को बचाना है। बालगृह से चार बच्चों को कानपुर हैलट अस्पताल भेजा है। वहां मेडिकल फिट होने का प्रमाणपत्र मिल जाने के बाद इनको लखनऊ स्थित राजकीय बालिका गृह में शिफ्ट किया जाएगा। इस संबंध में लखनऊ राजकीय बालिका गृह के डायरेक्टर से फोन पर बातचीत हो गई है।
भर्ती बच्ची बेहद कमजोर
जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती एक अन्य बच्ची कीर्ति की हालत भी नाजुक है। रविवार को नर्स ने बताया कि कीर्ति की सेहत बेहद कमजोर है। उसकी लगातार देखभाल हो रही है। पौष्टिक तत्व दिए जा रहे हैं।
दो बार बगैर डिस्चार्ज उठा ले गए
बालगृह के संचालकों ने बच्चियों के उपचार के दौरान भी संवेदनहीनता का परिचय दिया। जिला अस्पताल में भर्ती होने के बाद बगैर डिस्चार्ज के ही परिजन उसे लेकर जाते रहे। रविवार को ड्यूटी पर तैनात नर्स शशि पांडेय ने बताया कि बच्ची प्रेरणा को दो बार सुबह भर्ती कराने के बाद शाम को लेकर चले गए। इसी तरह अन्य बच्चों को भी शाम के वक्त लेकर चले जाते रहे और सुबह हालत बिगड़ने पर फिर लाते रहे।
चर्चा का विषय रही सपा का झंडा लगी कार
जिला अस्पताल में एक महिला सपा का झंडा लगी कार से पहुंची। बेंच पर बैठी चार मासूम बच्चियों के पास जाकर उन्हें पाउच से पानी पिलाया। इसके बाद कानपुर के लिए रेफर की गई एक बीमार बच्ची व अन्य चारों बच्चियों को एंबुलेंस में बैठाया गया तो वह महिला वहां पहुंची। बच्चों के साथ गई बालगृह की एक कर्मचारी से बातचीत कर अलर्ट रहने को कहा। एंबुलेंस के जाने के बाद महिला कार से उसके पीछे-पीछे गई। महिला की सक्रियता पर तरह-तरह चर्चाएं होती रहीं।