{"_id":"61994abc42eedb203d5b3245","slug":"agnihotra-ashes-will-save-plants-from-every-disease","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"दावा: पौधों को हर रोग से बचाएगी अग्निहोत्र की भस्म, ये रही पूरी जानकारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दावा: पौधों को हर रोग से बचाएगी अग्निहोत्र की भस्म, ये रही पूरी जानकारी
Sun, 21 Nov 2021 12:51 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Sun, 21 Nov 2021 12:51 AM IST
सार
शोध के दौरान एक कमरे में बैक्टीरिया की स्थिति को जानने के बाद मंत्रोच्चारण के साथ अग्निहोत्र किया तो 90 प्रतिशत बैक्टीरिया कम पाए गए।
विज्ञापन
प्रोफेसर आरके पाठक
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अग्निहोत्र वेद में उल्लेखित प्राण ऊर्जा सिद्धांत पर आधारित विज्ञान है। आदिकाल में प्रदूषण के निवारण के लिए हर घर में अग्निहोत्र होता था। इसमें पिरामिड आकार के तांबे के बर्तन में देसी गाय के गोबर के उपलों को डालकर उसमें देसी गाय के घी में डूबे हुए अक्षत डालने चाहिए। यह प्रक्रिया दो से तीन मिनट की है।
इस काम को दिन में दो बार सूर्योदय और सूर्यास्त के समय करना चाहिए। इस प्रक्रिया में निकलने वाली भस्म को पानी में मिलाकर पौधों में छिड़काव करने से उन्हें कोई रोग नहीं लगेगा। सीएसए में चल रहे भारतीय बागवानी सम्मेलन के तीसरे दिन केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (सीआईएसएच), लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. आरके पाठक ने यह दावा किया।
उन्होंने बताया कि अग्निहोत्र से निकलने वाला धुआं कीटाणुओं और बैक्टीरिया को खत्म करता है। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान एक कमरे में बैक्टीरिया की स्थिति को जानने के बाद मंत्रोच्चारण के साथ अग्निहोत्र किया तो 90 प्रतिशत बैक्टीरिया कम पाए गए। इस मौके पर डॉ. वाईआर चन्ना, डॉ. वीके त्रिपाठी, डॉ. एचजी प्रकाश, डॉ. खलील खान, डॉ. एके सिंह आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
इस काम को दिन में दो बार सूर्योदय और सूर्यास्त के समय करना चाहिए। इस प्रक्रिया में निकलने वाली भस्म को पानी में मिलाकर पौधों में छिड़काव करने से उन्हें कोई रोग नहीं लगेगा। सीएसए में चल रहे भारतीय बागवानी सम्मेलन के तीसरे दिन केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (सीआईएसएच), लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. आरके पाठक ने यह दावा किया।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि अग्निहोत्र से निकलने वाला धुआं कीटाणुओं और बैक्टीरिया को खत्म करता है। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान एक कमरे में बैक्टीरिया की स्थिति को जानने के बाद मंत्रोच्चारण के साथ अग्निहोत्र किया तो 90 प्रतिशत बैक्टीरिया कम पाए गए। इस मौके पर डॉ. वाईआर चन्ना, डॉ. वीके त्रिपाठी, डॉ. एचजी प्रकाश, डॉ. खलील खान, डॉ. एके सिंह आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
आम-अमरूद की प्रजातियों पर हुई चर्चा
सम्मेलन के प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता पूर्व कुलपति कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर डॉ. बलराज सिंह ने की। सीआईएसएच लखनऊ के निदेशक डॉ. शैलेंद्र राजन ने आम और अमरूद की प्रजातियों और नींबू अनुसंधान संस्थान नागपुर के निदेशक डॉ. डीके घोष गुणवत्तायुक्त नींबू उत्पादन पर विचार रखे। सीआईएसएच के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रामअवध राम ने पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन में जीवामृत, बीजामृत, पंचगव्य आदि के प्रयोग के बारे में बताया।
समय से पहले या बाद में न तोड़ें संतरा
सेंट्रल सीट्रस रिसर्च इंस्टीट्यूट नागपुर के डॉ. दिनेश कुमार ने बताया कि संतरों को समय से पहले या बाद में नहीं तोड़ना चाहिए। ऐसा करने से फल की गुणवत्ता और स्वाद पर असर पड़ता है। फलों को मैकेनाइज्ड पैकिंग लाइन के तहत पैक करना चाहिए। ऐसा करने से ठंडे तापमान में 40-45 दिन तक फल सुरक्षित रहता है। इस प्रक्रिया के तहत फल को हाइपोक्लोराइड से धुलने के बाद सुखाया जाता है। फिर फूड ग्रेड वैक्स से उनका मोमीकरण करके बॉक्स में यूनिफॉर्म पैकिंग में रखते हैं।
देसी गाय के गोबर से नहीं लगता है तनावेधक रोग
सीआईएसएच के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसके शुक्ला ने बताया कि आमतौर पर किसान आम के पेड़ों का जीर्णोद्धार करने के लिए जमीन से तीन से चार मीटर की ऊंचाई छोड़कर काट देते हैं। ऐसा करने पर पेड़ में तनावेधक कीट लग जाता है और पेड़ खत्म हो जाता है। किसानों को पेड़ में बीच वाली शाखा को पूरा और उसके आसपास की दो शाखाओं को काटकर उनमें देसी गाय का गोबर लगा देना चाहिए। इससे तनावेधक रोग नहीं लगता है।
सम्मेलन के प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता पूर्व कुलपति कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर डॉ. बलराज सिंह ने की। सीआईएसएच लखनऊ के निदेशक डॉ. शैलेंद्र राजन ने आम और अमरूद की प्रजातियों और नींबू अनुसंधान संस्थान नागपुर के निदेशक डॉ. डीके घोष गुणवत्तायुक्त नींबू उत्पादन पर विचार रखे। सीआईएसएच के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रामअवध राम ने पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन में जीवामृत, बीजामृत, पंचगव्य आदि के प्रयोग के बारे में बताया।
समय से पहले या बाद में न तोड़ें संतरा
सेंट्रल सीट्रस रिसर्च इंस्टीट्यूट नागपुर के डॉ. दिनेश कुमार ने बताया कि संतरों को समय से पहले या बाद में नहीं तोड़ना चाहिए। ऐसा करने से फल की गुणवत्ता और स्वाद पर असर पड़ता है। फलों को मैकेनाइज्ड पैकिंग लाइन के तहत पैक करना चाहिए। ऐसा करने से ठंडे तापमान में 40-45 दिन तक फल सुरक्षित रहता है। इस प्रक्रिया के तहत फल को हाइपोक्लोराइड से धुलने के बाद सुखाया जाता है। फिर फूड ग्रेड वैक्स से उनका मोमीकरण करके बॉक्स में यूनिफॉर्म पैकिंग में रखते हैं।
देसी गाय के गोबर से नहीं लगता है तनावेधक रोग
सीआईएसएच के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसके शुक्ला ने बताया कि आमतौर पर किसान आम के पेड़ों का जीर्णोद्धार करने के लिए जमीन से तीन से चार मीटर की ऊंचाई छोड़कर काट देते हैं। ऐसा करने पर पेड़ में तनावेधक कीट लग जाता है और पेड़ खत्म हो जाता है। किसानों को पेड़ में बीच वाली शाखा को पूरा और उसके आसपास की दो शाखाओं को काटकर उनमें देसी गाय का गोबर लगा देना चाहिए। इससे तनावेधक रोग नहीं लगता है।