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नोटबंदी के बाद बैंकों में बढ़ी ग्रामीण महिलाओं की साख
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 06 Dec 2016 08:27 PM IST
सार
बढ़ रहा बैंक खाताधारक बनने का ग्राफ, महीने भर में बढ़ी 10 फीसदी संख्या
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विस्तार
फतेहपुर में पांच सौ और हजार के पुराने नोट बंद करने और बैंक से सीमित रकम देने के सरकार के हालिया फैसले ने ग्रामीण महिलाओं की साख बढ़ाने का अपरोक्ष रूप से काम किया है। बैंक खाताधारक बनने की रफ्तार एक महीने के अंदर काफी तेज हुई है। इसका खुलासा जननी सुरक्षा योजना के तहत प्रसूता को मिलने वाली एकाउंटपेयी चेक कर रही है। नोट बंदी से पहले करीब 30 से 40 फीसदी चेकें प्रसूताओं के खाताधारक न होने की वजह से पेडिंग में लटक जा रही थीं। अब इनकी संख्या घटकर महज 20 फीसदी पर आ टिकीं है।
एक दशक पहले जननी सुरक्षा योजना की शुरुआत हुई थी। योजना में ग्रामीण क्षेत्र की प्रसूता को 14 सौ रुपये व शहरी क्षेत्र की महिला को एक हजार रुपये दिए जाते हैं। पहले यह मदद लाभार्थी के खाता में भेजने के बजाय नान एकाउेंटपेयी चेक से दी जाती थी। हेराफेरी के मामले सामने आने के बाद जिले में चार साल से एकाउेंटपेयी चेक का वितरण किया जा रहा है। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद से ग्रामीण महिलाओं के खाताधारक होने और न होने का सच भी लगातार सामने आता रहा है।
मसलन दो साल पहले तक सरकारी अस्पताल में बच्चा जनने वाली महज 40 फीसदी महिलाएं बैंक या फिर डाकघर की खाताधारक के रूप में सामने आईं थीं। साल भर पहले इस स्थिति में सुधार आया और यह संख्या बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच गई। इस दिशा मेें प्रसूता का खुद का खाता न होने पर स्वास्थ्य विभाग ने स्थानीय स्तर पर लाभार्थी के पति के खाता पर भी आर्थिक मदद भेजने की व्यवस्था की। नोटबंदी से पहले 70 फीसदी प्रसूताएं खाताधारक के रूप में सामने आ रही थीं। इस समय इनकी संख्या बढ़कर 80 फीसदी हो गई है। सीएमओ डॉ. विनय कुमार पांडेय का कहना है कि नोट संकट के बाद ग्रामीणों ने घरों की महिलाओं के नाम भी खाता खुलवाने में रुचि ली है। नतीजा ज्यादातर ग्रामीण महिलाएं भी खाताधारक बन चुकी हैं।
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एक दशक पहले जननी सुरक्षा योजना की शुरुआत हुई थी। योजना में ग्रामीण क्षेत्र की प्रसूता को 14 सौ रुपये व शहरी क्षेत्र की महिला को एक हजार रुपये दिए जाते हैं। पहले यह मदद लाभार्थी के खाता में भेजने के बजाय नान एकाउेंटपेयी चेक से दी जाती थी। हेराफेरी के मामले सामने आने के बाद जिले में चार साल से एकाउेंटपेयी चेक का वितरण किया जा रहा है। इस व्यवस्था के लागू होने के बाद से ग्रामीण महिलाओं के खाताधारक होने और न होने का सच भी लगातार सामने आता रहा है।
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मसलन दो साल पहले तक सरकारी अस्पताल में बच्चा जनने वाली महज 40 फीसदी महिलाएं बैंक या फिर डाकघर की खाताधारक के रूप में सामने आईं थीं। साल भर पहले इस स्थिति में सुधार आया और यह संख्या बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच गई। इस दिशा मेें प्रसूता का खुद का खाता न होने पर स्वास्थ्य विभाग ने स्थानीय स्तर पर लाभार्थी के पति के खाता पर भी आर्थिक मदद भेजने की व्यवस्था की। नोटबंदी से पहले 70 फीसदी प्रसूताएं खाताधारक के रूप में सामने आ रही थीं। इस समय इनकी संख्या बढ़कर 80 फीसदी हो गई है। सीएमओ डॉ. विनय कुमार पांडेय का कहना है कि नोट संकट के बाद ग्रामीणों ने घरों की महिलाओं के नाम भी खाता खुलवाने में रुचि ली है। नतीजा ज्यादातर ग्रामीण महिलाएं भी खाताधारक बन चुकी हैं।
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