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Kanpur News: घाटमपुर में ग्वाले को मिली थी मां कूष्मांडा देवी की पिंडी

Thu, 15 Oct 2026 02:04 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 15 Oct 2026 02:04 AM IST
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A Pindi of Goddess Kushmanda Devi was found by a cowherd in Ghatampur.
कानपुर। घाटमपुर स्थित मां कूष्मांडा देवी शक्तिपीठ का इतिहास प्राचीन मान्यताओं से जुड़ा है। मान्यता है कि करीब एक हजार वर्ष पहले कुड़हा नाम का एक ग्वाला यहां गाय चराता था। उसकी गाय एक स्थान पर खड़ी होकर अपने आप दूध गिराने लगती थी। इसकी जानकारी मिलने पर जब उस स्थान की खोदाई कराई गई तो वहां मां की पिंडी निकली। मान्यता के अनुसार ग्वाले के नाम पर ही यहां देवी का नाम कूष्मांडा पड़ा।
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इतिहासकारों के अनुसार राजा घाटक देव ने वर्ष 1380 में घाटमपुर नगर की नींव रखी थी। वर्ष 1890 में नगर निवासी चंदीदीन भुर्जी ने इस प्राचीन मंदिर का निर्माण कराया। मराठा शैली में बने मंदिर में स्थापित प्रतिमाएं संभवतः दसवीं शताब्दी के मध्य की हैं। वर्ष 1783 में भदरस गांव के कवि उम्मेदराय खरे की फारसी पांडुलिपि ऐश आफ्जा में मां कूष्मांडा और मां भद्रकाली का उल्लेख मिलता है। मंदिर में मां कूष्मांडा की लेटी हुई प्रतिमा स्थापित है जिसके दोनों ओर मुख हैं। यहां वर्षों से अखंड ज्योति जल रही है। नवरात्र के चौथे दिन मां की विशेष पूजा होती है। इस दौरान आयोजित भव्य दीपदान में हजारों श्रद्धालु लाखों दीप जलाकर मंदिर को रोशन करते हैं। भक्त नारियल, चुनरी और मिठाई चढ़ाकर मनोकामनाएं मांगते हैं। यहां मुंडन और जनेऊ जैसे मांगलिक संस्कार भी कराए जाते हैं।
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सालभर उमड़ते हैं श्रद्धालु

मंदिर के विस्तार में अग्रणी भूमिका निभाने वाले पंकज पांडेय (मुन्ना) बताते हैं कि आसपास के जनपदों में मां कूष्मांडा का यह अकेला मंदिर है। यही वजह है कि नवरात्र के अलावा भी पूरे साल दूर-दराज के जिलों से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। भक्तों की मान्यता है कि मां की लेटी हुई प्रतिमा के दर्शन से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। पंकज के अनुसार श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां की पिंडी से निकलने वाले नीर को आंखों में लगाने से कमजोर होती दृष्टि लौट आती है। इसी मान्यता के चलते भक्त मां को चांदी की आंखें भी चढ़ाते हैं।
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