{"_id":"38-197495","slug":"Kanpur-197495-38","type":"story","status":"publish","title_hn":"आपदा प्रबंधन, लापता प्रबंधन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आपदा प्रबंधन, लापता प्रबंधन
Kanpur
Updated Sat, 13 Sep 2014 05:31 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कानपुर। घनघोर काली घटाएं, मूसलाधार बारिश, बत्ती गुल और कुछ सड़कों पर तीन-चार फुट पानी। शुक्रवार को शहर में यह नजारा देखकर कई लोग बोल पड़े ‘अरे बाप रे! कहीं अपना शहर भी जम्मू-कश्मीर न बन जाए। अगर कभी ऐसा हो गया तो क्या होगा?’ इस सवाल पर ‘अमर उजाला’ ने गंगा सहित छह नदियों से घिरे अपने जिले में ‘आपदा प्रबंधन विभाग’ का हाल-चाल जाना तो कलेजे पर बाढ़ आ गई। आप भी जानकर चौंक जाएंगे कि शहर में इस विभाग का कोई दफ्तर ही नहीं है जबकि अपना शहर और आस-पास का इलाका भूकम्प की दृष्टि से भी संवेदनशील एरिया में शामिल है। यहां पर आपदा प्रबंधन के परियोजना अधिकारी का पद पिछले डेढ़ साल से खाली है। यह काम एक क्लर्क के जिम्मे है जो शुक्रवार को लापता पाए गए। बाढ़, भूकंप, अग्निकांड के दौरान आपदा प्रबंधन के नाम पर एक फाइल जरूर बनी है जिसमें सारे प्रबंध चाक-चौबंद बताए गए हैं। कुल मिलाकर शहर में आपदा प्रबंधन के नाम पर सिर्फ कागजों पर नाव चलाई जा रही है। आप कह सकते हैं कि ‘गई भैंस पानी में’। पेश है प्रमुख संवाददाता संतोष सिंह की रिपोर्ट...
शुक्रवार दोपहर एक बजे भीगते-बचते संवाददाता कलेक्ट्रेट कंपाउंड में आपदा प्रबंधन का दफ्तर खोज रहा था। इधर देखा-उधर देखा, ऊपर ताका, गर्दन दाएं-बाएं घुमाते चलते रहे, दफ्तर नहीं मिला। कहते हैं खोजने से भगवान भी मिल जाते हैं पर यहां दफ्तर के लिए सॉरी। थक-हार कर कलेक्ट्रेट के एक कर्मचारी से ज्ञान लिया, पूछा भइया फलाना दफ्तर कहां है? कर्मचारी पहले तो मुंह ताकता रहा (शायद मन ही मन सोच रहा था कि नवा है क्या) फिर आंखे मटकाकर बोला, ‘कइसा दफ्तर? कुछ साल पहिले तक रहा अब खेल खतम। न दफ्तर है न साहब। अउर जादा कुछ नहीं मालूम, रामशरणवा (एक क्लर्क) बताए सकत है। खैर नजरें झुकाकर वहां से निकले और रामशरण बाबू की टेबिल पर पहुंचे तो खाली कुर्सी मुंह चिढ़ा रही थी। एक से पूछा भइया कहां हैं? जवाब आया कौन, रामशरण! अरे वो तो ‘राम’ हैं होंगे कहीं अयोध्या में। हा-हा-हा। मसखरी देखकर जी आया इसको आइस बकेट चैलेंज में भेज दें, अगर बस चले तो। खैर झीकते हुए बाहर निकल आए। एक-दो फोन घुमाए तो पता चला आपदा प्रबंधन के प्रभारी एडीएम फाइनेंस शत्रुघ्न सिंह साहब हैं। शत्रुघ्न! नाम मन में आते ही खोपड़ा में टन्न सा बोला, कहीं शत्रुघ्न भी ‘राम’ की तरह गायब न हों। राम-राम जपते उनके दफ्तर में पहुंचे तो मन ‘मोदी-मोदी’ हो गया। शत्रुघ्न दरबार में विराजमान थे। हाय-हैलो के बाद उनसे आपदा प्रबंधन पूछा तो उन्होंने स्टाफ से राम ‘शरण’ बाबू को फोन मिलवाया। बाबू ने फोन रिसीव ही नहीं किया। बाहर बादल बरस रहे थे यहां साहब बरसने लगे। सहायक को बुलाकर बाबू का जवाब तलबी हुक्मनामा तैयार करने को कहा। बोले, आज तो प्राकृतिक आपदा से मरे तीन लोगों के परिजनों को सहायता दी जानी थी। ऐसे में बाबू कैसे गायब हो गया? आने दो खबर लूंगा। अपनी खबर तब तक पक चुकी थी सो थोड़ी बहुत जानकारी और बटोरी तो फाइल थमा दी गई। हम भी ‘कागज की नाव’ पर बैठकर अपने आफिस आ गए।
कितना बरसा पानी, कउनो नहीं जानी
फाइल में बाढ़ प्रबंधन 2014-15 की जो कार्य योजना बनी है, उसके मुताबिक वर्षा रिकॉर्डिंग का पूरा डाटा कलेक्ट्रेट भवन में लगे वर्षा मापी संयंत्र से लिया जाएगा। इसी के माध्यम से वर्षा का पूरा ब्योरा जिलाधिकारी को उपलब्ध कराया जाएगा। जबकि हकीकत यह है कि कलेक्ट्रेट भवन का वर्षा मापी संयंत्र लंबे समय से खराब है। कुछ समय पहले अमर उजाला ने ही इसको खोजा था। इसका जार नाजिर सदर की अलमारी में रखा मिला था।
विज्ञापन
‘कागज की नाव’, रब्बा खैर करे
जिले की आबादी 55 लाख के आसपास है लेकिन लाइफ सेविंग जैकेट 90 हैं। फाइबर मोटर बोट 3, रबराइज्ड इनफ्लेटेबिल मोटर बोट 7, एल्युमिनियम मोटर बोट 2, बोट लोहा 1, लाइफ सेवर फाइबर 45, नेट फिसिंग 3, नायलान का रस्सा 100 किलोग्राम, टार्च फोर हेड 34, सर्च लाइट एचं ड्रेगन लाइट 24, बैटरी 12 बोल्ट 23, सोलर लालटेन 38, लाउड हेलर 6, जरीकेन 6, पोर्टेबुल इनफ्लेटेबुल इमरजेंसी लाइट 4 और लालटेन 10 हैं। राहत उपकरणों की यह सूची फाइल में दर्ज है। वास्तव में यह कहां उपलब्ध है, यह काफी प्रयास के बाद भी पता नहीं लग सका। अगर वाकई में यह सामग्री उपलब्ध है भी तो किसी आपदा की हालत में इनसे राहत पहुंचाना संभव होगा क्या ?
बोलती बंद
किसी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए जिले का सूचना तंत्र भी मजबूत नहीं है। जिले में एक साथ सूचना प्रसारित की जाए, ऐसा कोई अलर्ट सिस्टम नहीं है। सूचना देने का पूरा दारोमदार लेखपाल पर है, जिनके पास एक मोबाइल के सिवाय कुछ भी (वायरलेस, इंटरनेट या दूसरे माध्यम) नहीं है।
छह नदियों से घिरे तमाम गांवों पर बाढ़ का खतरा
कानपुर नगर में 3 तहसील (सदर, घाटमपुर, बिल्हौर) हैं। सदर तहसील क्षेत्र में गंगा, रिंद नदी का जलस्तर बढ़ा तो 41 गांव प्रभावित होंगे। बिल्हौर तहसील क्षेत्र में गंगा, उत्तरी नोन, ईशन और पांडु नदी कहर बरपा सकती हैं। यहां के 100 गांव बाढ़ से प्रभावित होते हैं। घाटमपुर तहसील क्षेत्र के 60 गांव बाढ़ की चपेट में आते हैं। यहां यमुना, पांडु और उत्तरी नोन नदी का क्षेत्र आता है।
कोट:::
...फिर भी कहते हैं, बचाव की तैयारी पूरी
प्राकृतिक आपदा से निपटने की पूरी तैयारी है। बाढ़ स्टीयरिंग ग्रुप के सदस्यों की मीटिंग हो चुकी है, जिसकी अध्यक्ष डीएम हैं। बाढ़ प्रबंधन योजना 2014-15 भी तैयार कर ली गई है। सारा डाटा तैयार है। कंट्रोल रूम और बाढ़ चौकी स्थापित की जा चुकी है। गंगा के बढ़ते जलस्तर पर लगातार निगाह रखी जा रही है। बाढ़ राहत उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। परियोजनाधिकारी की तैनाती शासन स्तर से होती है। इसके लिए शासन को लिखा गया है। आपदा प्रबंधन की बाकी टीम अपना काम अच्छी तरह से कर रही है।
शत्रुघ्न सिंह, एडीएम फाइनेंस एवं प्रभारी आपदा प्रबंधन
विज्ञापन
शुक्रवार दोपहर एक बजे भीगते-बचते संवाददाता कलेक्ट्रेट कंपाउंड में आपदा प्रबंधन का दफ्तर खोज रहा था। इधर देखा-उधर देखा, ऊपर ताका, गर्दन दाएं-बाएं घुमाते चलते रहे, दफ्तर नहीं मिला। कहते हैं खोजने से भगवान भी मिल जाते हैं पर यहां दफ्तर के लिए सॉरी। थक-हार कर कलेक्ट्रेट के एक कर्मचारी से ज्ञान लिया, पूछा भइया फलाना दफ्तर कहां है? कर्मचारी पहले तो मुंह ताकता रहा (शायद मन ही मन सोच रहा था कि नवा है क्या) फिर आंखे मटकाकर बोला, ‘कइसा दफ्तर? कुछ साल पहिले तक रहा अब खेल खतम। न दफ्तर है न साहब। अउर जादा कुछ नहीं मालूम, रामशरणवा (एक क्लर्क) बताए सकत है। खैर नजरें झुकाकर वहां से निकले और रामशरण बाबू की टेबिल पर पहुंचे तो खाली कुर्सी मुंह चिढ़ा रही थी। एक से पूछा भइया कहां हैं? जवाब आया कौन, रामशरण! अरे वो तो ‘राम’ हैं होंगे कहीं अयोध्या में। हा-हा-हा। मसखरी देखकर जी आया इसको आइस बकेट चैलेंज में भेज दें, अगर बस चले तो। खैर झीकते हुए बाहर निकल आए। एक-दो फोन घुमाए तो पता चला आपदा प्रबंधन के प्रभारी एडीएम फाइनेंस शत्रुघ्न सिंह साहब हैं। शत्रुघ्न! नाम मन में आते ही खोपड़ा में टन्न सा बोला, कहीं शत्रुघ्न भी ‘राम’ की तरह गायब न हों। राम-राम जपते उनके दफ्तर में पहुंचे तो मन ‘मोदी-मोदी’ हो गया। शत्रुघ्न दरबार में विराजमान थे। हाय-हैलो के बाद उनसे आपदा प्रबंधन पूछा तो उन्होंने स्टाफ से राम ‘शरण’ बाबू को फोन मिलवाया। बाबू ने फोन रिसीव ही नहीं किया। बाहर बादल बरस रहे थे यहां साहब बरसने लगे। सहायक को बुलाकर बाबू का जवाब तलबी हुक्मनामा तैयार करने को कहा। बोले, आज तो प्राकृतिक आपदा से मरे तीन लोगों के परिजनों को सहायता दी जानी थी। ऐसे में बाबू कैसे गायब हो गया? आने दो खबर लूंगा। अपनी खबर तब तक पक चुकी थी सो थोड़ी बहुत जानकारी और बटोरी तो फाइल थमा दी गई। हम भी ‘कागज की नाव’ पर बैठकर अपने आफिस आ गए।
विज्ञापन
कितना बरसा पानी, कउनो नहीं जानी
फाइल में बाढ़ प्रबंधन 2014-15 की जो कार्य योजना बनी है, उसके मुताबिक वर्षा रिकॉर्डिंग का पूरा डाटा कलेक्ट्रेट भवन में लगे वर्षा मापी संयंत्र से लिया जाएगा। इसी के माध्यम से वर्षा का पूरा ब्योरा जिलाधिकारी को उपलब्ध कराया जाएगा। जबकि हकीकत यह है कि कलेक्ट्रेट भवन का वर्षा मापी संयंत्र लंबे समय से खराब है। कुछ समय पहले अमर उजाला ने ही इसको खोजा था। इसका जार नाजिर सदर की अलमारी में रखा मिला था।
विज्ञापन
‘कागज की नाव’, रब्बा खैर करे
जिले की आबादी 55 लाख के आसपास है लेकिन लाइफ सेविंग जैकेट 90 हैं। फाइबर मोटर बोट 3, रबराइज्ड इनफ्लेटेबिल मोटर बोट 7, एल्युमिनियम मोटर बोट 2, बोट लोहा 1, लाइफ सेवर फाइबर 45, नेट फिसिंग 3, नायलान का रस्सा 100 किलोग्राम, टार्च फोर हेड 34, सर्च लाइट एचं ड्रेगन लाइट 24, बैटरी 12 बोल्ट 23, सोलर लालटेन 38, लाउड हेलर 6, जरीकेन 6, पोर्टेबुल इनफ्लेटेबुल इमरजेंसी लाइट 4 और लालटेन 10 हैं। राहत उपकरणों की यह सूची फाइल में दर्ज है। वास्तव में यह कहां उपलब्ध है, यह काफी प्रयास के बाद भी पता नहीं लग सका। अगर वाकई में यह सामग्री उपलब्ध है भी तो किसी आपदा की हालत में इनसे राहत पहुंचाना संभव होगा क्या ?
बोलती बंद
किसी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए जिले का सूचना तंत्र भी मजबूत नहीं है। जिले में एक साथ सूचना प्रसारित की जाए, ऐसा कोई अलर्ट सिस्टम नहीं है। सूचना देने का पूरा दारोमदार लेखपाल पर है, जिनके पास एक मोबाइल के सिवाय कुछ भी (वायरलेस, इंटरनेट या दूसरे माध्यम) नहीं है।
छह नदियों से घिरे तमाम गांवों पर बाढ़ का खतरा
कानपुर नगर में 3 तहसील (सदर, घाटमपुर, बिल्हौर) हैं। सदर तहसील क्षेत्र में गंगा, रिंद नदी का जलस्तर बढ़ा तो 41 गांव प्रभावित होंगे। बिल्हौर तहसील क्षेत्र में गंगा, उत्तरी नोन, ईशन और पांडु नदी कहर बरपा सकती हैं। यहां के 100 गांव बाढ़ से प्रभावित होते हैं। घाटमपुर तहसील क्षेत्र के 60 गांव बाढ़ की चपेट में आते हैं। यहां यमुना, पांडु और उत्तरी नोन नदी का क्षेत्र आता है।
कोट:::
...फिर भी कहते हैं, बचाव की तैयारी पूरी
प्राकृतिक आपदा से निपटने की पूरी तैयारी है। बाढ़ स्टीयरिंग ग्रुप के सदस्यों की मीटिंग हो चुकी है, जिसकी अध्यक्ष डीएम हैं। बाढ़ प्रबंधन योजना 2014-15 भी तैयार कर ली गई है। सारा डाटा तैयार है। कंट्रोल रूम और बाढ़ चौकी स्थापित की जा चुकी है। गंगा के बढ़ते जलस्तर पर लगातार निगाह रखी जा रही है। बाढ़ राहत उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। परियोजनाधिकारी की तैनाती शासन स्तर से होती है। इसके लिए शासन को लिखा गया है। आपदा प्रबंधन की बाकी टीम अपना काम अच्छी तरह से कर रही है।
शत्रुघ्न सिंह, एडीएम फाइनेंस एवं प्रभारी आपदा प्रबंधन