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झूठ बोलना पाप नहीं है
Kanpur
Updated Sun, 15 Jun 2014 05:32 AM IST
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केस-1
पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र तिवारी के कार्यकाल में हुए निर्माण और विकास कार्यों में धांधली के आरोप लगे। शासन ने मामले की जांच कानपुर मंडल के कमिश्नर को दी। उन्होंने संयुक्त विकास आयुक्त से पूरे मामले की जांच कराई। इसमें बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई है। कई काम ऐसे हैं, जो अधूरे हैं पर भुगतान हो गया है। अधूरे भवन में दरवाजा, खिड़की तक नहीं है। मरम्मत कार्य में मनमाना पैसे खर्च किया गया है। कुछ अधिकारी, कर्मचारी और ठेकेदार दोषी ठहराए गए हैं। पूर्व कुलपति का कार्यकाल 2008 से 2012 के बीच का है।
केस-2
डीन एग्रीकल्चर सहित कृषि विश्वविद्यालय तमाम प्रोफेसर, टीचर और कर्मचारियों पर गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। इसी आधार पर शासन से जांच-पड़ताल कराई जा रही है। कुछ मामलों की जांच कमिश्नर मो. इफ्तिखारुद्दीन ही कर रहे हैं। रिसर्च एसोसिएट की नियुक्ति में गड़बड़ी के आरोप लगे। संबंधित प्रोजेक्ट इंचार्ज की आपत्ति के बाद रिसर्च एसोसिएट की नियुक्ति रिजेक्ट कर दी गई। इनमें से ज्यादातर मामले 2008 से 2014 के बीच के हैं।
अमर उजाला ब्यूरो
कानपुर। ‘झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे सांप है’ बचपन में यही कहकर सच बोलने की सीख दी जाती थी। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अफसरों ने शायद यह सीख नहीं ली। यहां के तमाम अफसर, कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। मामलों की जांच-पड़ताल भी चल रही है। निर्माण, विकास कार्यों में धांधली की एक जांच पूरी हो चुकी है। इसमें कई अधिकारी, कर्मचारी दोषी ठहराए गए हैं। इसके बावजूद कृषि विश्वविद्यालय ने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 (आरटीआई) के तहत मांगी गई सूचना में लिखकर दिया है कि 2008 से 2014 के बीच में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। किसी पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे और किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन का यह दावा अब संदेह के घेरे में है। कहा जा रहा है कि विभिन्न मामलों के आरोपियों को बचाने के लिए पेशबंदी की जा रही है।
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ग्वालटोली निवासी और आरटीआई कार्यकर्ता आशीष पांडेय ने जनवरी 2014 में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से अधिकारी, कर्मचारियों पर लगे भ्रष्टाचार, उनपर कार्रवाई का पूरा ब्योरा मांगा। आरटीआई कार्यकर्ता ने जानना चाहा कि 2008 से 2014 के बीच कितने अफसर, कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। किस तरह की जांच हुई और आरोपियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। अनैतिक, असंवैधानिक काम में फंसे अधिकारी, कर्मचारियों का 10 साल का रिकार्ड उपलब्ध कराया जाए। किसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी भी दी जाए। इस आरटीआई का जवाब कृषि विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक लाइन में निपटा दिया है। 11 जून को जवाब देते हुए कहा है कि इस तरह के मामलों में कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इस दावे पर आरटीआई कार्यकर्ता ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। आशीष पांडेय ने कहा है कि यह मामला राज्य सूचना आयोग लेकर जाएंगे। भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में कृषि विश्वविद्यालय प्रशासन ने झूठ बोला है। इस पर कार्रवाई की मांग की जाएगी। कृषि विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की नियुक्ति, निर्माण और विकास कार्यों में भारी गड़बड़ी हुई है। स्वीकृत पदों से ज्यादा कर्मचारी रखे गए हैं। फार्म हाउसों से तमाम समान गलत ढंग से बेचे जाने के मामले सामने आए हैं। इनमें कार्रवाई भी हुई है। इसके बावजूद झूठी सूचना दी गई है। यह कानून का खुला उल्लंघन है।
कोट:::
आरटीआई के तहत दी गई सूचना की जानकारी नहीं है। पहले हुए विकास, निर्माण कार्यों में गड़बड़ी की जांच चल रही है। जांच अधिकारी को दस्तावेज भी दिए जा चुके हैं। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की एक कमेटी जांच में सहयोग कर रही है। यदि गलत जानकारी दी गई है तो उसे सुधारा जाएगा। जन सूचना अधिकारी से पूरे मामले की रिपोर्ट भी ली जाएगी। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में कानून सम्मान किया जाता है।
प्रो. मुन्ना सिंह, कुलपति
पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र तिवारी के कार्यकाल में हुए निर्माण और विकास कार्यों में धांधली के आरोप लगे। शासन ने मामले की जांच कानपुर मंडल के कमिश्नर को दी। उन्होंने संयुक्त विकास आयुक्त से पूरे मामले की जांच कराई। इसमें बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आई है। कई काम ऐसे हैं, जो अधूरे हैं पर भुगतान हो गया है। अधूरे भवन में दरवाजा, खिड़की तक नहीं है। मरम्मत कार्य में मनमाना पैसे खर्च किया गया है। कुछ अधिकारी, कर्मचारी और ठेकेदार दोषी ठहराए गए हैं। पूर्व कुलपति का कार्यकाल 2008 से 2012 के बीच का है।
केस-2
डीन एग्रीकल्चर सहित कृषि विश्वविद्यालय तमाम प्रोफेसर, टीचर और कर्मचारियों पर गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। इसी आधार पर शासन से जांच-पड़ताल कराई जा रही है। कुछ मामलों की जांच कमिश्नर मो. इफ्तिखारुद्दीन ही कर रहे हैं। रिसर्च एसोसिएट की नियुक्ति में गड़बड़ी के आरोप लगे। संबंधित प्रोजेक्ट इंचार्ज की आपत्ति के बाद रिसर्च एसोसिएट की नियुक्ति रिजेक्ट कर दी गई। इनमें से ज्यादातर मामले 2008 से 2014 के बीच के हैं।
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अमर उजाला ब्यूरो
कानपुर। ‘झूठ बोलना पाप है, नदी किनारे सांप है’ बचपन में यही कहकर सच बोलने की सीख दी जाती थी। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अफसरों ने शायद यह सीख नहीं ली। यहां के तमाम अफसर, कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। मामलों की जांच-पड़ताल भी चल रही है। निर्माण, विकास कार्यों में धांधली की एक जांच पूरी हो चुकी है। इसमें कई अधिकारी, कर्मचारी दोषी ठहराए गए हैं। इसके बावजूद कृषि विश्वविद्यालय ने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 (आरटीआई) के तहत मांगी गई सूचना में लिखकर दिया है कि 2008 से 2014 के बीच में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। किसी पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे और किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन का यह दावा अब संदेह के घेरे में है। कहा जा रहा है कि विभिन्न मामलों के आरोपियों को बचाने के लिए पेशबंदी की जा रही है।
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ग्वालटोली निवासी और आरटीआई कार्यकर्ता आशीष पांडेय ने जनवरी 2014 में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से अधिकारी, कर्मचारियों पर लगे भ्रष्टाचार, उनपर कार्रवाई का पूरा ब्योरा मांगा। आरटीआई कार्यकर्ता ने जानना चाहा कि 2008 से 2014 के बीच कितने अफसर, कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। किस तरह की जांच हुई और आरोपियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। अनैतिक, असंवैधानिक काम में फंसे अधिकारी, कर्मचारियों का 10 साल का रिकार्ड उपलब्ध कराया जाए। किसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी भी दी जाए। इस आरटीआई का जवाब कृषि विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक लाइन में निपटा दिया है। 11 जून को जवाब देते हुए कहा है कि इस तरह के मामलों में कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इस दावे पर आरटीआई कार्यकर्ता ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। आशीष पांडेय ने कहा है कि यह मामला राज्य सूचना आयोग लेकर जाएंगे। भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में कृषि विश्वविद्यालय प्रशासन ने झूठ बोला है। इस पर कार्रवाई की मांग की जाएगी। कृषि विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की नियुक्ति, निर्माण और विकास कार्यों में भारी गड़बड़ी हुई है। स्वीकृत पदों से ज्यादा कर्मचारी रखे गए हैं। फार्म हाउसों से तमाम समान गलत ढंग से बेचे जाने के मामले सामने आए हैं। इनमें कार्रवाई भी हुई है। इसके बावजूद झूठी सूचना दी गई है। यह कानून का खुला उल्लंघन है।
कोट:::
आरटीआई के तहत दी गई सूचना की जानकारी नहीं है। पहले हुए विकास, निर्माण कार्यों में गड़बड़ी की जांच चल रही है। जांच अधिकारी को दस्तावेज भी दिए जा चुके हैं। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की एक कमेटी जांच में सहयोग कर रही है। यदि गलत जानकारी दी गई है तो उसे सुधारा जाएगा। जन सूचना अधिकारी से पूरे मामले की रिपोर्ट भी ली जाएगी। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में कानून सम्मान किया जाता है।
प्रो. मुन्ना सिंह, कुलपति