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यूसीसी से लोन की 49 फाइलें गायब
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
Updated Sat, 31 Jan 2015 03:22 AM IST
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यूनाइटेड कॉमर्शियल कोऑपरेटिव (यूसीसी) बैंक से लोन की 49 महत्वपूर्ण फाइलें गायब हैं। बैंक प्रबंधन की ओर से खुद यह बात लिखित रूप से स्वीकार की गई है।
सूत्रों के मुताबिक इनमें से ज्यादातर फाइलें खुद बैंक के निदेशकों के परिजनों या परिचितों की हैं। फाइलें गायब होने से करीब पांच करोड़ रुपये का लोन डूब गया है, क्योंकि कागजातों की गैरमौजूदगी में बैंक इस रकम का क्लेम नहीं कर पाएगा।
बैंक के पूर्व सचिव प्रदीप सहाय के परिवारिक सदस्य ने स्टर्लिंग बेवरेजेस नाम की फर्म पर 80 लाख रुपये का लोन लिया था।
बाद में इस फाइल का नाम बदलकर शहर के एक प्रमुख शिक्षण समूह के नाम पर कर दिया गया। इसी तरह ग्लोबल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के नाम पर 75 लाख रुपये का लोन स्वीकृत किया।
इसका भी नाम उसी शिक्षण समूह के नाम पर बदल दिया गया। प्रदीप सहाय के एक परिवारिक सदस्य को 7.5 लाख का एजूकेशन लोन दिया गया।
प्रवीन भार्गव, सुधीर भार्गव और गायत्री भार्गव को भी लाखों के लोन किए गए। ये सभी लोन किस्तें न अदा होने के चलते खराब हो गए। सूत्र बताते हैं कि पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत ही ये सारे लोन पास किए गए थे, जो कुछ समय में ही किस्तें न जमा होने के चलते खराब हो गए।
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इधर जब बैंक के कारनामे खुलने लगे, तो अचानक ये फाइलें बैंक के सिविल लाइंस स्थित मुख्यालय से गायब हो गईं। नियमानुसार बैंक के निदेशक मंडल और उनके परिजनों को लोन नहीं दिया जा सकता है।
बावजूद इसके यूसीसी बैंक में धड़ल्ले से लाखों-करोंड़ों के लोन बांटे जाते रहे। ऑडिटर फर्म मिश्रा मिश्रा एंड एसोसिएट्स को दिए गए लिखित जवाब में बैंक के पूर्व सचिव संजय यादव ने इस बाबत स्वीकारोक्ति की है।
बैंक में हुए तमाम घपलों को पूर्व सचिव संजय यादव की आईडी से अंजाम दिए गए हैं। गौरतलब है कि करीब चार माह पूर्व संजय यादव की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी।
बैंक में हुए घपले भी इस हादसे से किसी न किसी तरह जुड़े होने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
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सूत्रों के मुताबिक इनमें से ज्यादातर फाइलें खुद बैंक के निदेशकों के परिजनों या परिचितों की हैं। फाइलें गायब होने से करीब पांच करोड़ रुपये का लोन डूब गया है, क्योंकि कागजातों की गैरमौजूदगी में बैंक इस रकम का क्लेम नहीं कर पाएगा।
बैंक के पूर्व सचिव प्रदीप सहाय के परिवारिक सदस्य ने स्टर्लिंग बेवरेजेस नाम की फर्म पर 80 लाख रुपये का लोन लिया था।
बाद में इस फाइल का नाम बदलकर शहर के एक प्रमुख शिक्षण समूह के नाम पर कर दिया गया। इसी तरह ग्लोबल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के नाम पर 75 लाख रुपये का लोन स्वीकृत किया।
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इसका भी नाम उसी शिक्षण समूह के नाम पर बदल दिया गया। प्रदीप सहाय के एक परिवारिक सदस्य को 7.5 लाख का एजूकेशन लोन दिया गया।
प्रवीन भार्गव, सुधीर भार्गव और गायत्री भार्गव को भी लाखों के लोन किए गए। ये सभी लोन किस्तें न अदा होने के चलते खराब हो गए। सूत्र बताते हैं कि पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत ही ये सारे लोन पास किए गए थे, जो कुछ समय में ही किस्तें न जमा होने के चलते खराब हो गए।
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इधर जब बैंक के कारनामे खुलने लगे, तो अचानक ये फाइलें बैंक के सिविल लाइंस स्थित मुख्यालय से गायब हो गईं। नियमानुसार बैंक के निदेशक मंडल और उनके परिजनों को लोन नहीं दिया जा सकता है।
बावजूद इसके यूसीसी बैंक में धड़ल्ले से लाखों-करोंड़ों के लोन बांटे जाते रहे। ऑडिटर फर्म मिश्रा मिश्रा एंड एसोसिएट्स को दिए गए लिखित जवाब में बैंक के पूर्व सचिव संजय यादव ने इस बाबत स्वीकारोक्ति की है।
बैंक में हुए तमाम घपलों को पूर्व सचिव संजय यादव की आईडी से अंजाम दिए गए हैं। गौरतलब है कि करीब चार माह पूर्व संजय यादव की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी।
बैंक में हुए घपले भी इस हादसे से किसी न किसी तरह जुड़े होने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।